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'ज्ञानू मस्ट गो' से 'इट्स डन ब्रो' तक, GEN Z ने बदली विरोध की भाषा; सड़कों पर फिर लौटी देश की राजनीति

Published: Wed, 07 Oct 2026 11:20 PM (IST)Updated: Thu, 08 Oct 2026 12:00 AM (IST)

भारत में सड़कों पर राजनीति की वापसी हुई है, जहाँ सोशल मीडिया और युवा पीढ़ी ने विरोध प्रदर्शनों के तरीके ...और पढ़ें

सोशल मीडिया ने विरोध प्रदर्शनों को तेजी से वायरल किया है। (फोटो-AI जेनरेटेड)

सोशल मीडिया ने विरोध प्रदर्शनों को तेजी से वायरल किया है। (फोटो-AI जेनरेटेड)

HighLights

  1. सोशल मीडिया ने विरोध प्रदर्शनों को तेजी से वायरल किया है।

  2. युवा पीढ़ी के नेतृत्व में विकेन्द्रीकृत आंदोलन तेजी से उभर रहे हैं।

  3. नारों की जगह अब मीम्स और नए स्लोगन ले रहे हैं।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। देश भर में विरोध प्रदर्शनों की आवाज गुलजार है। नारे लग रहे हैं, भीड़ सड़कों पर जमा हो रही है और नेता से लेकर युवा सड़कों पर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं।

मंगलवार को INDI गठबंधन के सांसदों ने वोटर लिस्ट के SIR में गड़बड़ियों के खिलाफ मार्च निकाला और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। यह मार्च तब और ज्यादा नाटकीय हो गया जब राहुल गांधी ने अचानक अपना रास्ता बदल लिया और पुलिस को चौंका दिया।

अगले दिन बुधवार को विपक्षी सांसद जनपथ पर एक और बड़े प्रदर्शन के लिए उतरे। इस दौरान प्रियंका वाड्रा सड़क पर लेट गई और तब तक हटने से इनकार कर दिया जब तक कि CEC विपक्षी नेताओं से मिलने के लिए तैयार नहीं हो।

लेकिन हंगामा यहीं नहीं थमा कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने चेतावनी दी है कि यदि CEC ने इस्तीफा नहीं दिया तो 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर 2.0 होगा।

सड़कों पर फिर लौटी देश की राजनीति

सड़कें हमेशा से ही राजनीति का मंच रही है शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन हमेशा से हमारे लोकतंत्र का हिस्सा रहे हैं। भारत की राजनीति शायद ही कभी संसद, पार्टी कार्यालयों या चुनावी रैलियों तक सीमित रही हो। सड़कें हमेशा से ही इसका सबसे बड़ा मंच रही हैं।

महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मार्च, बहिष्कार और सत्याग्रह को जन राजनीति का सबसे बड़ा हथियार बनाया। उसके कई दशकों बाद जयप्रकाश नारायण के आंदोलन ने इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ छात्रों और नागरिकों को सड़कों पर उतारा।

साल 2011 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी विरोध प्रदर्शनों ने जंतर-मंतर और रामलीला मैदान भर दिया था। CAA विरोधी विरोध प्रदर्शनों में लंबे समय तक धरने दिए गए, जबकि तीन कृषि कानूनों को रद्द किए जाने से पहले किसान एक साल से अधिक समय तक दिल्ली की सीमाओं पर डटे रहे।

सोशल मीडिया ने बदला प्रदर्शन का तरीका

सड़कों पर होने वाली राजनीति कोई नई नहीं है, लेकिन जो चीज बदली वो है लोगों को एकजुट करने के तरीके। पॉलिटिकल एनालिस्ट उदय चंद्र के मुताबिक सोशल मीडिया विरोध प्रदर्शनों को ज्यादा लोगों तक पहुंचा रहा है।

उदय चंद्र कहते हैं, 'सोशल मीडिया विरोध प्रदर्शनों को लाखों लोगों तक पहुंचाता है जिससे वे तेजी से वायरल हो जाते हैं। लेकिन सोशल मीडिया एक और जरूरी काम भी करता है, यह लोगों को एकजुट करने के लिए राजनीतिक पार्टियों और यूनियनों पर निर्भरता कम करता है। अब कोई शिकायत किसी आंदोलन का रूप ले सकती है, इससे पहले कि पारंपरिक राजनीतिक नेता उस पर कोई रुख तय कर पाएं।

उदय चंद्र का मानना है कि पिछले एक दशक में सेंट्रलाइज्ड चुनावी राजनीति का दबदबा था, लेकिन अब हम एक स्वतंत्र राजनीतिक मंच के तौर पर सड़कों की वापसी देख रहे हैं।

जब युवा नेतृत्व करते हैं और पार्टियां उनका अनुसरण करती हैं

हाल के दिनों में हुए विरोध प्रदर्शनों के इस दौर में जो बात अलग है वो ये है कि कई आंदोलनों की शुरुआत पारंपरिक राजनीतिक दलों ने नहीं, बल्कि छात्रों और युवाओं ने की है। तो, क्या युवाओं और छात्रों ने राजनीतिक पार्टियों को सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन की ओर लौटने का रास्ता दिखाया है?

