विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

नए वोटरों के Form 6 में क्या बदला, जिस पर छिड़ गया विवाद? 5 किरदारों से समझिए पूरी कहानी

By Shubham KumarEdited By: Shubham Kumar
Published: Fri, 25 Sep 2026 04:20 PM (IST)

SIR और फॉर्म-6 के नियमों को लेकर विवाद और चुनाव आयोग में कथित मतभेद की रिपोर्ट से विपक्ष को मुद्दा ...और पढ़ें

ज्ञानेश कुमार विवाद का पूरा मामला।

ज्ञानेश कुमार विवाद का पूरा मामला।

HighLights

  1. फॉर्म-6 में नए सवाल से मतदाता सूची विवाद गहराया।

  2. चुनाव आयुक्तों ने आयोग के फैसलों पर 14 बार आपत्ति जताई।

  3. देशभर में 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत का निर्वाचन आयोग एक बड़े आंतरिक और राजनीतिक संकट से गुजर रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार से लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली तक पर चारों तरफ से सवाल उठ रहे हैं।

एक तरफ विपक्षी दल 'वोट चोरी' का आरोप लगा रहे हैं, तो दूसरी तरफ एक अंग्रेजी अखबार की एक खोजी रिपोर्ट में किए गए दावों ने आयोग के भीतर चल रहे भारी मतभेदों और अंदरूनी कलह की पोल खोल दी है।

ऐसे में अब सवाल ये खड़े हो रहे हैं कि आखिर चुनाव आयोग के भीतर ऐसा क्या चल रहा है, फॉर्म-6 को लेकर विवाद क्यों है और इस पूरे घटनाक्रम के मुख्य किरदार कौन हैं? आइए जानते हैं।

पहले समझिए विवाद की जड़ की क्या है?

शुरुआत की बात करें तो, जून 2025 में चुनाव आयोग ने देश की मतदाता सूचियों में सुधार और उन्हें अपडेट करने के लिए 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) की प्रक्रिया शुरू की थी। इस बड़े पैमाने पर चले सुधार अभियान के बाद जब पहली ड्राफ्ट वोटर लिस्ट सामने आई, तो देश भर से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए जा चुके थे।

फिर क्या? विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ पार्टी को फायदा पहुंचाने के लिए चुनाव आयोग ने सोची-समझी साजिश के तहत मनमाने तरीके से मतदाताओं के नाम काटे हैं।

चुनाव आयोग के भीतर का 'खेल'

हालांकि इस पूरे विवाद को हवा तब मिली जब 23 सितंबर 2026 को एक अंग्रेजी अखबार ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया कि चुनाव आयोग के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR प्रक्रिया से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आधिकारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इन दोनों आयुक्तों का कहना था कि आयोग के कई बड़े फैसले उनकी लिखित सलाह और सहमति के बिना लिए गए। संधू ने तो यहां तक कह दिया था कि आयोग ने उनके अधिकारों के खिलाफ जाकर कई 'गैरकानूनी' कदम उठाए हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन आंतरिक असहमतियों को खारिज करते हुए कहा है कि यह बहु-सदस्यीय संस्था में प्रशासनिक चर्चा और फीडबैक का सामान्य हिस्सा है और सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं।

अब जब बात यहां तक पहुंच गई, तब यह जानना है जरूरी है कि आखिर SIR प्रक्रिया पर लग रहे बड़े और गंभीर आरोप कौन-कौन से हैं, और उसके मायने क्या है?

