नवीन नवाज, श्रीनगर। कट्टरपंथ के दिनों में कश्मीर में ट्रांसजेंडर्स (किन्नरों) का भी कत्लेआम हुआ। इनके कार्य को धर्मविरुद्ध करार दिया गया। समाज ने इन्हें धिक्कारा और मरने के लिए छोड़ दिया। डॉ. एजाज अहमद बंड तब इनके लिए मसीहा बनकर सामने आए। यह वर्ग अब राहत की सांस ले रहा है। स्थिति सुधरने लगी है। कश्मीर में ट्रांसजेंडर वर्ग अब हंसी का पात्र नहीं रह गया है।

डॉ. बंड इस वर्ग के जीवनस्तर को बेहतर बनाने के प्रयास में जुटे हुए हैं। अदालत में उनके अधिकारों के लिए लड़ने वाले डॉ. बंड का यह प्रयास इसलिए अहम है क्योंकि इससे स्थानीय समाज ने इस वर्ग को हिकारत की नजर से देखना छोड़ दिया है और इसे लेकर संवेदना बढ़ी है। जब आतंकवाद का दौर शुरू हुआ तो कई जिहादी तत्वों ने ट्रांसजेंडर्स का कत्ल भी किया क्योंकि वह इन्हें काफिर कहते थे। डॉ. बंड किन्नरों के हक के लिए संघर्षरत हैं। उनके प्रयास से कश्मीर विवि में सोशल साइंस विभाग ने ट्रांसजेंडरों केबारे में शोध की अनुमति दी। जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट में भी वह इनके अधिकारों की बहाली के लिए पहुंचे। राज्य मानवाधिकार आयोग का भी दरवाजा खटखटाया। नतीजन अब इस वर्ग की स्वीकार्यता बढ़ने लगी है।

डॉ. बंड बताते हैं, यहां इनकी संख्या का स्पष्ट आंकड़ा नहीं है। हम कोशिश कर रहे हैं कि यह लोग सम्मानजनक जिंदगी जिएं। हमने सोंजल नामक संस्था बनाई है, जो लगातार इनके लिए काम कर रही है। बंड ने कहा, शुरू में कई लोगों ने मेरा मजाक उड़ाया। उलाहने मिले, लेकिन मैं ठान चुका था। कश्मीर के हिजड़े नामक किताब लिख चुके डॉ. बंड ने कहा कि मेरी बहन के रिश्ते की बात चल रही थी। मेरी एक किन्नर से मुलाकात हुई क्योंकि कश्मीर में किन्नरों के पास यही एक काम है- किसी शादी में नाच-गाना। बातचीत के दौरान मुझे महसूस हुआ कि मेकअप के पीछे जो चेहरा है, वह पूरी तरह से मायूस है। मैंने इन लोगों से मिलना शुरू किया। इन्हें आपस में जोड़ना और इनके लिए रोजगार के अवसर तलाशना शुरू किए।

कई दर्दनाक कहानियां सुनने को भी मिली। यह लोग सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक और भावानात्मक रूप से पूरी तरह शोषित होते हैं। जिससे मिला, उसने ही एक दर्दभरी दास्तां सुनाई। इनमें अधिकांश दयनीय हालात में ही रहते हैं। जो बुजुर्ग हो जाते हैं, उनकी लाश तक उठाने वाला कोई नहीं मिलता। कोई उन्हें दफनाने के लिए नहीं आता। डॉ. एजाज ने कहा कि हमने कुछ वर्षों के दौरान यहां कई सेमीनार, सभाएं और बैठकें कीं। कश्मीर की सिविल सोसायटी को जोड़ा।

किन्नर समुदाय के मुद्दों को उठाया। आज कई जगह किन्नर समुदाय के लोगों की प्रतिभा को लोग यहां स्वीकारते हैं। वह उन्हें अब उपहास और तिरस्कार की दृष्टि से नहीं देखते। हमारी संस्था उनके लिए ब्यूटिशियन, सिलाई-कढ़ाई समेत विभिन्न प्रकार के हुनर सिखाने व उन्हें रोजगार दिलाने का प्रयास करती है। हमारा प्रयास है कि स्कूल-कॉलेजों में इनकी पढ़ाई में किसी तरह की बाधा न हो, सरकारी रोजगार में इन्हें हिस्सा मिले।

इस्लाम में किन्नर समुदाय के खिलाफ कोई बात नहीं है, लेकिन कई लोगों ने इस्लाम की गलत व्याख्या के आधार पर ही इन्हें निशाना बनाया है। किन्नर तो हमेशा से समाज के प्रत्येक वर्ग में रहे हैं। किसी के साथ लैंगिक आधार पर पक्षपात, हिंसा की इस्लाम में कोई इजाजत नहीं है। इस्लाम में इस समुदाय का स्पष्ट उल्लेख है। इन्हें मकहान्नथुन कहा है। इन्हें इस्लाम के मुताबिक कई अधिकार प्राप्त है। इनका अपने परिवार की संपत्ति पर पूरा अधिकार है। अगर कोई किन्नर महिलाओं की तरह ज्यादा है तो उसे पुश्तैनी संपत्ति में महिलाओं को दिए जाने वाले हक के समान ही हक होगा और अगर वह किसी मर्द की तरह है तो उसे मर्द के लिए तय हिस्से के मुताबिक ही हिस्सा मिलेगा।

कश्मीर में इन लोगों को यह हक भी नहीं मिल रहा था। डॉ. एजाज बंड ने कहा कि आज हमारे साथ करीब 300 लोग जुड़ चुके हैं। किन्नर समुदाय के लोग भी बड़ी संख्या में हमारे साथ हैं। हमारा प्रयास है कि जम्मू कश्मीर में सरकार अपने बजट में इन लोगों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए पर्याप्त राशि का प्रावधान करे। इनके सामाजिक सरोकारों के संरक्षण की कोई नीति बने।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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