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अल नीनो से कितना अलग है सुपर अल नीनो? 2027 तक हो सकती हैं लाखों मौतें

Published: Thu, 24 Sep 2026 06:01 PM (IST)

प्रशांत महासागर में आकार ले रहा सुपर अल नीनो 2027 की शुरुआत में अपने चरम पर होगा, जिससे दुनिया भर ...और पढ़ें

अल नीनो से कैसे अलग है सुपर अल नीनो?

अल नीनो से कैसे अलग है सुपर अल नीनो?

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। प्रशांत महासागर में आकार ले रहा अल नीनो पैटर्न आने वाले समय में अपना और अधिक रौद्र रूप दिखा सकता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो की क्लाइमेट इंपैक्ट लैब के अनुसार, मौसमी चक्र 2027 की शुरुआत में सुपर अल नीनो अपने चरम पर होगा।

जिसके कारण दुनिया भर में भीषण बाढ़, सूखा, रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और फसलों का भारी नुकसान देखने को मिल सकता है। ऐसे में चलिए जानते हैं कि सुपर अल नीनो क्या है, यह सामान्य अल नीनो से कितना अलग है और इसका हम पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

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दरअसल, जब प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से 0.5°C बढ़ता है, तो इसे अल नीनो माना जाता है। हालांकि, जब यह तापमान 2°C से भी अधिक हो जाता है, तो इस स्थिति को सुपर अल नीनो कहा जाता है। सामान्य अल नीनो के मुकाबले 'सुपर अल नीनो' कई गुना अधिक आक्रामक होता है। यह जलवायु परिवर्तन के साथ मिलकर वैश्विक स्तर पर रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, विनाशकारी बाढ़, भीषण सूखा की स्थिति उत्पन्न करता है।

अल नीनो क्या है?

अल नीनो प्रशांत महासागर में घटने वाली एक प्राकृतिक मौसमी प्रक्रिया है, यह वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी और बारिश के पैटर्न को बदलने के लिए जानी जाती है। आमतौर पर जब प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से 0.5°C बढ़ता है, तो इसे अल नीनो कहा जाता है।

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कैसे बनता है अल नीनो?

जब समुद्र की हवाएं कमजोर पड़ती हैं, तो पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है, जिससे अल नीनो बनता है।

  • अल नीनो प्राकृतिक रूप से होने वाले 'अल नीनो-दक्षिणी दोलन' (ENSO) चक्र का एक गर्म चरण है।
  • यह वैश्विक स्तर पर औसत तापमान को बढ़ाने का काम करता है।
  • इसके चलते दुनिया भर में बारिश का संतुलन बिगड़ जाता है, कहीं भारी बारिश होती है तो कहीं सूखा पड़ता है।
  • यह मौसमी घटना आमतौर पर हर 2 से 7 साल के अंतराल में घटित होती है।

सुपर अल नीनो क्या है?

प्रशांत महासागर की सतह का लगातार बढ़ता तापमान जब 2°C से भी अधिक हो जाता है, इस स्थिति को सुपर अल नीनो माना जाता है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 3.05°C अधिक दर्ज किया गया है। यह रिकॉर्ड इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा उछाल है। यह तय सीमा से कई गुना अधिक है।

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  • प्रशांत महासागर की सतह का लगातार बढ़ता तापमान जब 2°C से भी अधिक हो जाता है, तो इस स्थिति को सुपर अल नीनो कहा जाता है।
  • भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से 3.05°C अधिक दर्ज किया गया, यह रिकॉर्ड इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा उछाल है।
  • समुद्र के तापमान में सामान्य सीमा 0.5°C से इतना अत्यधिक और ऐतिहासिक उछाल आना ही इसे सुपर अल नीनो बनाता है।

मानव जीवन को कैसे प्रभावित करेगा सुपर अल नीनो?