जुलाई में NEET पेपर लीक मामले में छात्रों के विरोध का केंद्र जंतर-मंतर बना। CJP एक बड़े दबाव समूह के रूप में उभरा, जिसके विरोध के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग तेज हुई। बाद में राजनीतिक दल भी इस आंदोलन से जुड़े।

21 जुलाई को, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, मल्लिकार्जुन खरगे और विपक्ष के अन्य नेताओं ने NEET पेपर लीक का विरोध कर रहे छात्रों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर धरना दिया।

लेकिन चंद्रा का तर्क है कि एक आंदोलन के तौर पर CJP, राजनीतिक पार्टियों और अन्ना हजारे के आंदोलन या किसानों के विरोध प्रदर्शन जैसे पहले के बड़े आंदोलनों से काफी अलग है।

चंद्रा ने कहा जिन दो आंदोलनों का जिक्र किया, उनकी तुलना में CJP कहीं ज्यादा विकेंद्रीकृत है। अन्ना आंदोलन के जाने-पहचाने नेता थे और उसका एक राष्ट्रीय अभियान या एजेंडा था। इसी तरह, किसानों का विरोध-प्रदर्शन मजबूत यूनियनों, स्थानीय संगठनों और महीनों तक लामबंदी बनाए रखने की आर्थिक क्षमता पर टिका था। इसके उलट, जो चीज अब उभरती हुई दिख रही है, वह नेटवर्क पर आधारित है, उसमें नेताओं की भूमिका कम है और वह अक्सर किसी खास मुद्दे पर केंद्रित होती है।

चंद्र कहते हैं, 'Instagram, WhatsApp, YouTube और दूसरे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पहले से एक-दूसरे से न जुड़े समूहों को तेजी से जोड़ सकते हैं। इसलिए, लोगों को एकजुट करना न सिर्फ तेज होता है, बल्कि ज्यादा आसान भी होता है। किसी आंदोलन को शुरू करने से पहले आपको जरूरी तौर पर कोई संगठन बनाने और उसे रजिस्टर करने की जरूरत नहीं होती है। अक्सर संगठन से पहले आंदोलन शुरू हो जाता है।'

शायद यही कारण है कि राजनीतिक पार्टियों ने लोगों को एकजुट करने की अपनी रणनीति में बदलाव किया है। युवाओं के इस रुख को देखते हुए राहुल गांधी ने 4 अक्टूबर को 'सत्याग्रह' पोर्टल लॉन्च किया। इसका उद्देश्य देशभर में अलग-अलग मुद्दों पर लड़ रहे लोगों और आंदोलनों को एक मंच पर जोड़ना है।

देश के अलग-अलग कोनों में हो रहे आंदोलन

स्थान / क्षेत्र प्रमुख मुद्दा विरोध का स्वरूप
मुंबई, कोलकाता, पटना आदि महिला सुरक्षा व जवाबदेही सुरक्षित सार्वजनिक स्थानों की मांग को लेकर मार्च
पन्ना (मध्य प्रदेश) केन-बेतवा लिंक परियोजना से विस्थापन 'चीता आंदोलन' (चिता पर सोना, जल सत्याग्रह)
मावल (महाराष्ट्र) पावना बंद पाइपलाइन परियोजना 'जल समाधि' आंदोलन का ऐलान
कर्नाटक (कृष्णा बेसिन) पानी का बंटवारा सूखा प्रभावित इलाकों के लिए पानी रोकने की मांग
IIT बॉम्बे / JNU छात्र आत्महत्या व नीतियां भूख हड़ताल व विरोध प्रदर्शन
लखनऊ व फतेहपुर (यूपी) स्कूलों में शिक्षकों की कमी, खराब सड़कें छात्राओं द्वारा सड़क जाम व प्रदर्शन

नारों ने लिया मीम्स का रूप

सड़कों की राजनीति पुरानी है, लेकिन लोगों को एकजुट करने के तरीके बदल गए हैं। पहले के आंदोलन छात्र संगठनों, यूनियनों, जनसभाओं और बाद में टेलीविजन कवरेज पर निर्भर करते थे, लेकिन आज विरोध प्रदर्शन जंतर-मंतर पहुंचने से पहले ही Instagram या X पर शुरू हो जाते हैं।

जैसे-जैसे प्रदर्शन का तरीका बदला वैसे-वैसे विरोध की भाषा भी बदल गई। जो नारे कभी सड़कों पर गूंजते थे, वे अब कुछ ही घंटों में इंस्टाग्राम रील्स और एक्स पर मीम बनकर वायरल हो जाते हैं।

हाल के दिनों में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिले हैं। दिल्ली में महिलाओं के विरोध प्रदर्शनों में 'एक कचौड़ी दो समोसा इन मर्दों का क्या भरोसा' जैसे नारे तेजी से सड़कों से इंस्ट्राग्राम रील्स तक पहुंच गए।

वहीं मुंबई में चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन में 'ज्ञानू मस्ट गो'और 'वोट चुराया मेरा, किसने ओ सनम? ज्ञानू ने' जैसे बॉलीबुड स्टाइल प्लेकार्ड्स दिखे।

राहुल गांधी द्वारा 'ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो!' का पोस्टर प्रदर्शित करना यह दर्शाता है कि अब विरोध प्रदर्शनों में युवा पीढ़ी की भाषा को अपनाया जा रहा है।

भावना वही तरीका नया

विरोध करने का मकसद आज भी वही है अपने अधिकारों की मांग करना। लेकिन अब सोशल मीडिया के दौर में आंदोलन फोन की स्क्रीन से शुरू होकर सड़क तक पहुंचता है, और यही वजह है कि आज की 'सड़क की राजनीति' पहले से कहीं अधिक तेज, असरदार और अप्रत्याशित हो चुकी है। 

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