नंदकिशोर भारद्वाज, सोनीपत। खिलाड़ी के रूप में मैदान पर संघर्ष की मिसाल बनने के बाद द्रोणाचार्य की भूमिका में द्रोणाचार्य अवार्डी कोच प्रीतम सिवाच अब अपनी शिष्याओं के सपनों को पंख दे रही हैं। भारतीय महिला हॉकी की एशियन गेम्स-2026 की स्वर्ण विजेता टीम में उनकी चार शिष्याओं का शामिल होना उनके कोचिंग सफर की बड़ी उपलब्धि है।
यह उपलब्धि उस महिला की है, जिसने खुद सामाजिक बंदिशों, पारिवारिक दबाव और खेल से बार-बार दूर होने की परिस्थितियों के बीच तीन बार भारतीय टीम में वापसी की। अभी वह सोनीपत में गरीब परिवारों की करीब 150 बेटियों को निश्शुल्क हॉकी प्रशिक्षण देकर भविष्य की स्वर्ण पदक विजेता खिलाड़ी तैयार कर रही हैं।
प्रीतम भारतीय और हरियाणा टीम की कप्तान रह चुकी हैं। वह अब तक देश की महिला टीम को 15 खिलाड़ी दे चुकी हैं। उनके पति, बेटा व बेटी भी हॉकी खिलाड़ी हैं। बेटा व बेटी देश के लिए खेल रहे हैं।
प्रीतम छठी कक्षा में ही हॉकी में जाने का इदारा साफ कर दिया था
रोडवेज में निरीक्षक भरत सिंह ठाकरान के घर दो अक्टूबर, 1974 में गुरुग्राम जिले के गांव झाड़सा में जन्मी प्रीतम ने छठी कक्षा में ही हॉकी के लिए अपना इरादा साफ कर दिया था।
जब स्कूल की हॉकी टीम में उन्हें शामिल नहीं किया गया, तो वह अपनी दादी सुखदेई को लेकर स्कूल पहुंचीं और मास्टर को उन्हें टीम में लेना पड़ा। अपने उम्दा खेल के दम पर प्रीतम स्कूल से जिले और जूनियर इंडिया टीम की कप्तान बनी।
इंडिया टीम में जाने के लिए जब से स्टेडियम में अभ्यास के लिए जाने लगीं तो किराया नहीं मिलता था। उनके पहलवान भाई वीरेंद्र ठाकरान ने विरोध किया कि प्रीतम उस स्टेडियम में अभ्यास नहीं करेंगी, जहां वह करते हैं। पिता के सहयोग के बाद भी उन्हें ग्रामीणों के ताने सुनने को मिलते थे।
उन्होंने घर वालों से कह दिया कि अगर उनकी शादी की गई तो वह घर से चली जाएंगी। तब तक प्रीतम को रेलवे ने सीनियर क्लर्क का पद दे दिया। इंडिया टीम में सलेक्ट होने के बाद प्रीतम ने वर्ष 1998 के एशियाई खेलों में देश को सिल्वर दिलवाया। तब घर वाले व परिवार वाले उनपर शादी का दबाव बनाने लगे।
महिलाओं के सुनने पड़े थे ताने
प्रीतम ने सोनीपत के हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच, जो रेलवे में नियुक्त थे, इस शर्त पर शादी की कि वह उनका खेलना बंद नहीं करवाएंगे। शादी कर ससुराल पहुंची। घूंघट नहीं करने व सूट-साड़ी नहीं पहनने पर महिलाओं के ताने सुनने पड़े।
कई बार विदेश से खेलकर आने के बाद एयपोर्ट पर ही उन्हें ड्रेस बदलकर सूट पहनना पड़ा। हॉकी खेलने और ऑफिस के काम के बाद उन्हें घरेलू कार्य करने पड़ते थे। एक साल बाद उन्होंने बेटे यशदीप को जन्म दिया।
इस दौरान उनकी हॉकी छूट गई। बेटे के तीन महीने का होने के दौरान प्रीतम ने जब कमबैक करने का सोचा व सीआरजेड स्कूल के मैदान पर अभ्यास शुरू किया, तो वहां कोच ने उन्हें मोटी कहकर ताना मारा। अगले तीन महीने में प्रीतम ने खुद को फिट किया और हरियाणा टीम की कप्तान बनी।
