नई दिल्‍ली [ जागरण स्‍पेशल ]। अब राज्‍यसभा एवं विधानपरिषदों के चुनाव में मतपत्रों में नाेटा यानी 'नन ऑफ द एबव' का विकल्‍प नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्रीय चुनाव आयोग ने इससे जुड़े निर्देश राज्‍य चुनाव आयोग को दे दिए हैं। आयोग ने बैलेट पेपर से नोटा का विकल्‍प हटाने को कहा है। दरअसल, 21 अगस्‍त, 2018 को सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले के बाद आयोग ने यह फैसला लिया है। आइए जानते हैं कि क्‍या है नोटा। भारत की चुनाव प्रक्रिया में कब और कैसे शामिल हुआ नोटा। क्‍या है उसका इतिहास। कितने देशों में लागू है नोटा। इसके साथ नोटा पर अब तक सुप्रीम कोर्ट का रूख।

शीर्ष अदालत की टिप्‍पणी

दरअलस, 21 अगस्‍त 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि नोटा दल-बदल (डिफेक्शन) को बढ़ावा देगा और इससे भ्रष्‍टाचार के लिए दरवाजे खुलेंगे। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि नोटा को स‍िर्फ प्रत्‍यक्ष चुनाव में ही यानी लोकसभा और राज्‍यों के विधानसभा चुनावों में ही लागू किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा है अप्रत्‍यक्ष चुनाव जहां औसत प्रतिनिधित्व की बात हो वहां लागू नहीं होगा। इसके साथ ही राज्‍यसभा चुनाव में नोटा लागू करने से एक मत के औसत मूल्‍यांकन की धारणा नष्‍ट होगी। अदालत ने कहा कि नोटा पहली नजर में लुभावना लग सकता है, लेकिन गंभीर जांच करने पर ये आधारहीन दिखता है। क्‍यों कि इससे ऐसे चुनाव में मतदाता की भूमिका को नजरअंदाज कर दिया गया है। इससे लोकतांत्रिक मूल्‍यों का पतन होता है। इसके साथ ही नोटा के प्रयोग से अप्रत्‍यक्ष चुनाव में समाहित चुनावी निष्‍पक्षता खत्‍म होती है। वह भी तब भी जब मतदाता के मूल्‍य हो और वह मूल्‍य ट्रांसफरेबल हो। ऐसे में नोटा एक बाधा है।

भारत में नोटा का इतिहास

1- साल 2009 में पहली बार हुई पहल

दरअसल, भारत में इस प्रक्रिया की शुरुआत साल 2009 तब हुई जब चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से नोटा का विकल्‍प उपलब्‍ध कराने से जुड़ी अपनी मंशा सामने रखी। बाद में एक नागरिक अधिकार संगठन ने नोटा के समर्थन मे एक जनहित याचिका दायर की थी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए वर्ष 2013 में अदालत ने मतदाताओं को नोटा का विकल्‍प देने का निर्णय किया था।

2- 2013 को सुप्रीम कोर्ट का एेतिहासिक फैसला

27 सितंबर, 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने भारत के तत्‍कालीन प्रधान न्यायाधीश जस्टिस पी सदाशिवम की अगुआई वाली पीठ ने एक एेतिहासिक फैसले में कहा था लोकतंत्र दरअसल चुनाव का ही नाम है। इसलिए मतदाताओं को नकारात्‍मक मतदान का भी पूरा अधिकार है, और उन्‍हें यह हक जरूर मिलेगा। नकारात्‍मक मतदान की यही अवधारणा नोटा यानी नन ऑफ द एबव की है। नोटा यानी मतदाता को मिला वो अधिकार, जिसके जरिए वह बैलेट पेपर या ईवीएम मशीन दर्ज में तमाम नामों को खारिज कर अपना रुख स्‍पष्‍ट कर सकते हैं। इसका सीधा सा मतलब यह है कि चुनाव में खड़े तमाम उम्‍मीदवारों में से अगर मतदाता किसी को पंसद नहीं करता तो नोटा का बटन दबाकर अपनी नापसंद जाहिर कर सकता है।

