नई दिल्ली, सीमा झा। Coronavirus Lockdown: सोशल मीडिया की वर्चुअल जिंदगी इन दिनों वास्तविक से अच्छी लग रही है, क्योंकि यहां कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा नहीं। पर तकरीबन सबकी गतिविधियां वायरस के भय से उपजी चिंता से उबरने के उपायों के इर्द-गिर्द हैं।

सॉफ्टवेयर इंजीनियर गगन गुप्ता के मुताबिक, ज्यादातर लोग इन दिनों पतंगा बन गए हैं और सोशल मीडिया दीये की तरह बन गया है उनके लिए। मैं भी कभी फेसबुक, ट्विटर या इंस्टाग्राम स्क्रॉल करता रहता हूं पर फिर हारकर छोड़ देता हूं। बेचैनी बनी ही रहती है। यहां से बोर होने के बाद भी यह चक्र (स्क्रॉल करते रहने का) टूटता नहीं। गगन के अनुसार, हालांकि उन्हें थोड़ी राहत तब मिलती है जब वे पाते हैं कि इस आलम में वे अकेले नहीं, बल्कि बहुतेरे लोग हैं।

सोशल मीडिया यूं बनी है राहत : फटाफट अपडेट के आदी हो चुके थे लोग। हालांकि सोशल मीडिया से मोहभंग होने की बात भी खूब हो रही थी। इसकी लत सेहत पर गंभीर असर डालती है यह भी मान चुके थे, पर अब ये सब बातें पीछे छोड़ दी गई हैं। शोध बताते हैं कि आपदा के समय सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ जाता है। सेलुलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक भी लॉकडाउन के बाद से डाटा की खपत में तकरीबन 30 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है।

दुनिया की जानी-मानी स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के कम्युनिकेशन विभाग के प्रोफेसर जेन हेंकॉक का कहना है, सोशल मीडिया पर होने वाली चर्चा और गतिविधियां बताती हैं कि हमारे समाज की क्या मनोदशा है और इस आपदा पर वह कैसी प्रतिक्रिया दे रहा है। समाज से जुड़े रहने का यह एहसास मन को राहत देता है। यहां हैशटैग लगातार बदल रहे हैं।

हैशटैग सेफहैंड्स या द ब्रेव हट्र्स या होमफिटनेस आदि जाहिर है प्रेरित करता है। सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन के लिए एक सशक्त टूल बनकर उभरा है सोशल मीडिया। इस संबंध में लखनऊ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. पवन मिश्रा कहते हैं, यही तकनीक का सकारात्मूक पहलू है जो इस समय अधिक महसूस हो रहा है। वे यह भी बताते हैं कि उन्हें कैसे वाट्सएप ग्रुप पर छात्रों के संदेशों की बाढ़ के बीच उनका लंच टाइम और कक्षा में बिताए गए समय को याद करना अच्छा लगता है। यह सोशल मीडिया का महत्वपूर्ण योगदान है। बेचैनी और बोरियत क्यों!:आपदा के समय सोशल मीडिया से जुड़ना अच्छा लग रहा है तो संभव है कि एक समय के बाद आपकी मनोदशा बदलने लगे। आप अचानक इसके गहरे अंधे कुएं में और गहरे डूबने लग गए जाएं। इस बेचैनी को समझ न पाएं। पर क्यों है ऐसा?

इस बारे में लखनऊ विश्वविद्यालय की मनोविज्ञान विभाग की प्रोफेसर मधुरिमा प्रधान कहती हैं, यह हमारी आदत है कि हम इंस्टैंट यानी तुरंत राहत चाहते हैं। पुरानी चीजें हमें जल्दी बोर कर देती हैं। पर यदि आप ऐसी स्थिति में आने से पहले खुद को रोक नहीं पा रहे तो आसानी से सोशल मीडिया आपको अपने शिंकजे में ले सकता है। प्रोफेसर मधुरिमा यह भी बताती हैं कि कैसे सोशल मीडिया लोगों को लॉकडाउन के इन दिनों में रचनात्मक भी बना रहा है। वे उन लोगों का जिक्र करती हैं जो सोशल मीडिया की मदद से डर और घबराहट दूर कर रहे हैं।

