सुरेंद्र प्रसाद सिंह, नई दिल्ली। यह बड़ा सवाल है कि हरितक्रांति के बाद आखिर कृषि वैज्ञानिक क्या करते रहे? देश में कृषि वैज्ञानिकों की भारी भरकम फौज है और उन्हें पता है कि हरितक्रांति के बाद अब 'जीन क्रांति' जरूरी है। ऐसी खोज जरूरी है जो क्लाइमेटिक जोन और पानी की उपलब्धता को देखते हुए कृषि उत्पादकता बढ़ा सके। विदेशों में इस पर पूरा ध्यान है, लेकिन अफसोस कि पिछले दो दशकों में भारत में ऐसा कुछ नहीं हुआ जो हमारी खेती को व्यवसाय का रूप दे सके। वैज्ञानिकों के साथ साथ नीति नियंता भी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते हैं जो अनुकूल कानूनी माहौल बनाने में असफल रहे हैं।

कृषि क्षेत्र की चुनौतियां बढ़ी

घटते प्राकृतिक संसाधनों और बढ़ती आबादी की खाद्य सुरक्षा के मद्देनजर कृषि क्षेत्र की चुनौतियां बहुत बढ़ गई हैं। इससे निपटने के लिए अपनायी गई रणनीति के बावजूद कृषि क्षेत्र की विकास दर बढ़ाये नहीं बढ़ रही है। जरूरत के मुताबिक छोटे व सीमांत किसानों को उपयुक्त टेक्नोलॉजी मुहैया कराना संभव नहीं हो पा रहा है। उन्नत प्रजाति के बीज, उचित फर्टिलाइजर, कीटनाशक और एग्रो मशीनरी तैयार करने की कोशिश तो हुई है, लेकिन इसके आगे की जीन टेक्नोलॉजी का उपयोग वैश्विक स्तर पर किया जा रहा है।

संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और पड़ोसी चीन जैसे देशों में इसका प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है। इससे उन देशों में फसलों की उत्पादकता कई गुना तक बढ़ गई है। जबकि भारत में इसके उपयोग पर परोक्ष पाबंदी लगी हुई है। बायो टेक्नोलॉजी विधेयक लंबे समय से संसद में लंबित है, जिसके बगैर इस दिशा में आगे बढ़ना संभव नहीं हो पा रहा है। हालांकि हमें इसका ध्यान रखना होगा कि हमारे किसान भारत की खोज पर निर्भर रहें ताकि मल्टीनेशनल कंपनियों से उनका शोषण न हो सके।

बायो टेक्नोलॉजी

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के एक सौ से अधिक रिसर्च इंस्टीट्यूट और 75 से अधिक कृषि विश्वविद्यालयों समेत बायो टेक्नोलॉजी संस्थानों में तकरीबन साढ़े सात हजार से ज्यादा वैज्ञानिक कार्यरत हैं। कृषि क्षेत्र में उनके योगदान के बारे में जाने-माने किसान नेता कृष्णवीर चौधरी ने कहा हरितक्रांति के बाद इस भारी भरकम फौज की उपलब्धियां बीते दिनों की कहानी बन गई है।

गेहूं की नई प्रजातियां

देश में उदारीकरण के बाद कृषि क्षेत्र में किसानों की जरूरतों के हिसाब से हमारे यहां रिसर्च नहीं हुई। देश का 53 फीसद खेती का रकबा असिंचित है, जिसको ध्यान में रखते हुए न तो उन्नत बीज तैयार किये गये और न ही उपयुक्त टेक्नोलॉजी। वर्ष 1980 के दशक की तैयार गेहूं की दो तीन प्रजातियों का कब्जा देश की दो तिहाई खेती पर है। जबकि गेहूं की लगभग साढ़े चार सौ प्रजातियां विकसित की जा चुकी हैं। ज्यादातर प्रजातियां ऐसी हैं, जिन्हें छह-छह बार सिंचाई की जरूरत पड़ती है। जबकि जरूरत एक दो सिंचाई वाली प्रजाति की है।'

साइंस तो 'सत्यम, शिवम और सुंदरम' है

कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर रामबदन सिंह का कहना है कि देश में कृषि वैज्ञानिकों के कार्यों को कमतर करके नहीं आंकना चाहिए। जलवायु परिवर्तन के बावजूद खाद्यान्न की पैदावार लगातार बढ़ रही है। इस समय जरूरत है किसानों की उपज के को उचित मूल्य दिलाने की, जो उन्हें नहीं मिल पा रही है। संसद में लंबित बायोटेक विधेयक को मंजूरी तत्काल मिलनी चाहिए। कृषि क्षेत्र नीतिगत खामियों की शिकार है। साइंस तो 'सत्यम, शिवम और सुंदरम' है। कभी किसी को साइंस राह में रोड़ा नहीं बनना चाहिए।

भारत रुई के आयातक से निर्यातक देश बन गया

सिंह ने कहा कि 'बीटी कॉटन के भरोसे भारत रुई के आयातक से निर्यातक देश बन गया है। यह टेक्नोलॉजी का ही कमाल है। बायो टेक्नोलॉजी साइंस के विरोधी एनजीओ और कुछ अन्य लोगों को साइंस का गला नहीं घोटना चाहिए। इससे साइंटिस्ट हतोत्साहित होने लगे हैं।

पुरानी टेक्नोलॉजी से उत्पादकता में अपेक्षित वृद्धि नहीं

इस देश में असिंचित क्षेत्रों में भी धान जैसी फसल की खेती होती रही है, जिनकी प्रजातियों को किसानों के स्तर पर संरक्षित किया गया है। जलवायु परिवर्तन के समय ऐसी प्रजातियां अहम हो जाती हैं। फसलों व पशुधन विकास क्षेत्र में पुरानी पड़ चुकी टेक्नोलॉजी का ही उपयोग हो रहा है, जिससे उत्पादकता में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पा रही है। इसी तरह छोटे व सीमांत किसानों के हिसाब से टेक्नोलॉजी नहीं होने से भी खेती प्रभावित हो रही है। खेती के साथ उससे जुड़े उद्यम वाले क्षेत्रों में भी टेक्नोलॉजी की महती जरूरत महसूस की जा रही है। जबकि इन क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं।

कृषि अनुसंधान में बजटीय आवंटन बढ़ाने की जरूरत

नीतिगत स्तर पर कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में बजटीय आवंटन बढ़ाने की जरूरत है। नीति आयोग के स्ट्रेटजी पेपर के मुताबिक फिलहाल कृषि अनुसंधान पर कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल 0.3 फीसद खर्च हो रहा है। इसे बढ़ाकर एक फीसद करने की आवश्यकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थान और कृषि विश्वविद्यालय को कृषि क्षेत्र के इंटीग्रेटेड फार्मिग रिसर्च पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए, जिसमें समूची वैल्यू चेन, उत्पादन, प्रसंस्करण और पोस्ट हार्वेस्ट और अन्य गतिविधियों पर ध्यान देना चाहिए।

Posted By: Bhupendra Singh

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