नई दिल्ली। श्रीलंकाई तमिल मुद्दे पर यूपीए सरकार से समर्थन वापसी के बाद बुधवार को द्रमुक कोटे के पांच मंत्रियों ने पहले यूपीए की चेयरमैन सोनिया गांधी से मुलाकात की और फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपना इस्तीफा सौंप दिया।

इस बीच, द्रमुक सांसद तिरुचि सिवा ने कहा कि पार्टी का अब यूपीए सरकार से समर्थन वापसी पर पुनर्विचार का सवाल ही नहीं उठता है। यह पूछे जाने पर कि क्या वह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाएंगे, उन्होंने कहा कि यह उनकी पार्टी का विषय नहीं है इसलिए वह इस पर टिप्पणी करना उचित नहीं समझते हैं।

उधर, भाजपा ने जहां सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाने का फैसला किया है, वहीं उसकी सहयोगी अकाली दल का मानना है कि सपा और बसपा को साथ लाकर सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का यह वक्त है। इस बीच, वर्तमान राजनीति उठापटक को लेकर बातचीत के लिए आज फिर कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक बुलाई गई है।

पिछले वर्ष एफडीआइ के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस के हटने के बाद पहले ही अल्पमत में आ चुकी संप्रग-दो सरकार के सामने अब कार्यकाल पूरा करने की चुनौती और बढ़ गई है। अब तक हर संकट के समय कांग्रेस के संकटमोचक रहे दोनों दल सपा और बसपा फिर सरकार के खेवनहार बने हैं। आंकड़ों के लिहाज से तत्काल कोई संकट सरकार पर नहीं दिख रहा है, लेकिन मध्यावधि चुनाव की न सिर्फ चर्चाएं बढ़ गई हैं, बल्कि कई लोकलुभावन फैसलों व विधेयकों से माहौल बदलने की कांग्रेस की तैयारियों को भी बड़ा झटका लगा है।

तमिलों के मुद्दे पर श्रीलंका के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की 22 मार्च को होने वाली बैठक में कड़ा प्रस्ताव लाने के लिए दबाव बना रहे करुणानिधि ने मंगलवार को सवेरे ही संप्रग से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। द्रमुक की मांग थी कि प्रस्ताव में श्रीलंका में तमिलों पर हो रहे अत्याचार को देखते हुए प्रस्ताव में 'नरसंहार' शब्द को जोड़ा जाए। इस पर सोमवार की रात को करुणानिधि से मिलने चेन्नई गए एके एंटनी, पी चिदंबरम और गुलाम नबी आजाद ने विदेशी नीति का हवाला देते हुए असमर्थता जता दी। अलबत्ता, संसद में प्रस्ताव लाने पर जरूर आश्वासन दिया, लेकिन भाषा पर द्रमुक राजी नहीं था। तमिलनाडु में जयललिता सरकार से बड़ी लकीर खींचने के लिए द्रमुक ने केंद्र सरकार से बाहर जाने का रास्ता अख्तियार किया। हालांकि, उसने अभी भी एक बार भी सरकार गिराने की बात नहीं की।

कांग्रेस तृणमूल के बाद द्रमुक से भी संबंध पूरी तरह बिगाड़कर उन्हें नहीं जाने देना चाहती। इसीलिए, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने संसदीय दल की बैठक में द्रमुक की भावनाओं का सम्मान किया और कहा कि श्रीलंका में अत्याचार की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। कांग्रेस यह संदेश नहीं देना चाहती कि उसने अपने सहयोगियों के साथ गलत व्यवहार किया, जिस वजह से उसके दोनों सबसे बड़े सहयोगी साथ छोड़ गए। अभी कुछ हद तक कांग्रेस इसमें कामयाब भी हुई है, क्योंकि करुणानिधि ने सीधे कांग्रेस पर कोई तल्ख हमला नहीं किया है।