इसके बाद दोबारा इंडिया टीम में शामिल होकर खेलीं। बाद में बेटी कनिका को जन्म देने के बाद प्रीतम की हॉकी दोबारा छूट गई। जब बेटी थोड़ी बड़ी हुई तो प्रीतम ने खाली समय में पटियाला में एनआइएस कोर्स में दाखिला ले लिया। वहां पर खाली समय में उन्होंने अभ्यास शुरू कर दिया और तीसरी बार इंडिया टीम में शामिल हुईं। उनके नाम कई मेडल दर्ज हैं।
मायके में पार्सल के जरिये खाने में जहर दिए जाने से उनके भतीजे की मौत हो गई। इससे दुखी होकर प्रीतम ने हॉकी से संन्यास ले लिया।
कोचिंग के लिए लंबी लड़ाई
चुनौतियों से संघर्ष के बाद मुकाम पर पहुंची प्रीतम ने गरीब परिवार की बच्चियों को हॉकी सिखाना शुरू किया। उनके पास न स्टेडियम था, न संसाधन। उन्होंने कोचिंग शुरू की तो अभिभावक अपनी बेटियों को उनके पास लाने लगे। उनका संघर्ष रंग लाने लगा। उनकी कोचिंग में तैयार हुईं बेटियां इंडिया टीम में खेलने लगीं। प्रीतम की लड़कियों के लिए सुविधाएं जुटाने की लड़ाई अब भी जारी है। उनका वेतन, अवार्ड की पेंशन लड़कियों के प्रशिक्षण पर ही खर्च हो जाती है।
पति, बेटा व बेटी भी हॉकी खिलाड़ी
प्रीतम के पति कुलदीप सिवाच भी हॉकी खिलाड़ी थे। उनका बेटा यशदीप सिवाच एशियाई खेलों में टीम इंडिया का हिस्सा थे। बेटी कनिका भी इंडिया के लिए खेल रही हैं।
रोडशो के दौरान मिशन चौक पर खुले वाहन में सवार दाएं से बाएं नेहा गोयल, द्रोणाचार्य अवार्डी कोच प्रीतम सिवाच, ज्योति, साक्षी राणा व शिल्पी डबास।
प्रीतम सिवाच ने हॉकी सिखाने के साथ ही हर लड़की को मां की तरह प्यार दिया है। हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखा है। मैं आज जिस मुकाम पर हूं उसमें प्रीतम दीदी व मेरी मां सावित्री का सबसे बड़ा हाथ है।
- नेहा गोयल, भारतीय महिला हॉकी टीम की सीनियर खिलाड़ी
मेरे पड़ोस में किसी ने प्रीतम सिवाच की ओर से निश्शुल्क हॉकी कोचिंग की बात मुझे पता चली तो मैं अपने स्वजन के साथ उनके पास पहुंची। प्रीतम ने संघर्ष के दिनों से लेकर अब तक मेरी हर प्रकार से मदद की है।
- ज्योति, भारतीय महिला हॉकी टीम की खिलाड़ी
मेरे पिता चाय की कैंटीन चलाते हैं। किसी ने पिता को मुझे हॉकी खिलाने के लिए प्रेरित किया, लेकिन हमारे पास कोचिंग की फीस देने को रुपये नहीं थे। प्रीतम सिवाच ने हॉकी की निशुल्क कोचिंग के साथ ही मुझे पूरा सपोर्ट किया।
- साक्षी राणा, भारतीय महिला हॉकी टीम की खिलाड़ी
मेरे घर में हॉकी का माहौल है। पिता एंपायर, मां व भाई हॉकी के खिलाड़ी रहे हैं। पूरे परिवार की दिली इच्छा थी कि मैं भी हॉकी के गुर सीखकर देश के लिए मेडल जीतूं। प्रीतम ने मेरी हर तरह से मदद की है। उनके कारण ही मैं आज टीम का हिस्सा हूं।
- शिल्पी डबास, भारतीय महिला हॉकी टीम की खिलाड़ी