नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि दिल्ली तकनीकी विश्वविद्यालय [डीटीयू] को भेदभाव से बचने के लिए प्रवेश में विकलांग उम्मीदवारों को अनुसूचित जाति व जनजाति के उम्मीदवारों के समान आरक्षण देना होगा।

न्यायालय ने कहा कि डीटीयू द्वारा विकलांग उम्मीदवारों को प्रवेश में मात्र पांच प्रतिशत छूट देना भेदभाव है, क्योंकि विश्वविद्यालय ने अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों को 10 प्रतिशत छूट दी है। न्यायालय ने विश्वविद्यालय से कहा कि वह विकलांग उम्मीदवारों को भी इतनी ही छूट प्रदान करे।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति एके सीकरी और न्यायमूर्ति राजीव सहाय एंडला की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि विकलांगता से पीड़ित लोग यदि ज्यादा नहीं तो कम से कम एससी/एसटी के समान तो सामाजिक रूप से पिछड़े ही है, और इसलिए संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार वे कम से कम एससी/एसटी उम्मीदवारों को दी गई छूट के समान छूट के हकदार है।

पीठ कानून से संबंधित एक प्रश्रन् को सुलझा रही थी, जिसमें आरक्षिण श्रेणी के तहत इंजीनियरिंग कॉलेज में विकलांग उम्मीदवारों के लिए प्रवेश में छूट की मात्रा तय करनी थी।

न्यायालय के समक्ष प्रश्रन् यह था कि क्या डीटीयू में बीटेक कार्यक्रम में प्रवेश के लिए विकलांग उम्मीदवारों को एससी/एसटी के समान छूट दिया जाए या नहीं।

न्यायालय का निर्देश 50 प्रतिशत विकलांग अनमोल भंडारी द्वारा दायर एक याचिका पर सामने आया है।

भंडारी ने डीटीयू के उन प्रावधानों को चुनौती दी थी, जिसमें एससी/एसटी उम्मीदवारों को आवश्यक न्यूनतम अहर्ता के अंकों में 10 प्रतिशत की छूट दी गई है, लेकिन विकलांग उम्मीदवारों के लिए यह छूट मात्र पांच प्रतिशत ही है।

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