यही कारण है कि कांग्रेस के प्रबंधक सरकार में किसी तरह का कोई संकट नहीं देख रहे। श्रीलंका संकट के मुख्य प्रबंधक बनाए गए वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कहा भी कि सरकार पर किसी तरह का संकट नहीं है। श्रीलंका मसले पर उन्होंने कहा कि संसद में प्रस्ताव लाने के मुद्दे पर सभी दलों से विचार-विमर्श की प्रक्रिया जारी है। देर शाम को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, एंटनी, चिदंबरम, गुलाम नबी आजाद, सलमान खुर्शीद और कमलनाथ के बीच भी संभावित विकल्पों पर चर्चा होती रही।

फिलहाल, बहुमत के आंकड़ों पर सरकार चिंतित नहीं है। बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा महासचिव रामगोपाल यादव ने सरकार को समर्थन देते रहने की बात कर इन चिंताओं को दूर कर दिया। अलबत्ता लोकपाल, भूमि अधिग्रहण, खाद्य सुरक्षा विधेयकों के सहारे सियासी माहौल अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटी कांग्रेस की अब सपा-बसपा और दूसरे दलों पर निर्भरता जरूर बढ़ गई है।

माया-मुलायम की मजबूरी बनी सरकार के लिए ऑक्सीजन

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा और बसपा एक बार फिर से अपना सियासी नफा-नुकसान आंकने लगे हैं। केंद्र की संप्रग सरकार के गिरने की तोहमत दोनों ही दल अपने ऊपर नहीं आने देना चाहते। सपा और बसपा की यही राजनीतिक ऊहापोह संप्रग सरकार को अब तक आक्सीजन देती रही है। अब द्रमुक के समर्थन वापसी के एलान के बाद दोनों दलों की यही मजबूरी सरकार के फिर से काम आने जा रही है।

द्रमुक की ओर से समर्थन वापसी के एलान के बाद सरकार पर तुरंत कोई खतरा आए बगैर ही सपा और बसपा का सरकार के साथ खड़े होने काएलान करना उनकी राजनीतिक मजबूरियों को दर्शाता है। सूत्रों की मानें तो मायावती समय से पहले लोकसभा चुनाव के पक्ष में नहीं हैं। बसपा का मानना है कि जितनी देर में चुनाव होगा, उत्तर प्रदेश में सपा सरकार की असफलताओं के चलते दिनोंदिन उसका नुकसान बढ़ना तय है। लिहाजा, वह केंद्र के साथ मजबूती से खड़ी है। उधर, बसपा के इस रुख को भांपकर ही सपा भी जान गई है कि फिलहाल सरकार को कोई संकट नहीं होने जा रहा। साथ ही सरकार से समर्थन वापसी की स्थिति में सपा को कहीं न कहीं मुस्लिम वोटों के छिटकने का डर भी सता रहा है। ऐसे में वह अनायास ही सरकार से दूरी बनाकर खुद पर परोक्ष रूप से सांप्रदायिक ताकतों की मदद करने का ठप्पा नहीं लगवाना चाहती। साथ ही उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार की जरूरतों के मद्देनजर भी वह केंद्र से पल्ला झाड़ने में कतरा रही है।

सपा के प्रो. रामगोपाल यादव ने तो सरकार से द्रमुक की समर्थन वापसी को ब्लैकमेलिंग करार दे दिया है। उन्होंने कहा कि श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे पर द्रमुक ने समर्थन वापसी की बात भले कही हो, लेकिन उसने न तो समर्थन वापस लिया है और न ही उसका ऐसा इरादा है। सरकार न अल्पमत में है और न ही उसे कोई खतरा है। यह पूछे जाने पर कि क्या सपा का समर्थन सरकार को जारी रहेगा? प्रो. यादव ने कहा कि सपा तो सरकार को बाहर से समर्थन दे ही रही है। वहीं, 21 सांसदों वाली बसपा की प्रमुख मायावती ने स्पष्ट कहा, 'हम देश में सांप्रदायिक ताकतों को मजबूत नहीं करना चाहते, इसलिए संप्रग सरकार से नाराजगी के बावजूद उसे समर्थन जारी रहेगा। सरकार अल्पमत में नहीं है।' हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि अनुसूचित जाति, जनजाति को प्रोन्नति में आरक्षण और महंगाई जैसे मुद्दों पर सरकार से उनका मतभेद है। फिर भी सांप्रदायिकता के सवाल पर बसपा सरकार के साथ है।

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