नई दिल्‍ली, अंशु सिंह। पेशे से टेक्सटाइल डिजाइनर अभिषेक पाठक ने करीब दस वर्ष अलग-अलग कंपनियों के साथ काम किया और फिर अपने जुनून की वजह से उद्यमिता को आजमाने का निर्णय लिया। पारंपरिक कला एवं क्राफ्ट में गहरी रुचि थी, तो उन्होंने ग्रामीण बुनकरों के साथ काम करना शुरू किया। दो वर्ष पहले अभिषेक ने ‘ग्रीनवेयर’ नाम से अपनी कंपनी की नींव रखी, जो विभिन्न प्रकार के ‘सोलरवस्त्र’ बना रही है जो पर्यावरण के अनुकूल हैं। इसके सूत सोलर चरखे से काते जाते हैं, फैब्रिक की बुनाई सोलर लूम पर होती है, जबकि कपड़े की सिलाई सोलर सिलाई मशीन से की जाती है। वह काउंसिल आन एनर्जी, एनवायरमेंट एवं वाटर (सीईईडब्ल्यू) और विलग्रो इनोवेशन फाउंडेशन द्वारा संयुक्त रूप से चलाए जा रहे ‘पावरिंग लाइवलीहुड्स प्रोग्राम’ का हिस्सा भी हैं।

ग्रीनवेयर के संस्थापक एवं सीईओ अभिषेक कहते हैं, ‘मेरा सपना पूरी तरह देश में निर्मित फैब्रिक तैयार करना है। इसके अलावा, हमारा लक्ष्य पांच हजार महिला बुनकरों के लिए रोजगार के अवसर सृजित करना है, ताकि उनके सशक्तीकरण से समाज में एक सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सके।’मूलत: उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर के अभिषेक के पिता अधिवक्ता हैं और परिवार के अन्य सदस्य शिक्षण पेशे से जुड़े हैं। उद्यमिता से किसी का भी नाता नहीं रहा है। अभिषेक ने दिल्ली के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ फैशन डिजाइनिंग से टेक्सटाइल डिजाइनिंग करने के बाद अमेरिकी लग्जरी होम फैशन ब्रांड के साथ डिजाइन एवं प्रोडक्ट डेवलपमेंट हेड के रूप में काम करना शुरू किया। अगले दो वर्षो में उनका रुझान पारंपरिक टेक्सटाइल की ओर हुआ। अभिषेक ने ‘प्रकृति’ नाम से एक कंपनी की स्थापना की और राजस्थान के ब्लाक प्रिंटिंग बुनकरों के साथ काम करना शुरू किया। वह बताते हैं, ‘दरअसल कालेज में पढ़ाई के दौरान क्लस्टर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के तहत मुङो माहेश्वर (मध्य प्रदेश) के स्थानीय बुनकरों के साथ काम करने का अनुभव हुआ। उनके परिवारों को करीब से देखने के बाद मेरी आंखें खुल गईं। देश में इतना हुनर छिपा है, लेकिन उसके कद्रदान नहीं हैं। उसी क्षण मन में संकल्प किया कि बुनकरों के आर्थिक उत्थान, उनके हुनर को पहचान दिलाने के लिए कुछ ठोस करना है। उनके उत्पादों को बाजार तक पहुंचाना है। इस तरह ‘ग्रीनवेयर’ की शुरुआत हुई।’

सोलर चरखे से बढ़ी उत्पादकता: अभिषेक की मानें तो देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधारने एवं संवारने में खादी की अहम भूमिका हो सकती है, खासकर जब इसमें तकनीक का समावेश हो। वह बताते हैं, ‘हमारे यहां वर्षो से चरखे पर सूत बुना जा रहा है, लेकिन इसमें काफी समय लगता है। एक ग्लोबल रिसर्च के दौरान मुङो सोलर चरखे की जानकारी मिली। इस चरखे को हाथ से चलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आमतौर पर जो महिलाएं आठ घंटे में हाथ से 50 से 60 ग्राम सूत बुना करती हैं, वे इस सोलर चरखे से इतने ही समय में एक किलो सूत की बुनाई कर पाती हैं।’

फैब्रिक के साथ प्रयोग: दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु, मुंबई जैसे मेट्रो शहरों में विकसित स्टार्टअप इकोसिस्टम के बीच शुरुआत करने की जगह अभिषेक ने लखनऊ में उद्यम शुरू करने का बड़ा फैसला लिया है। सफेदाबाद (बाराबंकी) में इनकी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट एवं सेग्रिगेशन सेंटर है। इस समय 78 महिलाएं वहां काम कर रही हैं। इसके अलावा, बिहार के नालंदा, गया, भागलपुर एवं उत्तर प्रदेश के वाराणसी एवं बिजनौर में भी यूनिट हैं। टीम में बुनकरों के अलावा रिसर्च, इनोवेशन, डिजाइनिंग, मार्केटिंग आदि से जुड़े पेशेवर लोग हैं। इस समय ये नालंदा की बावन बूटी साड़ी एवं पूरी तरह देसी बनारसी साड़ी के निर्माण पर काम कर रहे हैं। बताते हैं अभिषेक, हम लगातार इनोवेशन करते रहने में विश्वास करते हैं। अलग-अलग प्रकार के फैब्रिक पर काम किया जा रहा है। जैसे इन दिनों टैमरिंड फैब्रिक को लेकर प्रयोग चल रहे हैं, जिसमें इमली के साथ काटन को मिक्स किया जाता है। इसी तरह, बनारसी साड़ी में भी किया जा रहा है। मैं मानता हूं कि काम ही आपको सब सिखा देता है।

आइआइएम कलकता इंक्यूबेशन पार्क में पड़ी ग्रीनवेयर की नींव: सोलर चरखा ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण का माध्यम बन सकता है, यह विचार जब अभिषेक के मन में आया तो उन्होंने एक नई शुरुआत करने का निर्णय लिया। उन्हें टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज की एक प्रतियोगिता में शामिल होने का अवसर मिला। उसमें वे रनरअप रहे। वहीं से उन्हें ‘जनहित जागरण अभियान’ की जानकारी मिली। इसमें सफलता हासिल करने के बाद अभिषेक को आइआइएम कलकत्ता स्थित इंक्यूबेशन सेंटर से पचास लाख रुपये की सीड फंडिंग मिली और उन्होंने ‘ग्रीनवेयर’ कंपनी लांच कर दी। फिलहाल उनके अभी दो रिटेल स्टोर्स हैं।

[अभिषेक पाठक, संस्थापक व सीईओ ग्रीनवेयर]

Edited By: Sanjay Pokhriyal