भारत नोटा का विकल्‍प उपलब्‍ध कराने वाला दुनिया का 14वां देश

कोर्ट के निर्देशों को पालन करते हुए भारत निर्वाचन आयोग ने दिसंबर 2013 के विधानसभा चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में इनमें से कोई नहीं अर्थात नोटा बटन का विकल्प उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।। इस तरह भारत नोटा का विकल्‍प उपलब्‍ध कराने वाला दुनिया का 14वां देश हो गया। हालांकि, चुनाव आयोग ने यह भी स्‍पष्‍ट किया कि नोटा के वोट गिने जाएंगे, लेकिन इसके मत हार-जीत में शामिल नहीं किए जाएंगे यानी इसका चुनाव के नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। हालांकि, शुरुआत में राजनीतिक दलों ने इसका काफी विरोध किया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद यह साफ हो गया की मनपंसद उम्‍मीदवार की गैर मौजूदगी में आम लोगों के पास अपनी राय जाहिर करने का अधिकार भी उनका चुनावी हक होना चाहिए।

क्‍या है चुनाव आचार संहिता 1961 के नियम 49 (ओ)

हालांकि, भारत में नोटा से पहले भी वोट नहीं देने का अधिकार मतदाताओं को हासिल था। भारत की चुनाव आचार संहिता 1961 के नियम 49 (ओ) के तहत यह काफी समयय से अस्तिव में था। इसके तहत कोई मतदाता अाधिकारिक तौर पर अपने मत का प्रयोग नहीं करने का अधिकार रखता है। हालांक‍ि, उस वक्‍त वैलेट पेपर में 'नन ऑफ द एबव' का विकल्‍प नहीं होता था। इसके चलते उसका व्‍यावहारिक इस्‍तेमाल में दिक्‍कत होती थी।

चुनाव में नोटा का खेल

- वर्ष 2013 में पहली बार हुए पांच राज्‍यों के विधानसभा चुनाव में नोटा को अपनाया गया। उस वक्‍त छत्‍तीसगढ़, मिजोरम, राजस्‍थान, मध्‍यप्रदेश और दिल्‍ली में हुए विधानसभा चुनावों में पहली बार लोगों को यह विकल्‍प दिया गया कि वो चुनाव में खड़े सभी उम्‍मीदवारों को खारिज कर सकें।

- इन सभी राज्‍यों में 1.85 फीसद वोट नोटा पाए गए। हालांकि, 2014 में हुए आठ राज्‍यों के  विधानसभा चुनावों में नोटा का प्रतिशत घटकर 0.95 फीसद रह गया। इसके अलावा वर्ष 2015 में दिल्‍ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में यह फ‍िर बढ़कर 2.02 फीसद हो गया।

- 2013 से 2017 के बीच हुए मतदान की कुल सीटों में से 261 विधानसभा और 24 लोकसभा सीटो पर नोटा वोट विजय मार्जिन से ज्‍यादा थे। यही नहीं वर्ष 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव में कुल 21 सीटों पर सबसे ज्‍यादा वोट पाने वाले पहले दो प्रत्‍याशियों के बीच का अंतर नोटा वोटो से कम था।

दुनिया में नोटा

माना जाता है कि नोटा का सबसे पहले इस्‍तेमाल अमेरिका में हुआ। मतपत्रों में नोटा का पहली बार प्रयोग 1976 में अमेरिका के कैलिफोर्निया में हुआ था। उसके बाद अन्‍य देशों ने भी धीरे-धीरे इस विकल्‍प को शुरू किया। कोलंबिया, यूक्रेन, ब्राजील, स्‍वीडन, बांग्‍लादेश, फिनलैंड, स्‍पेन, फ्रांस, चिली, बेल्जियम और यूनान समेत कई देशों में लागू है। द‍ुनिया के कई देशों में 50 फीसद ज्‍यादा मत पर ही जीत का प्रावधान। ऐसे में अगर वहां 50 फीसद से ज्‍यादा नोटा वोटों की संख्‍या हो जाती है तो चुनाव का रद कर फ‍िर चुनाव कराया जाता है। ऐसे में नाेटा का महत्‍व बढ़ जाता है। रूस में साल 2006 तक मतदाताओं को नोटा का हक था। लेकिन बाद में हटा दिया गया। दरअसल, नोटा का संबंध चुनाव से है। और इसका इस्‍तेमाल कोई भी नागरिक अपना मत डालते वक्‍त कर सकता है।

Posted By: Ramesh Mishra