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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 27, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

ई-कचरा कभी पूरी तरह विनष्ट नहीं होता, इससे विकराल हो रही ग्लोबल वार्मिंग की समस्या; जानिए- भारत में क्‍या है स्थिति

By TilakrajEdited By:
Published: Wed, 27 Jul 2022 12:00 PM (IST)

किसी इलेक्ट्रानिक-उत्पाद को फेंकने का यही अर्थ है कि एक मूल्यवान कच्चे माल को फेंक कर हर स्तर पर प्रदूषण ...और पढ़ें

ई-कचरा वर्तमान और भावी दोनों पीढ़ियों के लिए अभिशाप
ई-कचरा वर्तमान और भावी दोनों पीढ़ियों के लिए अभिशाप

नई दिल्‍ली, सुधीर कुमार। इलेक्ट्रानिक कचरे (ई-कचरा) का उत्पादन और उसका टिकाऊ निस्तारण पूरी दुनिया में एक गंभीर चुनौती बनती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी वैश्विक ई-अपशिष्ट निगरानी रिपोर्ट-2020 के अनुसार 2019 में दुनिया भर में 5.36 करोड़ टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ था। आंकड़ों की मानें तो दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति एक साल में औसतन सात किलोग्राम ई-कचरा उत्पन्न करता है।

प्रति व्यक्ति ई-कचरा उत्पादन के मामले में यूरोप सबसे आगे है, जहां प्रत्येक व्यक्ति प्रतिवर्ष 16 किलोग्राम ई-कचरा उत्पन्न करता है। चीन (एक करोड़ टन) और संयुक्त राज्य अमेरिका (70 लाख टन) के बाद भारत ई-कचरा उत्पन्न करने वाला दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। 2019-20 के दौरान अपने यहां करीब दस लाख टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ था।

हालांकि इलेक्ट्रानिक उपकरणों के निर्माण और ई-कचरे के उत्पादन की तुलना में दुनिया में ई-कचरे के निस्तारण की गति बहुत ही धीमी है। 2019 में चीन अपने देश में उत्पादित ई-कचरे के केवल 20 प्रतिशत, अमेरिका 15 प्रतिशत और भारत 22.7 प्रतिशत हिस्से को ही एकत्रित, विघटित और पुनर्नवीनीकृत कर सका था। इलेक्ट्रानिक उपकरणों के अनुचित तरीके से निपटान से जहरीले रसायन निकलते हैं, जो हवा, मिट्टी, पानी और अंतत: मानव एवं जीव-जंतुओं के स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। भूमि के जिस हिस्से पर ई-कचरे को लगातार फेंका जाता है, वह कुछ समय पश्चात ही अनुर्वर बन जाता है। मृदा में इसकी उपस्थिति से फसल-विषाक्तता का खतरा बढ़ जाता है। ये मृदा की जल धारण क्षमता को भी बाधित करते हैं।

प्लास्टिक की तरह ई-कचरा कभी पूरी तरह विनष्ट नहीं होता है। इसके चलते पर्यावरण में कार्बन की मात्र भी बढ़ती जा रही है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग की समस्या विकराल हो रही है। यही नहीं, जिस तेजी से दुनिया में इलेक्ट्रानिक उत्पाद बनाए जा रहे हैं, उससे इसके निर्माण में प्रयुक्त कई धातु समाप्ति के कगार पर हैं। एक ई-उत्पाद को कचरे के रूप में फेंकने का तात्पर्य एक मूल्यवान कच्चे माल को फेंकना और भूमि, हवा, जल को प्रदूषित करने में अपना योगदान देना भी है।

दिल्ली सरकार द्वारा ई-कचरे के संग्रहण और पुनर्चक्रण के लिए होलंबी कलां में देश का पहला ई-कचरा ईको पार्क स्थापित करने की घोषणा जहां उम्मीद जगाती है, वहीं नोएडा प्राधिकरण द्वारा एक काल पर घर-घर जाकर ई-कचरे को संग्रहण करने और उसका उचित मूल्य देने का निर्णय भी उत्साहित करता है। जाहिर तौर पर ई-कचरे के वैज्ञानिक पद्धति से निस्तारण से ही पर्यावरण को संरक्षित करने में मदद मिलेगी। ई-कचरा वर्तमान और भावी दोनों पीढ़ियों के लिए अभिशाप है। अत: इसके प्रबंधन के निमित्त व्यक्तिगत स्तर पर अपनी सहभागिता सुनिश्चित करनी होगी।

(लेखक बीएचयू में शोधार्थी हैं)