वहीं ब्रिटेन की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट राबर्टा बैब कहती हैं, लोग सोशल मीडिया से कुछ नया चाहते हैं पर तरीका वही पुराना है। जैसे-फोटो शेयर करना, आम जिंदगी की चर्चा, एहसास की शेयरिंग आदि। उनके मुताबिक, बोरियत की शिकायत करने वालों को पोस्ट करने के तरीकों पर भी जरूर गौर करना चाहिए। यदि यह खुद को प्रेरित करता है, तो बोर या बेचैन होने से बचा जा सकता है।

आप सबसे महत्वपूर्ण हैं : आपको सोशल मीडिया वांछित लाभ नहीं दे रहा तो इससे कुछ वक्त दूर रहने का प्रयास ही आपके हित में है। इस बारे में डॉक्टर राबर्टा बैब कहती हैं, सोशल मीडिया का सकारात्मक प्रयोग नहीं समझते तो यह संभव है कि कुछ समय बाद आपके मन में डर, गुस्सा और ‘फीयर ऑफ मिसिंग आउट’ यानी कुछ खो जाने का भय भरने लगे। रॉबर्टा बैब के मुताबिक यदि आप सोशल मीडिया का प्रयोग निरुद्देश्य और संयमहीन तरीके से कर रहे हैं तो यह इन मुश्किल दिनों में आपको अवसाद में डाल सकता है। याद रहे, इस अवसाद से बचने का सक्रिय प्रयास भी आपको ही करना होगा। प्रोफेसर मधुरिमा के अनुसार, मानसिक स्थिरता बनाए रखने से बड़ी चीज कुछ नहीं। इसी के बदौलत आपको इस आपदा से लड़ने की ऊर्जा मिल सकती है।

डरने की बजाय प्रेरित महसूस करें

  • ऐसी हॉबी विकसित करें, जिसमें सोशल मीडिया या फोन का प्रयोग जरूरी न लगे।
  • सोशल मीडिया से कुछ समय का अवकाश आपको तरोताजा रखने में मदद करेगा।
  • नोटिफिकेशन को ऑफ रखना ही बेहतर होगा। एक खास समय तय करें, जिसमें सोशल मीडिया का प्रयोग हो।
  • पोस्ट करने से पहले सोचें कि आपका उद्देश्य क्या है। निरुद्देश्यता अक्सर बोरियत और झुंझलाहट ही पैदा करती है।
  • यदि खुद को स्क्रॉल करते रहने से रोक नहीं पा रहे हैं, तो फोन को कुछ समय के लिए घर में दूसरी जगह पर रख दें और भूल जाएं।
  • सोशल मीडिया पर आधिकारिक पेज और उन ग्रुप या पोस्ट को फॉलो करें, जो सही जानकारी और सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार करते हों।

रक्तता की भरपाई करने वाला टूल

लखनऊ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री डॉ. पवन मिश्रा ने बताया कि पश्चिमी समाज के मुकाबले भारतीय समाज में सोशल मीडिया आज भी नई चीज है। यह एक आधुनिक टूल है, जिसकी मदद से समाज की बॉन्डिंग और इसकी परंपरा आधुनिक बनाने में मदद मिल रही है। अब लॉकडाउन में कोरोना संक्रमण से बचने के लिए एक-दूसरे से शारीरिक दूरी से पैदा हुई रिक्तता की भरपाई में इससे मदद मिल रही है। सोशल मीडिया की पहुंच और क्षमता को देखते हुए हमें इसका अधिक से अधिक सकारात्मक उपयोग करना चाहिए।

सोशल मीडिया को बनाएं कारगर हथियार

तमिलनाडु के कांचीपुरम के मेडिटेशन एक्सपर्ट, वन वर्ल्ड एकेडमी की ग्रीथा कृष्णन ने बताया कि इस समय 454 करोड़ लोग सोशल मीडिया के एक्टिव यूजर्स हैं यानी वैश्विक आबादी का तकरीबन 59 प्रतिशत। ये चाहें तो डर, अफवाह, गुस्सा, नफरत आदि के बजाय इस लड़ाई के प्रति इंसान की सामूहिक एकता का संचार कर सकते हैं। हमारा दिमाग व चेतना सामूहिक एकता के अनुरूप बनी है। मानव जाति यानी होमो सेपियंस का इतिहास करीब बीस लाख साल पुराना है। हमने कई तरह के वायरस के प्रति मजबूत प्रतिरोधी रक्षा प्रणाली विकसित की है। तमाम एंटीबायोटिक्स और टीके ईजाद किए हैं। अब तकनीकी रूप से भी सशक्त हो रहे हैं। यदि इनका इस्तेमाल सकारात्मक हो, तो इस आपदा का सामना कहीं अधिक मजबूती से करना संभव है।

ये बातचीत आपको डरा तो नहीं रही !

