चंदन कुमार चौधरी। संसद में हाल में पेश राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के एक आंकड़े के मुताबिक, देश में वर्ष 2017-19 के बीच 14-18 आयु वर्ग के 24 हजार से अधिक बच्चों ने आत्महत्या कर ली, जिनमें परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने से खुदकुशी करने वाले बच्चों की संख्या 4,046 है। निश्चित रूप से यह संख्या बहुत अधिक है, जो परेशान करने वाली है। इस पर समय रहते हुए लगाम लगाने की जरूरत है, नहीं तो हालात भयावह हो सकते हैं।

कुछ किशोर आत्महत्या को समस्याओं का हल मान लेते हैं...

माना जाता है कि किशोर अक्सर आवेग में आकर आत्महत्या की कोशिश करते हैं। कुछ किशोर आत्महत्या को समस्याओं का हल मान लेते हैं जो कहीं से सही नहीं है। ऐसे में यह अभिभावकों और शिक्षकों की जिम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों के मनोभाव को ठीक से समङों और उसका उचित और तर्कपूर्ण समाधान निकालें, ताकि देश के नौनिहालों का जीवन सुरक्षित रह सके।

बच्चे पर पास या फेल का ठप्पा लगा बैठते हैं...!

असल में जब बच्चों का स्कूलों में नामांकन कराया जाता है तभी से अभिभावक उनकी उम्र, क्षमता को भूल कर अपनी उम्मीदों का सारा बोझ उनके कंधे पर लादने का प्रयास करना शुरू कर देते हैं। उस समय अभिभावक भूल जाते हैं कि बच्चों के नाजुक कंधे उनकी उम्मीदों का बोझ उठाने में सक्षम हैं भी या नहीं। फिर यहीं से शुरू होता है बच्चों के पास और फेल होने का खेल। हमें समझना होगा कि बच्चों का मन नाजुक होता है। उनके नाजुक मन पर अंकित होने वाली कोई भी बात जीवन भर उनके साथ रहती है। हमारा मकसद भले ही कुछ हो, लेकिन हम जाने-अनजाने इस मामले में गलत आकलन करके बच्चे पर पास या फेल का ठप्पा लगा बैठते हैं। इसके बजाय हमें इस बात पर जोर देना चाहिए कि बच्चों में तर्क आधारित सोच को कैसे बेहतर बनाया जाए।

खेल-खेल में बच्‍चों को समझाएं और बताएं

बच्चों को सिखाने का बेहतर तरीका यही है कि हम खेल-खेल में उन्हें समझाएं और बताएं। साथ ही स्कूलों में शिक्षकों और घरों पर अभिभावकों को बच्चों की क्षमता पर टिप्पणी और किसी अन्य बच्चों के साथ उनकी तुलना नहीं करनी चाहिए। भले ही यह बात छोटी और सामान्य लगे, लेकिन बाल मन पर इसका बहुत ही गंभीर और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

नाजुक कंधों पर बोझ बढ़ता जाता है...!

बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए हमें एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए, जिसमें स्कूल का माहौल सकारात्मक और खुशनुमा हो सके। जब हम बच्चों पर उम्मीदों का बोझ डालते हैं तो फिर दिनों-दिन उनके नाजुक कंधों पर बोझ बढ़ता जाता है। और यही बोझ उनके लिए एक दिन काफी नुकसानदेह साबित होता है, जो उन्हें खुदकुशी की ओर ले जाता है। अगर हम बच्चों पर उम्मीदों का बोझ नहीं डाल, उन्हें चिंता मुक्त कर उनके व्यक्तित्व को पूरी तरह से निखार कर सामने लाने का प्रयास करेंगे तो निश्चित रूप से वे समाज के एक जिम्मेदार सदस्य बन सकेंगे।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Edited By: Tilakraj