माला दीक्षित, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में जहां एक ओर नए कृषि कानूनों के खिलाफ कई याचिकाएं लंबित हैं जिनमें कोर्ट से कानूनों को रद करने की मांग की गई है, वहीं अब कानूनों का समर्थन करने वाला वर्ग भी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ की दो मैदा मिलों ने कृषि कानूनों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया है कि केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया जाए कि वे इन कानूनों को लागू करें।

जीवन के अधिकार की दुहाई दी

सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका रामवे फूड्स लिमिटेड और आरसीएस रोलर फ्लोर मिल्स लिमिटेड ने वकील डीके गर्ग के जरिये दाखिल की है। मैदा मिलों ने इसमें रोजगार की आजादी और जीवन के अधिकार की दुहाई है। याचिका में कहा गया है कि देश में करीब 2,000 रोलर फ्लोर मिल्स हैं जो बड़े पैमाने पर आटा, मैदा, सूजी और ब्रान का उत्पादन करती हैं। ये मिलें गेहूं की बड़ी उपभोक्ता हैं जिसे वे कच्चे माल के तौर पर खरीदती हैं।

कमेटी में अपने प्रति‍निधियों की मांग

फ्लोर मिलों का कहना है कि वे कृषि उपज के बड़े स्टेक होल्डर (पक्षकार) हैं इसलिए कोर्ट द्वारा गठित कमेटी में उनके प्रतिनिधि भी होने चाहिए ताकि कानूनों का समर्थन करने वाले उन लोगों की मुश्किलों और शिकायतों पर भी विचार हो।

देश के कुल गेहूं का 30 फीसद का करती हैं उपयोग

याचिका में कहा गया है कि रोलर फ्लोर मिल्स देश में कुल गेहूं का करीब 30 फीसद उपयोग करती हैं जिससे आटा, मैदा, सूजी तैयार होती हैं जो आवश्यक वस्तुएं हैं और लोग रोज इनका उपयोग करते हैं। इसके अलावा इनके द्वारा तैयार आटा, मैदा और सूजी का लार्ज एंड स्माल स्केल इंडस्ट्री जैसे बेकरी, बिस्कुट और कंफेक्शनरी उपयोग करती हैं। ये इंडस्ट्रीज थोक और फुटकर दोनों जरूरतों के लिए रोलर फ्लोर मिलों पर निर्भर रहती हैं।

यह भी दलील दी

याचिका में कहा गया है कि चारा उत्पादन इंडस्ट्री, दूध डेयरी आदि भी इन मिलों के प्रोसेस्ड उत्पादों जैसे भूसी आदि का उपयोग करती हैं। ऐसे में यह उनके लिए भी जरूरी है। रोलर फ्लोर मिल्स खुले बाजार और मंडी से थोक में गेहूं खरीदती हैं। ये मिलें माइक्रो, स्माल एंड मीडियम इंटरप्राइजेस की श्रेणी में आती हैं और ये सीधे तथा परोक्ष रूप से लोगों को रोजगार उपलब्ध कराती हैं।

प्रति क्विंटल बचेगा 150-200 रुपये का गैरजरूरी खर्च

याचिका में मौजूदा व्यवस्था की खामियां गिनाते हुए कहा गया है कि ज्यादातर राज्यों में किसानों और व्यापारियों को मजबूरन 150 से 200 रुपये प्रति क्विंटल तक गैरजरूरी खर्च करना पड़ता है। यह रकम विभिन्न मंडियों और थोक बाजारों के मूल्य में अंतर के हिसाब से तय होती है।

कानूनों के प्रविधानों पर हो विचार

नया कानून लागू होने के बाद गेहूं की खरीद मंडी से बाहर भी हो सकती है, ऐसे में फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री जैसे याचिकाकर्ता हैं, सीधे किसान से कच्चा माल यानी गेहूं खरीदेंगे और इससे यह गैरजरूरी खर्च बचेगा। कोर्ट को नए कानूनों के प्रविधानों पर विचार करना चाहिए। इनमें किसानों के हित संरक्षित किए गए हैं और बेचे गए अनाज की रकम तीन दिन के भीतर किसानों को देने का प्रविधान है। ऐसा नहीं होने पर किसान एसडीएम या संबंधित अथारिटी से शिकायत कर सकते हैं। इसलिए ये कानून किसानों और याचिकाकर्ताओं दोनों के हित में हैं।

मौजूदा व्यवस्था की खामियां गिनाई

- कच्ची आढ़त जो मंडी के बिचौलिए को दी जाती है दो फीसद।

- मंडी समिति दो फीसद मंडी शुल्क लेती है।

- इसके अलावा मंडी समिति 0.5 फीसद सेस वसूलती है।

- थोक व्यापारी या आढ़ती दी फीसद कमीशन या आढ़त शुल्क लेते हैं।

- बोरे चढ़ाने-उतारने और बोरे भरने की मजदूरी 1.5 फीसद।

- गेहूं रखने के लिए बोरे की जरूरत होती है। एक क्विंटल का एक बोरा 40 रुपये का आता है। 

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