नई दिल्ली/गुरदासपुर(जेएनएन)। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की घोषणा के बाद मोसुल में मारे गए 39 भारतीयों के परिवारों पर मानों वज्रपात हो गया है। सभी के मन में उम्मीद की किरण बाकी थी कि उनका रिश्तेदार एक दिन घर लौटेगा। गौरतलब है कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने मंगलवार को संसद में घोषणा की कि पूरे सबूत मिलने के बाद मैं कह सकती हूं कि सभी 39 लोगों की मौत हो चुकी है।

पंजाब, बिहार, हिमाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल के ये 39 लोग इराक के निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले भारतीय श्रमिक थे और साल 2014 में वहां के शहर मोसुल में इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने इनका अपहरण कर लिया था। इसके बाद से उनका कोई पता नहीं चला था। अब इनके पार्थ‍िव शरीर बादुश की एक पहाड़ी से हासिल हुए हैं। 

डीएनए रिपोर्ट देखना चाहते हैं परिजन
मारे गए सभी लोगों के परिवारों का एक ही तरह की शिकायत या गुस्सा है। इराक में मारे गए 39 लोगों में से एक के परिजन मल्कित राम ने कहा कि मेरे भाई 2012 में इराक गए थे और वहां वह एक कारपेंटर का काम करते थे। हमने विदेश मंत्रालय से प्रूफ मांगा कि वह जिंदा हैं या मर गए। हम डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट की मांग करते हैं।

अपने भाई मजिंदर की मौत की सूचना पर उनकी बहन गुरपिंदर कौर ने कहा कि चार साल से विदेश मंत्री हमसे कह रही थीं कि वे जिंदा हैं। मैं अब किस पर भरोसा करूं। मैं उनसे बात करना चाहती हूं। हमें अभी तक कोई सूचना नहीं मिली है। हमने बस संसद में उनका बयान सुना है। गुरपिंदर ने कहा कि वह डीएनए रिपोर्ट देखना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि हम सरकार से मांग करते हैं कि हमें डीएनए रिपोर्ट दिखाई जाए। 

हरजीत अौर सरकार के दावे में फर्क
इराक के मोसुल में 2014 में आईएस के आतंकियों के चंगुल से एकमात्र जिंदा बच निकले भारतीय हरजीत मसीह के खुलासे और सरकार के दावे में फर्क नजर आ रहा है। हरजीत ने भारत आने पर कहा था कि उसकी आंखों के सामने 39 भारतीयों को गोली मार दी गई थी। सरकार ने उसे तब स्वीकार नहीं किया था। सुषषमा स्वराज ने मंगलवार को रास में दिए बयान में भारतीयों की मौत की बात तो कबूल की लेकिन हरजीत की बाकी कहानी को झूठ बताया। पंजाब के गुरदासपुर के फतेहग़़ढ चू़ि़डयां के गांव काला अफगाना निवासी हरजीत मसीह ने एक बार फिर मीडिया के सामने आकर कहा कि सरकार ने उसकी बात नहीं मानी। उधर मृतकों के परिजनों और कांग्रेस ने सरकार पर उन्हें व देश को अंधेरे में रखने का आरोप लगाया है।

एक कैटरर के हवाले से सुषमा ने किए यह खुलासे
-जब आईएस ने मोसूल पर कब्जा किया तो अधिकांश इराकी भाग निकले थे, लेकिन भारतीय व बांग्लादेशी वहीं ठहर गए।
-एक कैटरर ने पूछताछ में बताया कि आतंकियों ने उन्हें पकड़ा तब वे खाना खाकर लौट रहे थे।
-सबसे पहले उन्हें मोसूल की एक कपड़ा फैक्टरी में बंधक रखा गया। वहां बांग्लादेशी श्रमिकों को अलग कर इरबिल शहर भेज दिया।
-कैटरर ने बताया कि उसे 'अली' (हरजीत मसीह) नाम के एक व्यक्ति ने फोन कर कहा कि वह बांग्लादेश का है। उसे आईएस के निर्देश के अनुसार इरबिल भेजा जाए।
-बाद में मसीह ने इरबिल से सुषमा स्वराज को फोन किया, लेकिन उसने यह नहीं बताया कि वह इरबिल कैसे पहुंचा।
-दरअसल हरजीत ने अपनी पहचान 'अली' बनकर छिपाई और कैटरर द्वारा बांग्लादेशियों को इरबिल जाने के लिए बुलाई गई वैन में बैठ गया।
-अगले दिन भारतीयों की गिनती हुई तो एक कम निकला। शेष सभी को बदोश ले जाया गया। यहीं सभी की हत्या कर दी गई।
-हरजीत मसीह ने जो घटनाक्रम बताया वह उट-पटांग था। 

