अजय अग्निहोत्री, रूपनगर। आइआइटी रोपड़ के विज्ञानियों की टीम द्वारा विकसित डोफिंग यूनिट के मॉडल ने बड़ी राहत पहुंचाने का काम किया। पीजीआइ चंडीगढ़ और देश के कई अस्पतालों में इसी मॉडल पर आधारित डोफिंग यूनिट डॉक्टरों व स्टाफ को संक्रमण से बचा रही है। यह वह सुरक्षित स्थान होता है, जहां वे पीपीई किट पहन व उतार या सैनिटाइज कर सकते हैं। कोरोना काल में अब तक आइआइटी के प्रोफेसर व शोधकर्ता दस ऐसे उपकरण तैयार कर चुके हैं, जो इस जंग में कारगर हथियार साबित हुए। इनमें कोविड संदिग्धों की पहचान के लिए इंटेलीजेंट इन्फ्रारेड विजन सिस्टम, कैश स्टरलाइजेशन मशीन, कोविड केयर सेंटर में भोजन व सामान पहुंचाने वाले रोबोट, पीपीई स्टरलाइजेशन यूनिट, घरेलू सामान को संक्रमण से मुक्त करने के लिए यूवी-सी जर्मीसाइडल इरेडिकेशन तकनीक पर आधारित उपकरण व फ्रंटलाइनर्स की सुरक्षा के लिए कंटेनमेंट बॉक्स शामिल हैं। 

आइआइटी की इस टीम में शोधकर्ता डॉ. खुशबू राखा, डॉ. धीरज महाजन और प्रो.नरेश राखा सहित अन्य विज्ञानी सम्मिलित हैं। कोरोना के खिलाफ जंग में आइआइटी रोपड़ को केंद्र सरकार से एकाधिक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट मिले। पीपीई किट व अन्य बचाव उपकरण उतारते समय डॉक्टर व स्टाफ कोरोना वायरस के संपर्क में न आएं, इसको लेकर आइआइटी ने विशेष डोफिंग यूनिट का मॉडल तैयार किया। यह मॉडल भी केंद्र सरकार की कोरोना टास्क फोर्स के आग्रह पर बनाया गया, जिसे प्रोफेसर खुशबू राखा की टीम ने 15 दिन में तैयार करके भेजा था। 

(डॉ. खुशबू राखा)

टास्क फोर्स के चीफ साइंटिफिक एडवाइजर ने इस मॉडल को अप्रूव कर व्यावसायिक उत्पादन के लिए अनुशंसित कर दिया। कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज की सहमति के बाद फरीदाबाद (हरियाणा) की बाफना हेल्थ केयर कंपनी ऐसी यूनिट्स तैयार करके दे रही है। पीजीआइ चंडीगढ़ समेत देश के कई बड़े अस्पतालों में इन यूनिट्स का उपयोग किया जा रहा है। आइआइटी के डिपार्टमेंट ऑफ मेटलर्जी एंड मटेरियल इंजीनियरिंग की सहायक प्रोफेसर डॉ. खुशबू बताती हैं कि डोफिंग यूनिट वह स्थान होता है, जहां डॉक्टर, स्टाफ व अन्य स्वास्थ्यकर्मी पीपीई किट, ग्लव्स व अन्य उपकरण उतारते हैं। इस जगह के बार-बार प्रयोग होने से संक्रमण का खतरा सबसे अधिक रहता है। इसी खतरे को उनकी टीम ने विशेष यूनिट बनाकर न के बराबर कर दिया है। 

(डॉ. धीरज महाजन)

यूनिट की खास बात यह भी है कि इस पर एक लाख रुपये तक का खर्च आता है। अल्ट्रावॉयलेट व अल्ट्रासोनिक लाइट्स के उपयोग से संक्रमण के खतरे को समाप्त किया गया है। इस मॉडल की एक खूबी यह भी है कि इसमें पहुंचते ही पीपीई किट दोबारा उपयोग करने लायक बन जाती है, जिससे अस्पताल के मेडिकल वेस्ट में कमी आती है। 

(प्रो.नरेश राखा)

डॉ. खुशबू के अनुसार, डब्ल्यूएचओ से मान्यता प्राप्त तीन डिसइन्फेक्शन तकनीकों का इस्तेमाल इस डोफिंग यूनिट में किया गया है। यूनिट का सेटअप लगाने के लिए बस एक कमरा चाहिए। तकनीक के अनुसार, यूनिट के भीतर दरवाजे, नोब, हैंडल, नलके इत्यादि कॉपर या ब्रास के लगाए जाते हैं, जिनमें एंटी माइक्रोबियल क्षमता होती है। अंदर-बाहर हर जगर एंटी माइक्रोबियल कोटिंग भी होती है। इसके अलावा नेगेटिव प्रेशर रूम की व्यवस्था की गई है, जिससे हवा में वायरस के रहने का खतरा नाममात्र रह जाता है। यूनिट में दो बॉक्स लगाए जाते हैं। एक वह जिसमें डाली जाने वाली किट दोबारा इस्तेमाल की जानी है, दूसरा वह जिसमें निस्तारण के लिए। इसमें पांच से 10 मिनट के अल्ट्रावॉयलट (यूवी-सी) ट्रीटमेंट से गुजरते ही किट संक्रमणरहित हो जाती है। इसी मॉडल के आधार पर अस्पतालों में संग्रह पेटी, कॉपर या ब्रास के हैंडल, एंटी माइक्रोबियल कोटिंग व यूवी लाइट्स लगाई गई हैं।  

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) के राष्ट्रीय प्रमुख डॉ. राजन शर्मा ने कहा कि मार्च से लेकर 30 नवंबर तक देश में कोरोना से 674 डॉक्टरों की मौत हो चुकी है, जबकि छह हजार से अधिक संक्रमित हुए। इन डॉक्टरों में साठ फीसद जनरल प्रैक्टिशनर हैं। आइएमए की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में डॉक्टरों की कोरोना से मौत का औसत सबसे अधिक 16.7 फीसद है। फ्रंटलाइनर्स, खासकर डॉक्टर्स, कोरोना संक्रमित या संभावित मरीजों के बिल्कुल पास होते हैं। छोटी-सी चूक होने पर इनके भी संक्रमित होने की संभावना ज्यादा रहती है। ऐसे में इस तरह के उपाय ही रक्षक साबित होते हैं।

(कैप्टन अमरिंदर सिंह,   मुख्यमंत्री, पंजाब।)

पंजाब के मुख्‍यमंत्री कैप्‍टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि अपने नवोन्मेषी प्रयोगों, खोज और शोध-अनुसंधान के कारण आइआइटी रोपड़ ने देश ही नहीं, पूरे विश्व में पहचान बनाई है। कोरोना की जंग में भी इनका योगदान अहम रहा है। यहां के शोधकर्ता किसी फ्रंटलाइनर्स से कम नहीं रहे हैं। यह जानकर खुशी हुई कि पंजाब के एक संस्थान ने पूरे देश को डोफिंग यूनिट के रूप का कारगर मॉडल दिया, जो हमें कोरोना से बचाने वाले डॉक्टरों को बचा रहा है।  

Edited By: Manish Mishra

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