शिकागो विश्वविद्यालय के क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के एक नए स्टडी के अनुसार, वर्तमान में चल रहे सुपर अल नीनो' के चलते सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच दुनियाभर में करीब 4 लाख 51 हजार अतिरिक्त गर्मी से जुड़ी मौतें हो सकती हैं। इनमें भारत में लगभग 15,800 अतिरिक्त मौतें होने की संभावना है।

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के अनुसार, आने वाले सुपर अल नीनो के कारण गर्मी से जुड़ी 451,000 अतिरिक्त मौतों में से नाइजीरिया में 31,400, इंडोनेशिया में 19,300 और सूडान में 17,600 मौतें होने की आशंका है।

स्टडी में कहा गया है कि अल निनो के कारण वैश्विक भूमि तापमान सामान्य से 1.2 डिग्री सेल्सियस अधिक रहेगा। इससे सामान्य वर्ष की तुलना में 44 प्रतिशत अधिक अत्यधिक गर्म दिन आने की संभावना है। यह स्थिति जलवायु परिवर्तन के कारण 20 साल बाद आने वाले तापमान जैसी होगी।

सुपर अल नीनो नहीं है आधिकारिक नाम

ज्ञात हो कि विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) आधिकारिक रूप से 'सुपर' शब्द का प्रयोग नहीं करता है, लेकिन उसने चेतावनी दी है कि बन रहा अल नीनो और तीव्र होकर एक 'अत्यंत शक्तिशाली' रूप ले लेगा। इसका दुनिया भर में तापमान और बारिश के पैटर्न पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा।

2024 में मचाई थी तबाही

2023-2024 में आए पिछले मजबूत अल नीनो और जलवायु परिवर्तन के कारण 2024 अब तक का सबसे गर्म साल बन गया। उस साल, बोलीविया और वेनेज़ुएला में भयानक आग लगी, नेपाल, सूडान और स्पेन में जबरदस्त बाढ़ आई, और मैक्सिको और सऊदी अरब में हीटवेव (लू) से हजारों लोगों की मौत हो गई।

क्या अल नीनो का संबंध जलवायु परिवर्तन से है?

बता दें कि अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु पैटर्न है और यह जलवायु परिवर्तन के कारण नहीं होता है। हालांकि, ग्लोबल वार्मिंग अल नीनो को और ज्यादा तीव्र बना सकती है। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के चलते औद्योगिक क्रांति से पहले के समय की तुलना में पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.4°C बढ़ गया है।

तापमान का यह बढ़ा हुआ आधार स्तर अल नीनो के प्रभावों को और तेज कर देता है, जिससे तापमान में भारी वृद्धि, सूखा, बारिश और उसके परिणामस्वरूप जंगल की आग, बाढ़ और फसल की बर्बादी जैसी आपदाएं होती हैं।

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अल नीनो और ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ती चुनौतियां

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस साल अल नीनो के कारण होने वाली तबाही वास्तव में उन चरम मौसमी परिस्थितियों की एक झलक है, जो आने वाले दशकों में मानव निर्मित ग्लोबल वार्मिंग के चलते बिना अल नीनो के भी आम हो जाएंगी।

अल नीनो और जलवायु परिवर्तन के इस घातक संयोजन को देखते हुए WMO ने चेतावनी दी है कि साल 2027 अब तक का सबसे गर्म साल साबित हो सकता है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर बढ़ते इस खतरे से निपटने के लिए समय रहते ठोस कदम उठाना बेहद जरूरी है।

चावल उत्पादन में गिरावट

अल नीनो के कारण साल 2027 में दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक देश भारत में इस साल चावल की पैदावार में ऐतिहासिक गिरावट आने की संभावना है। चावल निर्यातकों के अनुसार, अल नीनो से होने वाले सूखे के कारण यह वर्ष 2009-2010 के बाद उत्पादन में आने वाली सबसे बड़ी गिरावट हो सकती है।

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भुखमरी की चपेट में आ सकते 5 करोड़ लोग

संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (WFP) के अनुमानों के अनुसार, 2027 के अंत तक लगभग 5 करोड़ लोग गंभीर भुखमरी की चपेट में आ सकते हैं। इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में दक्षिणी अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका शामिल हैं।