नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। देश में ई कचरे की मात्रा में लगातार इजाफा होता जा रहा है। जिस हिसाब से देश में ई कचरा पैदा हो रहा है उस हिसाब से उसके निपटारे की व्यवस्था नहीं है जिसकी वजह से इसमें लगातार इजाफा हो रहा है। इस वजह से देश के तमाम हिस्सों में लगातार ई कचरे के ढेर में इजाफा होता जा रहा है। एक सर्वे में ये बात भी सामने आ चुकी है कि विश्व में 5 बड़े ई कचरा उत्पादन करने वालों में भारत का भी नाम है। इसके अलावा इस सूची में चीन, अमेरिका, जापान और जर्मनी है। एक अध्ययन में बताया गया है कि दुनिया भर में उत्पन्न ई-कचरे की मात्रा 3.15% की दर से बढ़ने की उम्मीद है, जिसके कारण साल 2018 का अनुमान 47.55 मीट्रिक टन लगाया जा रहा है। ई-कचरे में मौजूद सभी कच्चे माल का 2016 में कुल मूल्य लगभग 61.05 अरब डॉलर है, जो दुनिया के अधिकांश देशों के जीडीपी से अधिक है।

ई-वेस्ट क्या है?
अक्सर देखा जाता है कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को हम इस्तेमाल तो करते हैं मगर जब वो खराब हो जाते हैं तो हम उनको यहां वहां फेंक देते हैं। उनके स्थायी निपटारे के लिए कोई व्यवस्था नहीं होती है। यदि हम ऐसे वेस्ट को कूड़े में फेंक देते हैं तो वहां से भी उसका स्थायी समाधान नहीं हो पाता है। एक बार इलेक्टानिक की जो चीज आ जाती है वो कभी खत्म नहीं होती है। इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट की एक सीधी सपाट परिभाषा ये है कि हम जिन उपकरणों को लम्बे समय तक प्रयोग करने के पश्चात उसको यहां वहां फेंक देते हैं, उनको स्थायी रूप से नष्ट नहीं किया जाता है। जैसे कम्प्यूटर, मोबाईल फोन, प्रिंटर्स, फोटोकॉपी मशीन, इन्वर्टर, यूपीएस, एलसीडी/टेलीविजन, रेडियो/ट्रांजिस्टर, डिजिटल कैमरा, टीवी, मदर बोर्ड, माउस, चिप, सिम, वॉशिंग मशीन, की-बोर्ड, ईयर फोन, चार्जर, कैथोड रे ट्यूब (सीआरटी), प्रिंटेड सर्किट बोर्ड(पीसीबी), कॉम्पैक्ट डिस्क, हेडफोन, एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर आदि। 

कितना पैदा हो रहा ई वेस्ट
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में लगभग 600 लाख मीट्रिक टन ई-कचरा जनित होता है। साल 2005 में भारत में जनित ई-कचरे की कुल मात्रा 1.47 लाख मीट्रिक टन थी। जोकि वर्ष 2012 में बढ़कर लगभग 8 लाख मीट्रिक टन हो गई है। भारत में जनित ई-कचरे की मात्रा में लगातार वृद्धि हो रही है। ई-कचरे की वैश्विक मात्रा साल 2016 में 4.47 करोड़ टन थी इसके 2021 तक 5.52 करोड़ टन तक पहुंचने की संभावना है। भारत में करीब 21.50 लाख टन सालाना ई-कचरा पैदा होता है।

ई-वेस्ट से हानिकारक तत्वों का होता उत्सर्जन
ई-कचरे को जब तोड़ा या फेंका जाता है तो इनसे मरकरी, लेड, ग्लास, जिंक, जस्ता, क्रोनियम, टंगस्टन आदि अन्य हानिकारक तत्वों का उत्सर्जन होता है। जो हवा, जल में मिलकर आपके शरीर में पहुंचते हैं और बीमार करते हैं। यह तत्व जमीन में मिलकर मिट्टी की उर्वरक क्षमता को भी नष्ट करते हैं। यह तत्व मिट्टी में घुलकर पोषक तत्वों के साथ पैदा होने वाले अनाज में मिलकर आपके शरीर तक पहुंचकर नुकसान पहुंचाते हैं। ई-वेस्ट से निकलने वाले केमिकल लिवर, किडनी पर असर डालने के अलावा कैंसर, लकवा जैसी बीमारियों का कारण बन रहे हैं। सिर्फ इंसान ही नहीं, इस कचरे से जमीन भी खराब हो रही है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने कुछ साल पहले जब सर्किट बोर्ड जलाने वाले एक इलाके के आसपास रिसर्च कराई, तो पूरे इलाके में बड़ी तादाद में जहरीले तत्व मिले, जिनसे वहां काम करने वाले लोगों को कैंसर होने की आशंका जताई गई। इस तरह के कई मामले अलग-अलग राज्यों में प्रकाश में भी आ चुके हैं।

भारत में ई वेस्ट के बाजार का आकार
वर्तमान में भारत में ई-कचरे के बाजार का आकार 3.2 मिलियन मैट्रिक टन है और 2020 तक इसके 20 मिलियन मैट्रिक टन पहुंचने का अनुमान है। मौजूदा स्थिति में ई वेस्ट 25,000 करोड़ रु. का उद्योग है और अनुमान है कि 2020 तक ये आंकड़ा 25,000 करोड़ रुपये तक का हो जाएगा। 