Election Commission Controversy (1)

सबसे पहला आरोप- फॉर्म-6 में नया और अवैध सवाल जोड़ना

इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि 18 साल से अधिक उम्र के किसी भी व्यक्ति को मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 भरना होता है। अब सवाल तब उठे, जब इस फॉर्म में अचानक एक नया सवाल जोड़ दिया गया।

क्या वोटर के माता-पिता या दादा-दादी इससे पहले हुए SIR की वोटर लिस्ट में मौजूद थे? फॉर्म-6 में इस सवाल का जवाब देना अनिवार्य कर दिया गया था। आरोप यह है कि चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर संधू ने मई में ही आपत्ति जताई थी कि बिना सरकार के नियम बदले इस तरह फॉर्म नहीं बदला जा सकता, लेकिन अगस्त तक यह सवाल बना रहा।

स्थानीय चुनावी अधिकारियों की पहुंच सीमित करना

दूसरे बड़े आरोप के तौर पर स्थानीय स्तर के चुनावी अधिकारियों का मामला भी खूब चर्चा में रहा। इस बात को ऐसे समझिए कि स्थानीय स्तर पर वोटर लिस्ट तैयार करने की जिम्मेदारी इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) यानी आमतौर पर एसडीएम (SDM) स्तर के अधिकारियों की होती है।

अगस्त में सुखबीर संधू ने आपत्ति जताई थी कि राज्यों के कई अधिकारियों को नए सॉफ्टवेयर ECINet पर पूरी एक्सेस नहीं दी जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि आईटी डायरेक्टर जनरल सीमा खन्ना के पास ऐसा करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

गोवा में खामी के चलते छूट गए वोटर

इसके अलावा बड़ा आरोप गोवा को लेकर भी है। बता दें कि फरवरी में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद, गोवा में जिन 97 मतदाताओं के पास दस्तावेज सही पाए गए और जिन्हें लिस्ट में जोड़ा जाना चाहिए था, उन्हें ECINet सॉफ्टवेयर में जोड़ने का कोई तकनीकी विकल्प ही नहीं था।

गोवा के चुनाव कार्यालय ने सीनियर डिप्टी कमिश्नर और आईटी प्रमुख को 8 बार पत्र लिखे, लेकिन फाइनल लिस्ट आने तक कोई जवाब नहीं मिला, जिससे वे 97 लोग वोट डालने से वंचित रह गए।

पश्चिम बंगाल में लॉजिकल गड़बड़ी और वोटर्स के अपील का आरोप

पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान 60 लाख वोटर्स के डेटा में 'लॉजिकल गड़बड़ी' पाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों को इस पर फैसला लेने को कहा था। बाद में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों के ट्रिब्यूनल के पास ऐसी 38 लाख अपीलें पेंडिंग हैं।

इनमें से 16.10 लाख अपीलें उन लोगों के खिलाफ थीं, जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने पहले ही वैध मानकर लिस्ट में जोड़ा था। ऐसे में सवाल यह उठा कि जब इन लोगों को वैध माना जा चुका था, तो आयोग इनकी सूची काटने के लिए अपील क्यों कर रहा था?

अब जब आरोप ऐसे लगाए गए, तब इस पूरे मामले में मुख्य किरदार की बात होनी भी जरूरी है। अब चाहे ज्ञानेश कुमार हों या फिर टीवी सोमनाथन....आइए एक-एक कर इन सभी किरदारों की भूमिका को समझते हैं।

Election Commission Controversy (3)

सबसे पहला किरदार- ज्ञानेश कुमार

1988 बैच के केरल कैडर के पूर्व IAS अधिकारी और धारा 370 हटाने और राम मंदिर ट्रस्ट के गठन में अहम भूमिका निभाने वाले ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष ने आरोपों की झड़ी लगा दी है। बात यहां तक पहुंच गई है कि विपक्ष एक सुर में ज्ञानेश कुमार की इस्तीफा मांग रहा है साथ ही देशद्रोही भी बता रहा है। 

कुल मिलाकर विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त पर मनमाने फैसले लेने और सत्ता के इशारे पर काम करने का आरोप लगा रहा है। दूसरी तरफ गौर करने वाली बात यह है कि उनका कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक है।

