पूर्व सीईसी रावत और कुरैशी ने एसआईआर पर उठाए सवाल, कहा- फॉर्म-6 में बदलाव अवैध
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत और एसवाई कुरैशी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और फॉर्म-6 में बदलाव पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

पूर्व सीईसी रावत और कुरैशी ने एसआईआर पर उठाए सवाल। (फाइल)
HighLights
पूर्व सीईसी रावत ने एसआईआर को मतदाताओं में डर पैदा करने वाला बताया।
फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को पूरी तरह गलत और अवैध करार दिया।
कुरैशी ने अवैध मतदाता सूची पर चुनाव कराने की वैधता पर सवाल उठाया।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को एक ऐसी व्यवस्था करार दिया जिसने मतदाताओं के मन में डर पैदा कर दिया है। उन्होंने कहा कि वैधानिक मतदाता पंजीकरण फॉर्म-6 में किए गए बदलाव ‘पूरी तरह गलत और अवैध’ हैं।
एक अन्य पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) एसवाई कुरैशी ने सवाल उठाया कि क्या कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण पुनरीक्षण प्रक्रिया के माध्यम से तैयार की गई मतदाता सूचियों के आधार पर चुनाव कराए जा सकते हैं?
एक अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने उनकी जानकारी के बिना जारी किए गए फैसलों और आदेशों पर बार-बार आपत्ति जताई थी। पिछले 10 महीनों में दोनों आयुक्तों ने मतदाताओं के पंजीकरण और नाम हटाने से लेकर फॉर्म-6 में बदलाव जैसे मुद्दों पर कड़ी आपत्ति दर्ज की थी।
वर्ष 2018 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे रावत ने कहा-‘निर्वाचन आयोग में ऐसा शायद ही कभी हुआ होगा। मैं भी वहां रहा हूं, लेकिन मैंने देखा कि फैसले हमेशा सर्वसम्मति से लिए जाते थे।’ उन्होंने कहा कि एसआईआर के जरिये एक ऐसी व्यवस्था खड़ी हो गई है, जो मतदाताओं के बीच डर पैदा कर रही है। यह अच्छी बात नहीं है। हमारे लोकतंत्र के लिए यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
रावत ने कहा, ‘निर्वाचन आयुक्तों ने जो कहा है कि प्रपत्र-6 में गलत तरीके से संशोधन किया गया, कानून में इसका कोई प्रविधान नहीं है।’ कुरैशी ने कहा कि यदि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की पूरी प्रक्रिया ही अवैध रही है, तो आप अवैध मतदाता सूची के आधार पर चुनाव नहीं करा सकते।
कुरैशी ने यह भी पूछा कि यदि दो आयुक्त प्रमुख फैसलों से सहमत नहीं थे, तो एसआईआर कराने का निर्णय किसने लिया था? उन्होंने कहा-‘आप भारत के लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते। यह कोई खिलौना नहीं है।’
रावत ने मतदाता सूची के डाटाबेस पर नियंत्रण को केंद्रीकृत किए जाने की भी कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि यदि सॉफ्टवेयर इस तरह बनाया गया है कि क्षेत्रीय अधिकारी बदलाव नहीं कर सकते, तो यह पूरी तरह अवैध है।
रावत ने कहा कि इन घटनाक्रम से निर्वाचन आयोग पर जनता के भरोसे को और नुकसान पहुंचने का खतरा है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्था के सदस्यों के रूप में दोनों निर्वाचन आयुक्तों की जिम्मेदारी थी कि वे अनुचित कार्रवाइयों को रोकें।
संधू और जोशी में से किसी ने भी सामने आए मतभेदों या अपनी आपत्तियों के बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 के तहत आयोग के कामकाज को यथासंभव सर्वसम्मति से संचालित किया जाना जरूरी है।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
