नई दिल्ली [अनिल झा]। समाज की पुरानी मान्यताएं कभी व्यर्थ नहीं होतीं, ऐसा कई बार प्रमाणित हो चुका है। निसंदेह सकारात्मक आधुनिकता ने हमारे जीवन को परिवर्तित किया है, चाहे वह विज्ञान हो, ज्ञान हो, कला हो या ऊर्जा हो।

हमारा मस्तिष्क और हमारे सभी अंग शरीर को मिलने वाली ऊर्जा से चलते हैं। लेकिन वर्तमान समय में युवाओं और बच्चों का शारीरिक और मानसिक ऊर्जा का शोषण होता जा रहा है। हमारी लापरवाही से छात्रों और युवाओं का शारीरिक और मानसिक शोषण हो रहा है। संचार के विभिन्न माध्यमों को हमने अपने जीवन में व्यापकता से रचा-बसा लिया है, ऐसा प्रतीत होता है।

इसका दुष्परिणाम हमारे सामने आ चुका है कि काल्पनिक मोबाइल गेम बच्चों के दिमाग पर छाते जा रहे हैं, जिससे उनकी शारीरिक क्षमता प्रभावित हो रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मेडिकल साइंस ने व्यापक प्रगति की है। लेकिन दूसरी ओर हम अपने रहन-सहन की स्थिति में आए बदलाव को देखें तो हमारे शहरी क्षेत्र के बच्चों का बचपन एक कमरे में कैद हो गया है।

उसी कमरे से वह काल्पनिक सामूहिक खेल खेलते हैं, एंड्रॉयड फोन के माध्यम से। किसी का बचपन उसके संपूर्ण जीवन को प्रभावित करता है यह प्रमाणित सत्य है। लेकिन खानपान से लेकर खेलने की प्रक्रिया में आए व्यापक बदलाव की यात्र में हमारे बच्चों के बचपन की सौम्यता, सौंदर्य, बुद्धिमत्ता, संस्कार, अपनत्व, करुणा, चंचलता, निपुणता और साक्षरता पर तो विपरीत प्रभाव पड़ा ही है, साथ ही उसने बच्चों के मन पर भी डाका डाला है।

दरअसल व्यापक संख्या में छात्र और युवा ऑनलाइन गेम के इस कदर शिकार हो गए हैं कि उनकी परिवार-समाज के प्रति व्यावहारिक संवेदना खत्म होती जा रही है। फास्टफूड संस्कृति ने उनका खानपान भी प्रभावित कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में मन की बात में कहा और उद्योग जगत से आग्रह भी किया है कि हमारे देश में इतने आइडियाज व कांसेप्ट हैं, तो फिर हम ऐसे गेम बनाने में क्यों नहीं सक्षम होते जिनके माध्यम से अपने बच्चों को देश के गौरवशाली अतीत से जोड़ सकें, उसके बारे में बता सकें।

उन्होंने बार बार इस बात पर जोर दिया है कि बच्चों को ऐसा परिवेश मिलना चाहिए जिसमें उनका समुचित शारीरिक विकास सुनिश्चित हो सके। आज हम देख रहे हैं कि किस प्रकार का संचार क्रांति का औपनिवेशिक हमला हमारे बच्चों पर किया जा रहा है। इस पर व्यापक गहन चिंतन करके सरकार व समाज को और माता-पिता को आगे बढ़ना ही पड़ेगा। अन्यथा हम अपने बच्चों को स्वयं से दूर करते जाएंगे। 

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज की एक रिपोर्ट के अनुसार उनके यहां अभी 150 से ज्यादा ऐसे मामले आए हैं, जिनमें पब्जी का नकारात्मक असर पाया गया है। पब्जी समेत तमाम ऑनलाइन गेम के कारण युवाओं और छात्रों में विपरीत प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है, यह भी इस रिपोर्ट से पता चलता है। इस पर भी हमें विचार करना पड़ेगा। पिछले दिनों एक खबर आई थी कि पंजाब के एक छात्र ने अपने दादा के बैंक खाते से संबंधित एक कार्ड से पांच लाख रुपये ऑनलाइन गेम खेलने के क्रम में खर्च कर दिए। दरअसल मामले की जांच होने पर यह पता चला कि पब्जी जैसे डिजिटल गेम खेलने के क्रम में इस छात्र ने इतनी बड़ी रकम को खर्च कर दिया।

देखा जाए तो यह बच्चा न केवल ¨हसक हो रहा था, बल्कि उसमें चोरी की प्रवृत्ति भी बढ़ रही थी। आखिर यह कैसा खेल है, जो हमारे बच्चों के जरिये हमें आर्थिक रूप से पंगु बना रहा है। पूरे विश्व में छात्रों और युवाओं को इस तरह के गेम ने अपना दीवाना बना दिया है। इस तरह के घटनाक्रमों को देखकर ऐसा महसूस होता है कि इन कंपनियों ने इस मसले पर जबरदस्त शोध किया होगा कि बच्चों को कैसे मानसिक रोगी बना दिया जाए। ऐसे में सरकार के संबंधित विभाग को आगे आना चाहिए और इस मामले से जुड़े विविध नकारात्मक पहलुओं को रेखांकित करते हुए उन पर रोक लगाने का प्रयास करना चाहिए।

एक उपाय यह किया जा सकता है कि इस तरह के एप को किसी भी एंड्रॉयड फोन पर लगातार एक-दो घंटे से अधिक देर तक संचालित नहीं होने देना चाहिए। हालांकि इससे यह भी हो सकता है कि इन्हें संचालित करने वाली कंपनियां कुछ नए रास्तों की तलाश करें, लेकिन तब तक बच्चों को इसकी आदत से छुटकारा दिलाया जा सकता है। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत के डिजिटल स्ट्राइक के माध्यम से ही चीन को 8.4 करोड़ डॉलर तक का नुकसान होने की आशंका है।

हैरानी की बात यह कि भारत में पब्जी गेम को लगभग 22 करोड़ युवाओं ने डाउनलोड किया था। विश्व में 24 प्रतिशत पब्जी के दीवाने केवल भारत में ही थे। ऐसे में पब्जी समेत इस प्रकार के अन्य और एप को प्रतिबंधित करने के पश्चात सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रलय द्वारा जारी आदेश में कहा गया कि भारत की संप्रभुता, अखंडता व निजी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इन एप पर पाबंदी लगाई जा रही है। मंत्रलय के अनुसार इस कदम से करोड़ों भारतीय मोबाइल उपयोगकर्ताओं के हितों की रक्षा होगी। साथ ही इससे हमारे छात्र और युवा स्मार्टफोन में गेम खेलने के बजाय घर से बाहर खेले जाने वाले शारीरिक कसरत वाले खेलों के प्रति उत्सुक होंगे। 

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