मेरे सामने सब को मारी गोली : मसीह

-'विदेश मंत्री आज बता रही हैं कि इराक में लापता 39 भारतीयों की लाशें पहाड़ी खोदकर निकाली गई हैं, लेकिन मैं तो चार साल से यह बात कह रहा हूं।
-आईएस के आतंकियों ने मेरे सामने सभी को पहाड़ी पर ले जाकर गोली मारी थी।
-मैं अन्य 39 भारतीयों के साथ इराक की एक कंपनी में काम करता था।
-वहां 60 बांग्लादेशी भी थे। 2014 में जब इराक पर आतंकियों ने कब्जा किया तो एक रात करीब नौ बजे सभी लोगों को गाड़ी में बैठा कर सुनसान जगह पर ले गए।
-यहां दो दिन रखने के बाद बांग्लादेश के नागरिकों को भारतीयों से अलग कर दिया।
-इसके बाद उसे समेत सभी भारतीयों को गोली मार दी गई।
-किस्मत से एक गोली उसकी टांग से छूकर निकल गई और वह भाग निकला।
-आतंकियों ने उसे फिर पकड़ लिया। उसने वहां खुद को बांग्लादेशी और नाम अली बताया।
-वहां से उसे बांग्लादेशी कैंप भेजा गया और वहां से वह भारत लौट आया।

मसीह को एक साल तक रखा गया जेल में
हरजीत मसीह ने बताया कि भारत आने के बाद उसे एक साल तक दिल्ली में जेल में रखा गया। उससे पूछताछ की जाती रही। गोली मारने वाली बात पर किसी ने उसका यकीन नहीं किया। चंढञीगढ़ में भी वह मीडिया के सामने आया था और गोली का निशान भी दिखाया था। वह 2013 में अन्य लोगों के साथ इराक गया था।

8-10 दिन लगेंगे शव भारत लाने में : सिंह
विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह ने बताया कि इराक से 39 भारतीयों के शव लाने में आठ से दस दिन लगेंगे, क्योंकि कानूनी प्रक्रिया पूरी करना होगी। विशेष विमान से शव लाकर उन्हें उनके परिजनों को सौंप दिया जाएगा। सिंह ने कहा कि उन्होंने कहा कि विपक्ष मामले को गलत रंग दे रहा है। बगैर सबूतों व पुष्टि के किसी को मृत नहीं माना जा सकता।

तलाश के दौरान फर्श पर सोए विदेश राज्यमंत्री सिंह
सुषमा स्वराज ने बताया कि जब आईएस के कब्जे से मोसूल को फिर आजाद करा लिया गया तब लापता भारतीयों की तलाश शुरू हुई। विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह की तारीफ करते हुए कहा कि वे खुद इस काम के लिए इराक गए। भारतीय राजदूत व एक इराकी अफसर के साथ सिंह बदोश की जेल पहुंचे, जो भारतीयों की अंतिम लोकेशन थी। सर्च अभियान के दौरान ये तीनों एक छोटे से घर में फर्श पर सोए। स्थानीय लोगों ने सामूहिक कब्र का ठिकाना बताया।

 कई सवाल रह जाएंगे अनुत्तरित

..उठे ये बड़े सवाल
-मौत के बारे में पहली बार ठोस जानकारी कब मिली?
-आईएस की तरफ से फिरौती के लिए क्या कभी संपर्क साधा गया?
-जिंदा बचे मसीह की बातों पर क्यों नहीं किया गया भरोसा?

Posted By: Sanjeev Tiwari

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