DJ की तेज आवाज से हैं परेशान, कहां करें शिकायत? जानिए नियम
सार्वजनिक आयोजनों और डीजे से होने वाले अत्यधिक शोर से परेशान निवासी कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं। भारत में ध्वनि ...और पढ़ें

तेज आवाज में DJ बजने पर कर सकते हैं शिकायत (AI जेनरेटेड फोटो)
HighLights
भारत में ध्वनि प्रदूषण के सख्त नियम लागू हैं।
आवासीय क्षेत्रों में शोर की सीमा 45-55 डेसिबल।
अत्यधिक शोर पर पुलिस या कोर्ट में शिकायत करें।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। घरों के बाहर बजता साउंड सिस्टम, डीजे से इतना ज्यादा शोर-शराबा हो जाता है कि उसके आस-पास रह रहे लोगों का रहना मुश्किल हो जाता है। किसी के घर का जश्न, किसी दूसरे की नींद खराब कर सकता है। इतना ही नहीं काफी तेज शोर से लोगों को कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं।
इन सभी बातों से ये भी सवाल उठता है कि क्या इन मामलों में कोई एक्शन लिया जा सकता है। आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थिति है, जब सार्वजनिक जश्न कानून का उल्लंघन कहलाता है?
ज्यादातर लोग काफी तेज साउंड सिस्टम बजने पर शोर सहते रहते हैं, क्योंकि वे आयोजकों से बात करके किसी विवाद में नहीं फंसना चाहते। ऐसे मामलों में ज्यादातर आयोजक से वॉल्यूम कम करने के लिए कहने पर हंगामा खड़ा हो जाता है। ऐसे में पड़ोसियों या कार्यक्रम आयोजित करने वालों के साथ विवाद होने का खतरा भी रहता है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में शोर के स्तर, लाउडस्पीकर के इस्तेमाल और उन्हें चलाने के समय को लेकर नियम बने हुए हैं। इन नियमों को जानना और उन्हें लागू करवाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
जब बार-बार आवाज कम करने के लिए कहने पर भी कोई न सुने, तो निवासी क्या कर सकते हैं? क्या वे पुलिस को बुला सकते हैं, कोई औपचारिक शिकायत दर्ज करा सकते हैं या जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं? आइए इन सभी सवालों का जवाब जानते हैं।
देश में ध्वनि प्रदूषण को लेकर क्या हैं नियम?
भारत में सार्वजनिक आयोजनों में तेज आवाज में संगीत बजना एक आम बात है - चाहे वह धार्मिक जुलूस हों, सामुदायिक त्योहार हों, शादियां हों, राजनीतिक रैलियां हों या डीजे नाइट्स।
भारत में ध्वनि प्रदूषण के नियम, 'ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000' के तहत आते हैं, जिन्हें 'पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986' के अंतर्गत बनाया गया है। ये नियम दिन के समय (सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक) और रात के समय (रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक) के लिए अलग-अलग हैं।
अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और अदालतों जैसी संवेदनशील जगहों के आस-पास, नियमों और अधिसूचनाओं के आधार पर 'शांत क्षेत्र' (साइलेंस जोन) घोषित किए जा सकते हैं।
ये नियम औद्योगिक, व्यावसायिक, आवासीय और शांत क्षेत्रों (साइलेंस जोन) के लिए शोर की अलग-अलग सीमाएं तय करते हैं।
- औद्योगिक क्षेत्रों में दिन के समय 75 डेसिबल और रात में 70 डेसिबल तक शोर की अनुमति
- व्यावसायिक क्षेत्रों में दिन के समय 65 डेसिबल और रात में 55 डेसिबल तक शोर की अनुमति
- आवासीय क्षेत्रों में दिन के समय 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल तक शोर की अनुमति
- शांत क्षेत्रों में दिन के समय 50 डेसिबल और रात में 40 डेसिबल तक शोर की अनुमति
'ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000' के नियम 5(3) के तहत, राज्य सरकारें कुछ शर्तों के साथ, सांस्कृतिक, धार्मिक या त्योहारों के मौकों पर रात 10 बजे से आधी रात तक लाउडस्पीकर के इस्तेमाल की अनुमति दे सकती हैं।
यह अनुमति एक कैलेंडर वर्ष में अधिकतम 15 दिनों के लिए दी जा सकती है। यह छूट अपने आप नहीं मिल जाती, इसके लिए संबंधित तारीखों को पहले से बताना जरूरी होता है और यह अनुमति भी तय शर्तों के अधीन होती है।
इन मामलों में क्या ले सकते हैं एक्शन?
बहुत तेज आवाज या संगीत से परेशान निवासी पुलिस और शोर-शराबे से जुड़े नियमों को लागू करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों से शिकायत कर सकते हैं।
अगर उनकी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो वे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों, जिला प्रशासन या प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरणों से संपर्क कर सकते हैं और नियमों का पालन कराने के लिए कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा सकते हैं।
आम लोगों के पास इसके अलावा भी कई ऑप्शन हैं।
- नियमों के उल्लंघन का रिकॉर्ड रखना
- शिकायत दर्ज कराना
- मजिस्ट्रेट से दखल देने की मांग करना
- हाई कोर्ट जाना
- जब नियमों का बार-बार उल्लंघन हो रहा हो और कोई कार्रवाई न की जा रही हो, तो सबूत संभाल कर रखना और सही माध्यमों से शिकायत को आगे बढ़ाना बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है।
- सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितना शोर 'बहुत ज्यादा' है, बल्कि यह है कि क्या प्रशासन किसी गड़बड़ी के बढ़ने, टकराव की स्थिति बनने या जनस्वास्थ्य के खतरे में पड़ने से पहले कानून को लागू करता है या नहीं।
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