राजीव पंडित, बागपत। 27 नवंबर की बात है। कुश्ती, नामी पहलवानों और बड़े दंगलों के लिए मशहूर उत्तर प्रदेश का बागपत, जहां बड़ौत में एक दंगल चल रहा था। लंगोट कसे पहलवान, नियम-कायदे समझाते खलीफा और मल्लों के कस-बल देखने को उतावले कुश्ती के शौकीन, जैसा कि आम दंगलों में होता है। पर यहां मौजूद 15 साल की एक लड़की ने इस दंगल को खास बना दिया।

महिला पहलवान अंशिका खोखर ने अखाड़े में उतर खलीफा से कुछ कहा। इस पर खलीफा ने एलान किया- अंडर15 में है कोई लड़का, जो अंशिका की चुनौती स्वीकार सके? फिर क्या था, चारों तरफ सन्नाटा पसर गया। तमाम पहलवानों की अचरज भरी निगाह एक-दूसरे पर टिक गईं। कुछ देर बाद बड़ौत का पहलवान हर्ष अखाड़े में पहुंचा। उसने जैसे ही अंशिका की चुनौती स्वीकार की, अखाड़ा तालियों से गूंज उठा। महिला और पुरुष पहलवान के बीच होने वाली इस कुश्ती को देखने के लिए हर कोई उत्सुक था। अंशिका के मुकाबला जीतते ही यह घटना समाचार-पत्रों और मीडिया की सुर्खियों में शुमार हो गई...।

30 सेकंड चले उस मुकाबले में अंशिका ने कलाजंग दांव से पहलवान हर्ष को चित कर दिखाया था। अंशिका की तरह ही तमाम वर्जनाओं और सीमाओं को ध्वस्त कर देने का आसमानी हौसला रखने वाली धाकड़ बेटियों की नई पौध यहां तैयार हो चुकी है। बागपत को पहलवानों की धरती कहा जाता है, लिहाजा अंदाज लगाया जा सकता है कि यहां कुश्ती को लेकर माहौल कैसा होगा। वर्जनाओं के विपरीत यह नया ट्रेंड एक बड़े सामाजिक बदलाव का भी संकेत है। अंशिका को उलाहनाएं और ताने नहीं बल्कि तालियां और बधाइयां मिलीं। आज यहां कुश्ती सीख रहीं ऐसी अनेक लड़कियों को इस खेल के दिग्गज भी सलाम ठोंकते हैं। इन्हें ये मान-सम्मान यूं ही नहीं मिलता। लोग इनके उस जज्बे से प्रभावित हैं, जो पुरुषों को चुनौती देने का माद्दा रखता है। और, परिवार-समाज इस नए बदलाव को प्रोत्साहित कर रहा है, जोकि खास है, प्रेरक और प्रशंसनीय है।

अंशिका खोखर छपरौली की जिस आर्य व्यायामशाला में दांव-पेच सीख अभ्यास करती है, वहां अंशिका, शिवानी, नेहा, आरती, आशा सहित उन जैसी दो दर्जन लड़कियां और भी हैं। नेहा भी मेरठ और सहारनपुर के दंगलों में पुरुष पहलवानों को हरा चुकी हैं। अखाड़े के खलीफा कृष्णपाल 2008 से बेटियों को कुश्ती के दांव-पेच सिखा रहे हैं। उनके प्रयासों और परिणामों से प्रभावित हो 2017 में भारतीय खेल प्राधिकरण ने इस व्यायामशाला में प्रशिक्षण केंद्र खोला। इनमें से अधिकांश बेटियां शहरों से नहीं बल्कि गांवों से ताल्लुक रखती हैं। अंशिका खोखर हलालपुर गांव की हैं। वह मेरठ और गाजियाबाद में हुई राज्य स्तरीय कुश्ती प्रतियोगिता में एक स्वर्ण और दो रजत पदक जीत चुकी हैं।

करनावल की नेहा ने गाजियाबाद, बुलंदशहर और ग्रेटर नोएडा में हुए दंगल में तीन स्वर्ण पदक जीते। कुरड़ी गांव की शिवानी ने गाजियाबाद, ग्रेटर नोएडा में आयोजित प्रतियोगिताओं में एक स्वर्ण और एक कांस्य पदक जीता। अंशिका, नेहा और शिवानी नेशनल कुश्ती प्रतियोगिता के लिए चयनित हुई हैं। व्यायामशाला से अभ्यास लेकर दोघट निवासी सीमा पंवार ने 2008 में सब जूनियर एशिया चैंपियनशिप में कांस्य पदक जबकि सौरम गोला निवासी अंजू चौधरी ने 2009 में अंकारा में वल्र्ड जूनियर चैंपियनिशप में कांस्य पदक जीता था।

अखाड़े पर लड़कों के साथ कुश्ती का अभ्यास करती हूं। जब भी दंगल में खेलने जाती हूं तो अखाड़े में पहले पुरुष पहलवानों को चुनौती देती हूं। दो बार पुरुष पहलवानों को पटखनी दी है। अखाड़े में पुरुष पहलवानों के साथ लड़ने में न तो संकोच लगता है और ना ही डर। मेरी प्राथमिकता यही रहेगी कि पुरुष पहलवानों को पटखनी देती रहूं। आज जब लड़कियां किसी क्षेत्र में लड़कों से कम नहीं है तो अखाड़े में भी लड़कों से आगे रहना चाहिए।

- अंशिका खोखर, पहलवान

आर्य व्यायामशाला में बालिकाओं को कुश्ती का निश्शुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है। हम चाहते हैं कि ग्रामीण क्षेत्र से बालिकाएं खेलों में आएं। इस अखाड़े की खास बात यह है कि लड़के-लड़कियों में फर्क नहीं किया जाता। अंशिका खोखर और नेहा ने कई दंगलों में पुरुष पहलवानों को पटखनी दी है।

- कृष्णपाल, खलीफा, आर्य व्यायामशाला, छपरौली

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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