नई दिल्ली, सुरेंद्र प्रसाद सिंह। कृषि सुधार के रास्ते बंद होने के दूरगामी नतीजे बहुत ही भयावह हो सकते हैं। खेती को घाटे से उबारने की कोशिशों को इससे धक्का लगा है। इससे ग्लोबल बाजार में निर्यात की संभावनाओं के रास्ते बंद हो सकते हैं। कानूनी सुधार के साथ कृषि सब्सिडी के तौर-तरीके में समय रहते बदलाव करना जरूरी होगा। विश्व व्यापार में भारत के अलग-थलग पड़ जाने का जहां गंभीर खतरा है, वहीं कृषि क्षेत्र से निवेशक आंखें फेर सकते हैं।'

किसानों को कानूनी मकड़जाल और सीड टेक्नोलाजी से करना होगा मुक्त

खाद्यान्न के अभाव को दूर करने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी भले ही वरदान साबित हो, लेकिन अधिक पैदावार के समय यही समर्थन मूल्य अभिशाप साबित हो सकता है।' एमएसपी और सरकारी खरीद के लिए गठित तत्कालीनन एलके झा कमेटी की रिपोर्ट के ऐसे कई निष्कर्ष आखें खोलने वाले हैं। दरअसल, रिपोर्ट की इन बातों को नजरअंदाज करना अब भारी पड़ने लगा है। बदलते घरेलू व वैश्विक परिवेश के साथ किसानों को बदलाव के लिए तैयार ही नहीं किया गया। खाद्यान्न उत्पादन में फिलहाल यह देश सरप्लस है। लेकिन उत्पादकता के मामले में घरेलू खेती बहुत पीछे है।

विकसित देशों में विभिन्न फसलों की उत्पादकता के मुकाबले हमारे किसान कहीं नहीं टिकते। वजह साफ है। किसानों के पास जरूरी टेक्नोलाजी नहीं है, जिन्हें पाने में सरकारी कानून बाधा बने हुए हैं। सीड टेक्नोलाजी से देश को परहेज है। हजारों करोड़ रुपये के जीन संवर्धित (जीएम) खाद्य तेल का आयात होता है, जिसे हम खूब खाते हैं। लेकिन खेती में जीएम बीजों के उपयोग से घरेलू किसानों को रोका जाता है। इसके लिए कृषि क्षेत्र में कानूनी सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना ही होगा।

बागवानी, डेयरी, और मत्स्य जैसे गैर-एमएसपी वाले कृषि क्षेत्र की विकास दर सर्वाधिक

वैश्विक बाजार की मांग के अनुरूप घरेलू खेती में परिवर्तन नहीं किया गया तो हमारे उत्पाद बाजार से बाहर हो सकते हैं। इस खतरे को समय से पहले भांप कर अपनी तैयारियां करनी ही होंगी। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के सदस्य देश होने के नाते वर्ष मौजूदा कृषि सब्सिडी को वर्ष 2023 के बाद आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर किसानों को टेक्नोलाजी पर लगे प्रतिबंधों और मंडी समेत अन्य कानूनी जंजालों से बचाने की जरूरत है।डब्ल्यूटीओ के पूर्व निर्धारित प्रविधान के अनुसार वर्ष 2023 के बाद कृषि व खाद्य क्षेत्र में केवल ग्रीन अथवा येलो (बाक्स) श्रेणी में ही सब्सिडी देना संभव हो सकेगा जो पर्यावरण के अनुकूल हो। ऐसे में अब उन्हीं तरीकों से सब्सिडी दी जा सकती है, जिसकी शुरुआत पीएम-किसान निधि से कर दी गई है।

भारतीय कृषि को लग सकता है बड़ा धक्का

डब्ल्यूटीओ के नियमों की अवहेलना करने पर कृषि उपज और खाद्य उत्पादों के निर्यात पर रोक लग सकती है। इससे भारतीय कृषि को बड़ा धक्का लग सकता है। कोविड-19 के प्रकोप के पिछले दो वर्षो के दौरान भारतीय कृषि उत्पादों की वैश्विक मांग में भारी बढ़ोतरी हुई है। वर्तमान में भारतीय कृषि उत्पादों पर दी जाने वाले सब्सिडी के तौर-तरीकों पर आपत्तियां की जा रही हैं। भारतीय गेहूं की गुणवत्ता पर उठे सवाल के चलते इसके निर्यात की संभावनाएं क्षीण होने लगी हैं। गन्ने का मूल्य सरकार द्वारा निर्धारित करने और उसे वैधानिक बनाने का विपरीत असर चीनी उद्योग पर दिख रहा है। घरेलू कृषि उत्पादों की पूरी श्रृंखला में कई तरह की विसंगतियां हैं, जिन्हें दूर करनी ही होगी।

कृष‍ि को संतुलित करने की जरूरत

बिजली सब्सिडी, खाद्य सब्सिडी, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर उपज खरीद की गारंटी, उपभोक्ताओं को अति रियायती और मुफ्त अनाज वितरण जैसे प्रविधान को संतुलित करने की जरूरत है। सिर्फ गेहूं व चावल जैसी फसलों की सरकारी खरीद के लिए 1.60 लाख करोड़ रुपये की जरूरत होती है। वहीं, उपभोक्ताओं को राशन प्रणाली के तहत एक, दो और तीन रुपये प्रति किलो की दर पर अनाज वितरण में ढाई लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी देनी पड़ती है। खेती के लिए फर्टिलाइजर में यूरिया को छोड़ बाकी आयातित फर्टिलाइजर भारी सब्सिडी देकर किसानों को दिया जाता है।

जिन उत्पादों पर सब्सिडी नहीं, उनकी विकास दर बेहतर

कृषि के प्रमुख क्षेत्र डेयरी, मत्स्य (फीसरीज) पोल्ट्री और बागवानी (हार्टिकल्चर) जैसे प्रमुख क्षेत्रों को किसी तरह की सरकारी मदद अथवा सब्सिडी नहीं दी जाती है। इन उत्पादों के लिए न एमएसपी घोषित है और न सरकारी खरीद का कोई प्रविधान है। इसके बावजूद इन सेक्टरों की ग्रोथ आठ से 16 प्रतिशत तक दर्ज की जा रही है। कृषि क्षेत्र की ग्रोथ में इनकी हिस्सेदारी सर्वाधिक है। वैश्विक बाजार में मत्स्य और समुद्री उत्पादों की जबरदस्त मांग है। वहीं, भारत समुद्री उत्पाद निर्यात में दूसरे नंबर का देश बन चुका है।

Edited By: Arun Kumar Singh