जितेंद्र शर्मा, कुंभनगर। 'लंदन देखा पेरिस देखा और देखा जापान, सारे जग में कहीं नहीं है दूसरा हिंदुस्तान...।' कोई भारतीय अगर परदेस फिल्म के इस गीत को गुनगुनाए तो निश्चित तौर पर देशप्रेम की भावना है। मगर, विदेशी भी इसमें सुर मिलाएं तो? जाहिर है कि कोई खास वजह होगी। यह खासियत है भारतीय संस्कृति, संस्कार और अगाध आस्था के समंदर की, जो सात समंदर पार से सैकड़ों विदेशियों को प्रयागराज कुंभ खींच लाई है। वह आस्था नहीं, अचरच में डूबे हैं। जरा सा मन टटोला तो भाव निकलकर आए कि मुंबई, हैदराबाद और बंगलुरू वाला 'इंडिया' तो पहले भी देख चुके हैं। वह अच्छा है, लेकिन प्रयागराज वाला 'भारत' देखा है, जो सच में अद्भुत है, उनकी भाषा में ऑसम है।

प्रयागराज कुंभ में लाखों की भीड़ के बीच कुछ चेहरे ध्यान खींच ही लेते हैं। पीपों का पुल का पार कर जैसे ही अखाड़ों वाले रास्ते पर पहुंचते हैं तो वहां एक छोटी सी दुकान थी। कंठी माला से लेकर महिलाओं के साजो-श्रृंगार का सामान इस पर बिक रहा था। तीन विदेशी युवतियां खड़ी थीं। कोई चूड़ी उठाती तो कोई कान की बाली। पूछने पर बताया कि वह यूरोप से आईं ईश्वरी, रामेश्वरी और गेब्रिली थीं। ईश्वरी और रामेश्वरी के नाम से चौंकिएगा नहीं, वह पायलट बाबा की शिष्या हैं, इसलिए भारतीय नाम रखने तक की भावनाओं में डूब चुकी हैं। वह बताती हैं कि इससे पहले भी इंडिया आए हैं, लेकिन कुंभ देखने का मौका पहली बार मिला है। भारतीय आध्यात्म और योग के प्रति आकर्षित होकर ही पायलट बाबा के आश्रम से जुड़ीं, लेकिन भारत के लोग कितने आध्यात्मिक हैं, यह यहां आकर महसूस हुआ है। हमें लगता है कि यहां के लोग एक-दूसरे के बहुत करीब हैं।

सोचा भी न था कि भारत ऐसा देश होगा

गले में बड़ा सा कैमरा लटकाए लंबी कद-काठी का एक गोरा शख्स घूम रहा था। यह जर्मनी से आए एक्सेल थे। बताया कि सोमवार को कुंभ में आए थे। अब अगले मंगलवार तक यहां रुकेंगे, फिर बनारस निकल जाएंगे। यहां इतने दिन क्यों रुके हैं? इस सवाल पर बताते हैं कि मैं दुनिया भर में घूमकर फोटोग्राफी करता हूं। यहां इतने अलग नजारे हैं कि जिधर नजर घुमाएं, वहीं क्लिक करने का मन करता है। अन्य देशों की तुलना भारत से करने के सवाल पर कहते हैं कि मैंने इस देश के कई बड़े शहर पहले भी देखे हैं, लेकिन कुंभ में आने पर महसूस किया कि इतनी भीड़ होने के बाद भी मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। मुझे किसी भी तरह का डर यहां नहीं लग रहा। मैं तो यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि संगम के प्रति भारत में इतनी आस्था क्यों है।

एक्सक्यूज मी... लेकिन वह इसलिए व्यस्त थी

नागवासुकि रोड पर एक विदेशी युवती चली जा रही थी। हम सिर्फ 'एक्सक्यूज मी.. कह पाए कि वह 'प्लीज डोंट डिस्टर्ब मी कहकर आगे बढ़ गई। सोचा कि किसी जल्दबाजी में होगी। मगर, चंद कदम आगे बढ़कर वह सड़क किनारे एक साधु के पास बैठती है। हवन कुंड की भभूति माथे पर लगवाकर फिर बढ़ जाती है। तब अहसास होता है कि हां, वह यहां महज चंद किलोमीटरों में सिमटे भारत को ही देखने आई हैं, इसी में व्यस्त हैं।

Posted By: Ravindra Pratap Sing

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