रायपुर [राज्‍य ब्‍यूरो]। दक्षिण बस्तर में 2005-06 में नक्सली हिंसा और इसके विरोध में उठे सलवा जुडूम आंदोलन के दौरान पड़ोसी राज्यों में विस्थापित हुए आदिवासियों का मामला केंद्र सरकार तक पहुंच गया है। विस्थापितों की छत्तीसगढ़ में वापसी की कोशिशों में लगी संस्था सीजी नेट स्वरा ने 623 विस्थापित आदिवासी परिवारों की सूची केंद्रीय आदिम जाति कल्याण (ट्राइबल) मंत्रालय को सौंपी है। केंद्र सरकार ने सूची में शामिल परिवारों की पहचान करने, उन्होंने किन परिस्थितियों में पलायन किया, क्या वे वापस बस्तर जाना चाहते हैं, आदि तथ्यों की जांच करने को कहा है।

 तीन जिलों में रहा सलवा जुडूम का आंदोलन का प्रभाव
आदिवासियों को वनाधिकार कानून के तहत वापस उनके मूल गांवों में लाने की कोशिश की जाएगी। ज्ञात हो कि बस्तर के तीन जिलों दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर में सलवा जुडूम आंदोलन का प्रभाव रहा। सुकमा और बीजापुर जिलों की सीमा तेलंगाना से जुड़ी है। जुडूम के दौरान नक्सलियों ने बदला लेने के लिए आदिवासियों पर हमले किए। कोंटा इलाके के दरभागुड़ा में जुडूम समर्थकों से भरा ट्रक उड़ा दिया था। एर्राबोर समेत अन्य जुडूम कैंपों पर हमले किए।

विस्‍थापितों का आंकड़ा किसी सरकार के पास नहीं
जुडूम समर्थक भी इस दौरान अंदरूनी गांवों में जाकर ग्रामीणों को परेशान करते थे। दो पाटों के बीच फंसे आदिवासियों ने तब बार्डर पार आंध्र और तेलंगाना के जंगलों में शरण ली। पड़ोसी राज्यों में बस्तर के कितने विस्थापित हैं इसका सही आंकड़ा न छत्तीसगढ़ के पास है न तेलंगाना और आंध्र सरकार के पास। केंद्रीय ट्राइबल मंत्रालय के इस मामले में दखल से अब विस्थापितों की घर वापसी का रास्ता तय हो सकता है।

विस्‍थापितों की हालत खराब
तेलंगाना से भगाए जा रहे विस्थापित करीब 150 गांवों के तीन हजार परिवार ऐसे हैं जो बार्डर पार जंगलों में बसे हैं। वे बेहद खराब हालात में रह रहे हैं। पिछले महीने तेलंगाना के भद्रादरी कोटागुडेम जिले के मुलकुलापल्ली ब्लॉक के रसनगुडेम में वन विभाग के अफसर पहुंचे और आदिवासियों से जंगल छोड़ने को कहा। दो महीने पहले इसी इलाके में पुलिस के साथ पहुंचे वन अफसरों ने आदिवासियों के 58 घर तोड़ दिए थे।

डरे हुए हैं आदिवासी
सीजी नेट स्वरा के संस्थापक शुभ्रांशु चौधरी ने कहा कि आदिवासी घर वापसी करना चाहते हैं पर वे डरे हुए हैं। उनमें से ज्यादातर का मूल गांव बस्तर के उन जंगलों में है जो नक्सल प्रभाव वाले इलाके हैं। आदिवासी चाहते हैं कि सरकार उन्हें उनके गांव की जमीन के बदले सुरक्षित इलाके में जीवन यापन लायक जमीन दे।

वनाधिकार कानून का पेच
विस्थापित आदिवासियों के मामले में वनाधिकार कानून का भी पेच फंस रहा है। 12 दिसंबर 2005 के पहले वनभूमि में बसे लोगों को वनाधिकार पट्टा देने का कानून है। इसके लिए जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति उसी जमीन पर लगातार काबिज रहे। आदिवासी 15 साल से अपनी जमीन छोड़कर गए हैं तो उन्हें वनाधिकार कानून का फायदा मिलेगा या नहीं यह दिक्कत है। केंद्र के दखल के बाद इसका भी हल निकलने की उम्मीद है।

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Posted By: Prateek Kumar

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