मुंबई [प्रेट्र]। कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों और वरिष्ठ वकीलों ने महाराष्ट्र पुलिस की आलोचना की है। माओवादियों से संपर्क के कारण इस सप्ताह के शुरू में गिरफ्तार किए गए वामपंथी कार्यकर्ताओं की जांच के दौरान जुटाए गए सुबूतों को पुलिस ने मीडिया के सामने उजागर कर दिया है। कानूनी दायरे के कुछ अन्य लोगों ने उल्लेख किया कि किसी मामले में पुलिस दस्तावेज सार्वजनिक कर सकती है या नहीं इसके बारे में कोई नियम नहीं है।

अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून एवं व्यवस्था) परमबीर सिंह ने शुक्रवार को एक संवाददाता सम्मेलन में मामले का ब्योरा देते समय कार्यकर्ताओं के दौरान हुए पत्र व्यवहार का पत्र पढ़ा था। उन्होंने कहा कि इस वर्ष जून और इस सप्ताह गिरफ्तार किए गए वामपंथी कार्यकर्ताओं के माओवादियों से संपर्क का पक्का सुबूत है। उनमें से एक ने राजीव गांधी के साथ जैसी घटना हुई थी, मोदी राज खत्म करने के लिए वैसी घटना को अंजाम देने की बात की थी। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 1991 में हत्या कर दी गई थी।

बांबे हाई कोर्ट से सेवानिवृत्त न्यायाधीश पीडी कोडे ने कहा कि जांच के दौरान जमा किए गए सुबूतों को उजागर करना गलत है। प्रारंभिक स्तर पर पुलिस का काम सुबूत जुटाना है और आरोप पत्र के जरिये उसे कोर्ट में पेश करना है। वरिष्ठ वकील मिहिर देसाई ने भी इसकी आलोचना की। 
Bhima Koregaon arrrests

रिश्तेदारों ने सुबूत को मनगढंत बताया
माओवादियों के साथ संपर्क के आरोप में गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं के रिश्तेदारों ने पुलिस के सुबूतों को मनगढंत कहा है। वरवर राव के भतीजे ने शनिवार को दावा किया कि सुबूत गढ़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि पुलिस के दावे में कुछ भी नया नहीं है।

वेरनान गोंजाल्विस के परिवार ने पुलिस के आरोपों को खारिज कर दिया। परिवार ने आरोपों को मनगढंत कहा है। उनके बेटे सागर गोंजाल्विस ने कहा कि आरोप गलत हैं। परिवार ने कहा कि पुलिस तय प्रक्रिया का पालन नहीं कर रही है। मानवाधिकार कार्यकर्ता आनंद टेल्टुंुबडे ने भी महाराष्ट्र पुलिस के दावे को खारिज किया है।

Posted By: Vikas Jangra