जब आपकी साइकिल या घर का कोई सामान खराब हो जाए तो या तो खुद ठीक करते हैं या किसी पेशेवर की तलाश करते हैं जो उसे ठीक कर सके। पर आपकी भावनाओं के साथ दूसरी बात है। इसके लिए आप एक आसान तरीका अपना लेते हैं वह है अपनी समस्या के बारे में बातें करना, उसे शेयर करना। बात भय या चिंता से जुड़ी हो तो इस दौरान आपके दिमाग का एक खास हिस्सा सक्रिय हो जाता है। यह आपकी विचार प्रक्रिया को नियंत्रित करने में आपकी मदद करता है। साउथ मेथोडिस्टर यूनिवर्सिटी, टेक्सास अमेरिका के एक शोध के मुताबिक, समस्या के बारे में बात करना या लिखना एक थेरेपी की तरह मददगार साबित होता है। पर यहां गौर करने वाली बात यह है कि रिसर्च में यह दावा किया गया है कि यदि आप अपने डर वाले एहसास को खुद सक्रिय रूप से दबाने या खत्म करने की पहल नहीं करते, तो उसका असर उल्टा भी हो सकता है।

कोरोना बहुत खतरनाक वायरस है, कुदरत हमसे बदला ले रही है, अरे यही तो प्रलय है, इसलिए अब बचना मुश्किल है आदि जुमले इन दिनों आमतौर पर सुन सकते हैं आप। जाहिर है ऐसी बातें एकदम से भयभीत कर देती हैं, वहीं कोई जब यह कहे कि अगर सरकार और चिकित्सकों के बताए निर्देशों का पालन करते हुए इस संकट से निकलना आसान है तो इस बेचैनी में राहत भी मिलती है। आप घर पर बात करें या फोन पर अथवा सोशल मीडिया पर, हर संवाद पहले आपके मन को प्रभावित करता है। मनोचिकित्सक डॉक्टर विपुल रस्तोगी कहते हैं, संवाद से पहले आप खुद प्रभावित होते हैं। इसके प्रति सचेत रहें तो आप खुद के साथसाथ सामने वाले को भी राहत दे सकते है।

क्या करना चाहिए

  • बुरे एहसास के साथ-साथ अच्छी बातों की भी चर्चा करें।
  • अपनी तरफ से आश्वस्त हो जाने पर ही अपनी बात रखें।
  • भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन की सूचनाओं से समयसमय पर खुद को अपडेट करते रहें।
  • सही व्यक्ति से अपनी बात शेयर करें यानी उनसे जहां से आपको सही सूचना मिले और उचित मदद भी।

बड़े काम की है ‘एपल’ तकनीक

ब्रिटन की एक मेंटल हेल्थ संस्था एंजायटी यूके’ ने किसी भी डर या आशंका से निपटने के लिए यह तकनीक तैयार की है। इस वक्त जब सभी एक ही प्रकार की मनोदशा यानी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं, तो इस तकनीक का लाभ उठा सकते हैं। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार से है :

  • लेट गो यानी जो कल्पनाएं हैं, उन्हें बुलबुले की तरह फूटता महसूस करें।
  • पॉज यानी ठहरें-सामान्य प्रतिक्रिया से इतर कोई प्रतिक्रिया न करें। गहरी सांस लें।
  • पुल बैक यानी पीछे जाएं। दोबारा खुद से कहें कि भय निश्चित रूप से मददगार नहीं।
  • एक्नॉलेज करें यानी मन में आई अनिश्चितता की बातों को पहचानने की कोशिश करें। वह क्या है जो डरा रहा है।
  • एक्सप्लोर करें यानी अभी जो पल है वही सब है। उसे अपने भीतर उतारें। नोटिस करें। जिसे आप छू रहे हैं बस उसे महसूस करें।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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