नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। बॉलीवुड की टॉप हीरोइनों को कथक सिखाकर अपने इशारों पर नचाने वाली मशहूर कथक डांसर सितारा देवी भारत की प्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना थीं। आपको जानकर हैरानी होगी कि जन्‍म होते ही मुंह टेढ़ा होने की वजह से इनको माता-पिता ने खुद से दूर कर दिया था, महज आठ साल की उम्र में इनका विवाह कर दिया गया था। 'धन्‍नो' से 'कथक क्‍वीन' का खिताब हासिल करने वालीं विख्‍यात नृत्‍यांगना सितारा देवी का आज जन्‍मदिन है तो चलिए आइए आपको उस शख्‍सयित के जीवन से रूबरू कराते हैं, जिन्‍होंने अपनी कथक कला से पूरी दुनिया में एक अमिट छाप छोड़ी, जिनका नाम लेते ही आंखों के सामने उनका चेहरा, उनकी मनमोहक भाव-भंगिमाएं छा जाती हैं और वो आपको एक अलग ही दुनिया में ले जाती हैं।

जन्‍म होते ही सौंप दिया दाई को

सितारा देवी का जन्म 8 नवंबर 1920 को कलकत्ता में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से वाराणसी से था। उनके पिता सुखदेव महाराज भी एक कथक नृत्‍यकार और संस्‍कृत के विद्वान थे। वहीं माता मत्स्य कुमार के नेपाल के शाही परिवार से संबंध थे। मगर आपको जानकर हैरानी होगी कि सितारा देवी आठ साल की उम्र तक अपने माता-पिता से मिल नहीं पाई थी। बताया जाता है कि जन्म से सितारा देवी का मुंह टेढ़ा था और बेटी का टेढ़ा मुंह देखकर उनके माता-पिता डर गए। माता-पिता ने सितारा देवी को पालने के लिए एक दाई को सौंप दिया और आठ साल तक वे अपने माता-पिता से दूर रहीं।

इस वजह से धन्‍नो पड़ गया नाम

सितारा देवी का मूल नाम धनलक्ष्मी था और घर में उन्हें धन्नो कहकर पुकारा जाता था। इसकी वजह यह थी कि उनका जन्‍म धनतेरस को हुआ था और इसी वजह से सितारा देवी का नाम धन्‍नो पड़ गया।

स्‍कूल जाने की जिद में टूट गई शादी

सिर्फ आठ साल की उम्र में सितारा देवी का विवाह कर दिया गया। मगर स्कूल जाने की जिद के चलते यह टूट गया। विवाह टूटने के बाद उन्होंने पढ़ाई की और नृत्य भी सीखा।

...और बन गईं सितारा देवी

उस समय एक अखबार ने सितारा देवी के नृत्य प्रदर्शन के बारे में लिखा था- एक बालिका धन्नो ने अपने नृत्य प्रदर्शन से दर्शकों को चमत्कृत किया। इस खबर को उनके पिता ने भी पढ़ा और बेटी के बारे में उनकी राय बदल गई। इसके बाद धन्नो का नाम सितारा देवी रख दिया गया और उनकी बड़ी बहन तारा को उन्हें नृत्य सिखाने की जिम्मेदारी सौंप दी गई।

फिल्‍म इंटरवल में देती थीं प्रस्‍तुति

सितारा देवी ने शंभु महाराज और पंडित बिरजू महाराज के पिता अच्छन महाराज से भी नृत्य की शिक्षा ग्रहण की। 10 वर्ष की उम्र होने तक वह एकल नृत्य का प्रदर्शन करने लगीं। अधिकतर वह अपने पिता के एक मित्र के सिनेमाहाॅल में फिल्म के बीच में पंद्रह मिनट के मध्यान्तर के दौरान अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया करती थीं।

मुंबई से बदली दुनिया, फिर बढ़ती चली गई...

नृत्य की लगन के कारण सितारा देवी को स्कूल छोडना पड़ा और 11 वर्ष की उम्र में उनका परिवार मुंबई चला गया। मुंबई में उन्होंने जहांगीर हाल में अपना पहला सार्वजनिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया और उसके बाद कथक को लोकप्रिय बनाने की दिशा में वह आगे बढ़ती चली गईं और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। देश-विदेश में अपने कार्यक्रमों से लोगों को मंत्रमुग्‍ध करने लगीं और देखते ही देखते अपने नाम की पहचान बनाने में कामयाब रहीं।

तब पूरी रात जमती थी कथक की महफिल

सितारा देवी के कथक में बनारस और लखनऊ घराने के तत्वों का सम्मिश्रण दिखाई देता है। वह उस समय की कलाकार हैं, जब पूरी-पूरी रात कथक की महफिल जमी रहती थी। यह भी उल्लेखनीय है कि सितारा देवी न सिर्फ कथक बल्कि भारतनाट्यम सहित कई भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों और लोकनृत्यों में पारंगत थीं। उन्होंने रूसी बैले और पश्चिम के कुछ और नृत्य भी सीखें थे।

कथक को बॉलीवुड में किया मशहूर

60 दशक से भी ज्यादा समय तक एक प्रतिष्ठित नृत्‍यांगना रहीं सितारा देवी ही इस विधा को बॉलीवुड में लेकर आईं। वहीं मधुबाला, रेखा, माधुरी दीक्षित और काजोल जैसी बॉलीवुड की टॉप की हीरोइनों को कथक सिखाकर अपने इशारों पर नचाया भी। उन्होंने मदर इंडिया, वतन, वतन समेत कई फिल्मों में काम किया।

ठुकरा दिया था पद्मश्री जैसा पुरस्‍कार

सितारा देवी को 1969 में संगीत नाटक अकादमी सम्मान मिला। 1975 में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार की घोषणा की गई, लेकिन उन्होंने ये इसे ये कहते हुए ठुकरा दिया कि इस जगत में उनका योगदान बहुत बड़ा है और वो भारतरत्न से कम की उम्मीद नहीं रखतीं।

टैगोर ने दी नृत्य सम्राज्ञी की उपाधि

मात्र 16 वर्ष की आयु में सितारा देवी के प्रदर्शन को देखकर भावविभोर हुए गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने उन्‍हें नृत्य सम्राज्ञी की उपाधि दी थी। 94 साल की उम्र में उन्‍होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 

Posted By: Sanjay Pokhriyal