ट्रंप का टैरिफ, चीन की चाल और AI का खतरा: भारत की क्या है प्लानिंग? आर्थिक सर्वे में बड़ा दावा
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारतीय रुपये की मौजूदा गिरावट उसकी वास्तविक क्षमता को नहीं दर्शाती; यह 'अंडरवैल्यूड' है। भारत ...और पढ़ें

Economic Survey 2025-26: इन तीन ग्लोबल खतरों से कैसे निपटेगा भारत?

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। वर्ष 2025 भारतीय रुपये के लिए बहुत ही खराब रहा और मौजूदा वर्ष 2026 में भी गिरावट का दौर जारी है।
लेकिन आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 का कहना है कि एक डॉलर के बदले रुपये का 91-92 के स्तर पर होना इसकी क्षमता का और भारत की अर्थव्यवस्था का सही आकलन नहीं है। संसद में आज पेश आर्थिक सर्वेक्षण ने भारतीय रुपये की हालिया गिरावट पर विस्तार से प्रकाश डाला है।

रुपए का अंडरवैल्यूड होना चिंता की बात नहीं
इस सर्वेक्षण का कहना है कि भारत की मजबूत आर्थिक बुनियादी बातें जैसे उच्च विकास दर, नियंत्रित मुद्रास्फीति, कॉरपोरेट व बैंकों की मजबूत स्थिति, कर्ज देने में लगातार हो रही वृद्धि बहुत ही अच्छा माहौल दे रही हैं, इसके बावजूद मजबूत रुपया अभी दबाव में रह सकती है।
इसकी स्थिति बेहतर करने के लिए ढांचागत स्तर पर आर्थिक सुधारों के क्रियान्वयन पर और ध्यान देना होगा। सर्वेक्षण में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि रुपये की मौजूदा कीमत भारत की आर्थिक स्थिति को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं कर रही है, और यह 'अंडरवैल्यूड' (कीमत इसकी क्षमता से कम) है।
रुपये की कमजोरी के पीछे मुख्य कारण वस्तुओं में लगातार व्यापार घाटे को बताया गया है जबकि सेवाओं और रेमिटेंस (विदेशों में रहने वाले भारतीयों की तरफ से भेजी जाने वाली राशि) से आने वाली मुद्रा इस घाटे को पूरी तरह भर नहीं पाती।
अमेरिकी टैरिफ रुपये पर प्रमुख खतरा
भारत को संतुलन भुगतान बनाए रखने के लिए विदेशी पूंजी प्रवाह पर निर्भर रहना पड़ता है और जब भी इस प्रवाह में कमी होती है जैसे विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FII) के बाहर जाने से तो भुगतान संतुलन प्रभावित होता है।
इसका असर रुपये की कीमत पर होती है। अभी वैश्विक अनिश्चतता, अमेरिकी टैरिफ और आर्टिफिशिएल इंटेलीजेंस का भी खतरा है और इससे भारत में आने वाले निवेश पर विपरीत असर पड़ने की आशंका है जो रुपये पर दबाव को बढ़ाये हुए है। सर्वेक्षण ने इन्हें वैश्विक कारक करार दिया है जो रुपये को अपना शिकार बनाते हैं।
सर्वेक्षण के मुताबिक एक अप्रैल, 2025 से 22 जनवरी, 2026 तक रुपये में अमेरिकी डालर के मुकाबले लगभग 6.5 फीसद की गिरावट दर्ज की गई थी, वैसे यह दुनिया के अन्य विकासशील देशों में सबसे तेज गिरावट रही थी लेकिन सर्वेक्षण ने व्यवस्थित माना है।
हाल ही में रुपये ने 92 के स्तर को छूकर नया निचला स्तर बनाया। इसके बावजूद सर्वेक्षण मानता है कि कमजोर रुपये से फिलहाल नुकसान नहीं, बल्कि फायदा हो रहा है क्योंकि यह अमेरिकी संरक्षणवाद और उच्च टैरिफ के प्रभाव को कुछ हद तक कम करता है। इसमें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कम कीमतों का भी योगदान है।
भारत के लिए तीन ग्लोबल खतरे
सर्वेक्षण ने 2026 के लिए तीन वैश्विक जोखिम परिदृश्य का जिक्र किया है, जिनमें पूंजी प्रवाह में बाधा प्रमुख है। अगर भारत में आना वाला निवेश की रफ्तार कम होती है तो रुपये पर दबाव बढ़ेगा। निवेशकों के स्तर पर भारत में निवेश करने की इच्छा में आ रही गिरावट को गंभीरता से लेने का सुझाव दिया गया है।
यह कहता है कि अल्पावधि में उतार-चढ़ाव सामान्य हैं, लेकिन मध्यम से दीर्घावधि में रुपये की कीमत उत्पादकता, उच्च-मूल्य वाले निर्यात, ग्लोबल वैल्यू चेन में गहरी भागीदारी और स्थिर नीतिगत वातावरण से निर्देशित होंगे।
सर्वेक्षण ने अंत में भारत की मजबूत बुनियादी आधार को दोहराया है और कहा है कि रुपये की कमजोरी फिलहाल निर्यातकों के लिए सहायक साबित हो रही है, लेकिन लंबे समय में संरचनात्मक सुधारों से ही मुद्रा की स्थिरता सुनिश्चित होगी।