दूसरा किरदार- चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू

1988 बैच के उत्तराखंड कैडर के पूर्व IAS और (MBBS) डॉक्टर संधू ने आयोग के भीतर उठी 14 आपत्तियों में से सबसे ज्यादा आपत्तियां अकेले दर्ज कराई हैं। वे एनएचएआई (NHAI) के अध्यक्ष और उत्तराखंड के मुख्य सचिव भी रह चुके हैं।

तीसरा किरदार- विवेक जोशी चुनाव आयुक्त

1989 बैच के हरियाणा कैडर के पूर्व IAS और आईआईटी (IIT) रुड़की से इंजीनियरिंग पढ़े जोशी ने वित्त मंत्रालय और हरियाणा के मुख्य सचिव जैसे अहम पदों पर रहे हैं। इस पूरे मामले में जोशी ने चुनाव आयोग के कई फैसलों पर अपनी असहमति दर्ज कराई है, जिससे वो खूब चर्चा में हैं।

चौथा किरदार- आईटी डायरेक्टर जनरल सीमा खन्ना

सीमा खन्ना 2025 में डेप्युटेशन पर चुनाव आयोग में आईटी महानिदेशक बनीं। उन्होंने ही ECINet सॉफ्टवेयर को डिजाइन और लॉन्च किया था। विपक्ष का आरोप है कि इसी सॉफ्टवेयर के जरिए वोट काटने का पूरा खेल चल रहा है।

पांचवा और अंतिम किरदार- कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन

देश के सबसे ताकतवर प्रशासनिक पदों में से एक पर काबिज सोमनाथन 1987 बैच के आईएएस हैं। चुनाव आयुक्तों ने अपनी आंतरिक आपत्तियों और पत्राचार में इन्हें भी संज्ञान में लिया है, जिसके चलते वो इस पूरे मामले में सुर्खियों में हैं।

Election Commission Controversy (2)

अब समझिए फॉर्म-6 क्या है और इसका विवाद क्यों है?

भारत में पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने या नए वोटर बनने के लिए चुनाव आयोग की तरफ से निर्धारित मुख्य आवेदन पत्र फॉर्म-6 कहलाता है।इसमें आवेदक को अपना नाम, उम्र, पता, जन्मतिथि, परिवार के सदस्यों का विवरण और पहचान पत्र जैसे आधार, पैन आदि की जानकारी देनी होती है।

इसे कैसे भरते हैं?

इसे नागरिक ऑनलाइन (National Voters' Service Portal / ECINet के माध्यम से) या अपने क्षेत्र के बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) के पास ऑफलाइन फॉर्म भरकर जमा कर सकते हैं।

विवाद में क्यों है फॉर्म-6?

गौरतलब है कि इस बार फॉर्म-6 में यह अनिवार्य कर दिया गया कि आवेदक को अपने माता-पिता या पूर्वजों के नाम पिछली SIR वोटर लिस्ट में खोजने होंगे और उसका ब्योरा देना होगा।

जानकारों और विपक्षी दलों का मानना है कि तकनीकी पेचीदगियों और दस्तावेजों की कमी के कारण इस नए नियम से लाखों गरीब और आम लोग नए वोटर बनने से वंचित हो रहे हैं, जिसे लेकर सबसे बड़ा घमासान मचा हुआ है।

क्या पूरी होगी विपक्ष की मांग, इस्तीफा देंगे ज्ञानेश कुमार? 

वर्तमान कानून के मुताबिक, चुनाव आयुक्तों को उनकी ऑफिशियल ड्यूटी के दौरान किए गए कार्यों के लिए क्रिमिनल मामलों से सुरक्षा प्राप्त है। ऐसे में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद में महाभियोग लाना होगा, जो कि एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट में भी इस पूरी प्रक्रिया को लेकर याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं।

ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव आयोग इन गंभीर तकनीकी और राजनीतिक सवालों के बीच अपनी साख कैसे बचाता है, क्योंकि देश के सबसे बड़े लोकतंत्र में 'वोट के अधिकार' पर उठ रहे ये सवाल सीधे तौर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव से जुड़े हुए हैं।