सुरेंद्र प्रसाद सिंह, नई दिल्ली। गरीबों की राशन स्कीम में भी पूर्वी राज्य रोड़ा बने हुए हैं। इसके चलते 'एक देश एक राशन कार्ड' जैसी अहम योजना के समय से पूरा होने को लेकर संदेह है। हालांकि देश के 12 राज्यों में योजना सफलतापूर्वक लागू हो चुकी है, जिसका लाभ उन राज्यों के उपभोक्ता उठा भी रहे हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्य लगातार पिछड़ते जा रहे हैं। जबकि योजना को 30 जून 2020 तक पूरा होने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

खाद्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक देश के एक जनवरी 2020 से देश के कुल 12 राज्यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, गोवा, झारखंड और त्रिपुरा में 'एक देश एक राशन कार्ड' की सुविधा की शुरुआत हो गई है। इन 12 राज्यों के जन वितरण प्रणाली के लाभार्थियों को अब संबंधित इनमें से किसी भी राज्य में निवास करते हुए अपने मौजूदा राशन कार्ड से ही अपने हिस्से का राशन प्राप्त कर सकते हैं। 30 जून 2020 तक देश के सभी राज्यों को इस योजना से जोड़ने का लक्ष्य है।

यूपी में 98 फीसद राशन कार्ड धारकों का बायोमीट्रिक

उत्तर प्रदेश 13.37 करोड़ राशन कार्ड वाला राज्य है, जिसमें से लगभग 50 फीसद राशन कार्ड अंत्योदय वर्ग के लिये हैं। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि राज्य में अभी भी शत प्रतिशत राशन दुकानों पर ई-पॉस मशीन नहीं लगाई जा सकी है। हालांकि 98 फीसद राशन कार्ड धारकों का बायोमीट्रिक कर लिया गया है। जबकि सभी लाभार्थियों को आधार से जोड़ भी दिया गया है। इसके बावजूद राज्य सरकार राशन कार्ड की पोर्टेबिलिटी के लिए जुलाई 2020 तक का समय मांगा है।

बंगाल में 20 हजार राशन दुकानों में पांच सौ मशीनें लगाई गईं

बिहार में भी हालात बहुत संतोषजनक नहीं हैं। यहां के 9.17 करोड़ कार्ड धारकों में से छह करोड़ को ही आधार से लिंक किया गया है। ई-पॉस मशीनें लगाने का काम भी धीमी गति से चल रहा है। बिहार के बाद भाजपा शासित असम और पश्चिम बंगाल में ई-पॉश महीने लगाने का काम सुस्त है। बंगाल में 20 हजार राशन दुकानों में से लगभग पांच सौ मशीनें लगाई जा सकी हैं। इन राज्यों के सुदूर क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। इन हालातों में वन नेशन-वन राशन कार्ड योजना की सफलता पर संदेह है।

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