ई कचरे के निपटारे में प्रदेशों का योगदान
एसोचैम और एनईसी (नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल) द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में ई-कचरे में सर्वाधिक योगदान महाराष्ट्र (19.8 प्रतिशत) का है, वह सिर्फ 47,810 टन कचरे को सालाना रिसाइकिल कर दोबारा प्रयोग के लायक बनाता है। ई-कचरे में तमिलनाडु का योगदान 13 प्रतिशत है और वह 52,427 टन कचरे को रिसाइकिल करता है। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश (10.1 प्रतिशत) 86,130 टन कचरा रिसाइकिल करता है। देश के ई-कचरे में पश्चिम बंगाल का 9.8 प्रतिशत, दिल्ली 9.5 प्रतिशत, कर्नाटक 8.9 प्रतिशत, गुजरात 8.8 प्रतिशत और मध्य प्रदेश का योगदान 7.6 प्रतिशत है। एक रिपोर्ट के अनुसार ई कचरे की मात्रा साल 2016 में 4.47 करोड़ टन से बढ़कर 2021 तक 5.52 करोड़ टन तक पहुंचने की संभावना है। 2016 में पैदा हुए कुल ई-कचरे का सिर्फ 20 प्रतिशत (89 लाख टन) ही पूर्ण रूप से एकत्र और रिसाइकिल किया गया है, काबी ई-कचरे का कोई रिकॉर्ड नहीं है।

क्या होता है नुकसान
असुरक्षित ई-कचरे को रिसाइकिल के दौरान उत्सर्जित रसायनों/प्रदूषकों के संपर्क में आने से नर्वस सिस्टम, रक्त प्रणाली, गुर्दे और मस्तिष्क विकार, सांस संबंधी समस्याएं, त्वचा विकार, गले में सूजन, फेफड़ों का कैंसर और  दिल को नुकसान पहुंचता है। 

रिसाइकिल करने के लिए कहां कितनी यूनिटें
केंद्र सरकार की सख्ती के बाद प्रदेशों ने अपने-अपने यहां इनको निपटाने के लिए यूनिटें लगाई हैं। कर्नाटक जैसे राज्यों में 57 इकाइयां हैं जिनकी क्षमता लगभग 44,620 टन है, वहीं महाराष्ट्र में 32 इकाइयां हैं जो 47,810 टन ई-कचरे का निपटारा कर सकती हैं। उत्तर प्रदेश में 86,130 टन को निपटाने के लिए 22 इकाइयां हैं और हरियाणा में 49,981 टन के लिए 16 इकाइयां है। तमिलनाडु में 52,427 मीट्रिक टन प्रति वर्ष निपटाने के लिए 14 इकाइयां हैं। गुजरात में 12 यूनिटें है जिनकी क्षमता 37,262 मीट्रिक टन हैं जबकि राजस्थान में 10 इकाइयां जो 68,670 मीट्रिक टन प्रति वर्ष का निपटान कर सकती हैं। तेलंगाना में 11,800 मीट्रिक टन के ई-कचरा निपटाने के लिए 4 इकाइयां हैं। एक अध्ययन में कहा गया, जैसे-जैसे भारत के लोग अमीर बनते जा रहे हैं उसी अनुपात में इलेक्ट्रॉनिक सामान और उपकरण खर्च करते हैं। कुल ई-कचरा सामग्री में कंप्यूटर उपकरण लगभग 70%, दूरसंचार उपकरण 12%, विद्युत उपकरण 8%, चिकित्सा उपकरण 7% और बाकी घरेलू समान का योगदान 4% हैं।

ई-वेस्ट के जरिए कमाएं पैसे 
आपके आस-पास व्यवसाय के ढेरों अवसर हैं, लेकिन अगर आप अपने हाथ गंदे करने से डरते नहीं हैं, तो सेवा व्यवसाय में उद्यमी यात्रा शुरू करना आपके लिए बेहतरीन रास्ता साबित होगा। ई-वेस्ट या इलेक्ट्रॉनिक कचरा यानी मोटे तौर पर फेंके हुए, बचे हुए, टूटे हुए, समय के साथ बेकार हो चुके इलेक्ट्रिकल या इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, जिनमें इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री का समावेश होता है। ई-वेस्ट की समस्या पर विजय पाने के लिए और 'ई-वेस्ट' आयतन, मात्रा तथा मूल्य के आधार पर विश्व का सबसे बड़ा उद्योग है। इस सिद्धांत पर विश्वास करते हुए भारत के सबसे पहली व्यावसायिक कंपनियों में से एक, ईको रीसाइक्लिंग लि. (इकोरिको) ने ई-वेस्ट के निपटान के अनोखे और पर्यावरण-अनुकूल तरीकों के जरिए मानदंड स्थापित किए हैं।

ऐसे पहचानें ई-वेस्ट
घरों से निकलने वाले कबाड़ में अब पुराने कंप्यूटर, मोबाइल फोन, सीडी, टीवी, अवन, फ्रिज और एसी जैसे तमाम इलेक्ट्रॉनिक आइटम होते हैं। बदलते जमाने के हिसाब से तकनीक बदली और पुराना कम्प्यूटर, मॉनिटर, माउस, की-बोर्ड ई-वेस्ट में शामिल हो गए। पुराने फैक्स, मोबाइल, कंप्यूटर, लैपटॉप, कंडेंसर, माइक्रो चिप्स, कंप्यूटर, मोबाइल फोन, टीवी आदि गैजट्स ई-वेस्ट कहलाते हैं। 

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Posted By: Vinay Tiwari