नई दिल्‍ली (ऑनलाइन डेस्‍क)। नॉर्थ पोल बर्फ से ढका एक ऐसा इलाका है जो अकसर शोधकर्ताओं को अपनी तरफ आकर्षित करता रहता है। यहां पर जमीन पर समय बिताना जितना मुश्किल है उतना ही मुश्किल होता है इसके ऊपर उड़ना। इसकी वजह यहां की बेहद मुश्किल परिस्थितियां हैं, जो हर वक्‍त पायलट का कड़ा इम्तिहान लेती हैं। जो इस इम्तिहान में खरा उतारता है वो कीर्तिमान स्‍थापित करता है। ठीक वैसे ही जैसे भारत की एयर इंडिया पायलटों ने किया है। एयर इंडिया की महिला पायलटों ने सेन फ्रांसिस्‍को से बैंगलुरू तक का 16 हजार किमी का सफर इसी रास्‍ते से पूरा इतिहास रच दिया है। एयर इंडिया की काबिल महिला पायलटों की टीम में कैप्‍टन जोया अग्रवाल, कैप्‍टन पापागरी तनमई, कैप्‍टन आकांक्षा सोनवरे और कैप्‍टन शिवानी मन्‍हास शामिल थीं।आपको यहां पर ये भी बता दें कि अक्‍टूबर 2019 में पहली बार भारतीय पुरुष पायलटों ने इस क्षेत्र के ऊपर से उड़ान भरी थी। ये विमान नई दिल्‍ली से सेन फ्रांसिस्‍को गया था। इसमें एयर इंडिया के पायलट कैप्‍टन दिग्विजय सिंह और कैप्‍टन रजनीश शर्मा के अलावा इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के प्रतिनिधि शामिल थे।

सोवियत पायलट ने पहली बार भरी थी उत्‍तरी ध्रुव के ऊपर से उड़ान 

उत्‍तरी धुव्र के ऊपर से उड़ान भरने की जहां तक बात है तो आपको बता दें कि सबसे पहले इस काम को 18-20 जून 1937 में सोवियत पायलट वेल्‍री पाव्‍लोविच चाकलॉव ने अंजाम दिया था। उन्‍होंने मास्‍को यूरोप से अमेरिकन पेसिफिक कॉस्‍ट वैंकोवर की दूरी इसी के ऊपर से उड़ान भरकर पूरी की थी। हालांकि उन्‍हें 8811 किमी लंबा सफर पूरा करने में 63 घंटों का समय लगा था। उन्‍होंने ये दूरी टॉपलेव एएनटी-25 के सिंगल इंजन विमान से पूरी की थी। उन्‍हें हीरो ऑफ द सोवियत यूनियन का खिताब दिया गया था। वो सोवियत यूनियन के वोल्‍गा क्षेत्र के वेस्लियावो कस्‍बे से ताल्‍लुक रखते थे जिसको आज चाकलॉव के नाम से जाना जाता है। 15 दिसंबर 1938 को एक विमान हादसे में उनकी मौत हो गई थी। इसके बाद अक्‍टूबर 1946 में बी-29 विमान ने बिना रुके ओहू, हवाई से कायरो (मिस्र) की करीब 15163 किमी की दूरी इस बर्फीले क्षेत्र के ऊपर से ही पूरी की थी। इस दूरी को तय करने में विमान ने 40 घंटे लिए थे।

1954 में हुई थी इसके ऊपर से कमर्शियल विमानों की शुरुआत 

जहां तक कमर्शियल विमानों के इस क्षेत्र के ऊपर से उड़ान भरने की बात है तो इसकी शुरुआत 15 नवंबर 1954 को लॉस एंजेलिस से कॉपनहैगन जाने वाली डगलस डीसी-6बी विमान की उड़ान से हुई थी। इसके बाद 1955 में वैंकोवर से एम्‍सटर्डम जाने वाली फ्लाइट ने भी इस खतरनाक सफर को सफलतापूर्वक पूरा किया था। 1957 में पैनएम की पेरिस से लंदन जाने वाली फ्लाइट इसी रूट से होकर गई। एयर फ्रांस ने पहली बार 1960 में इस क्षेत्र के ऊपर से गुजरने वाली अपनी पहली कमर्शियल फ्लाइट सेवा शुरू की थी।

सोवियत रूस ने मार गिराया था विमान 

अमेरिका और रूस के बीच शुरू हुए शीत युद्ध के दौरान यहां से गुजरने वाले विमानों ने अपना रास्‍ता बदल लिया था। 1978 में इस क्षेत्र के ऊपर से गुजरते हुए कोरियाई विमान बोईंग 707 को सोवियत रूस ने मार गिराया था। जापान एयरलाइंस ने अप्रैल 1967 में प्रयोगात्‍मक सेवा के रूप में टोक्‍यो से मास्‍को के बीच अपनी विमान सेवा शुरू की थी। लेकिन इसको दो वर्ष बाद ही बंद कर दिया गया था। ये सेवा साइबेरिया के ऊपर से थी। 1983 में फिन एयर ने इस क्षेत्र के ऊपर से उड़ान भरने वाली पहली नॉनस्‍टॉप सेवा शुरू की थी। ये सेवा टोक्‍यो से हैलेंस्‍की के बीच शुरू की गई थी। इससे पहले उत्‍तरी पोल के एंकरेज इंटरनेशनल एयरपोर्ट का इस्‍तेमाल रीफ्यूलिंग के लिए या तकनीकी रूप से किया जाता था।

शीतयुद्ध के बाद कई रूट खुले लेकिन समस्‍याएं भी आईं

शीतयुद्ध के बाद इस हवाई क्षेत्र के ऊपर कई रूट खुले लेकिन यहां पर एयर ट्रेफिक कंट्रोलर, राडार की क्षमता, फंड की कमी, क्षमता की कमी, तकनीकी अव्‍यवस्‍था की दिक्‍कतों के चलते पायलटों को काफी समस्‍या आती थी। इसमें सबसे बड़ी समस्‍या भाषा की थी। इस हवाई क्षेत्र के ऊपर से जाने वाले विमानों को रूसी भाषा वाले एटीसी से तालमेल बिठाना होता था, जो बेहद मुश्किल था। इसके समाधान के तौर पर रशियन अमेरिकन कॉर्डिनेटिंग ग्रुप ऑफ एयर ट्रेफिक का गठन किया गया था।

न्‍यूयॉर्क से हांगकांग की पहली सीधी उड़ान  

7 जुलाई 1998 में पहली बार कैथे पेसेफिक फ्लाइट 889 ने न्‍यूयॉर्क से हांगकांग की सीधी नॉन स्‍टॉप उड़ान भरकर एक नया कीर्तिमान बनाया था। ये उत्‍तरी ध्रुव के अलावा रूस के बर्फीले क्षेत्र से होकर गुजरी थ। इसमें करीब 16 घंटे का समय लगा था। मौजूदा समय में कई विमानन कंपनियां इस क्षेत्र से उड़ान भर रही हैं। इसमें एयर इंडिया भी शामिल है।

Edited By: Kamal Verma