नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। बीबीसी की की हिंदी सर्विस आठ दशक बाद अब बंद होने जा रही है। 11 मई 1940 को शुरू हुई इस सबसे लोकप्रिय सर्विस का अंतिम प्रसारण 31 जनवरी 2020 को शाम  7:30 बजे होगा।इसके तहत प्रसारित होने वाले कार्यक्रम नमस्कार भारत' का आखिरी प्रसारण 27 दिसंबर को हुआ था। अब इस सेवा के तहत केवल ‘दिन भर' कार्यक्रम बचा है जिसका प्रसारण आखिरी बार 31 जनवरी को किया जाना है।

बन जाएगी इतिहास का हिस्‍सा

इसके बाद बीबीसी हिंदी सेवा का नाम हमेशा के लिए इतिहास के पन्‍नों में दर्ज हो जाएगा। साथ ही इतिहास में दर्ज हो जाएंगे इससे जुड़े किस्‍से और कहानियां। भारत के लोगों के लिए खासतौर पर शुरू की गई ये सर्विस कभी लोगों के दिलों पर राज करती थी। मोबाइल का जमाना नहीं था और लोग विविध भारती समेत बीबीसी हिंदी की आवाज सुनकर अपने दिन का आगाज करते थे। बीबीसी हिंदी ने ही 1984 में सबसे पहले तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्‍या कर देने की खबर का प्रसारण किया था। उस वक्‍त बीबीसी के करीब 3 करोड़ श्रोता हुआ करते थे।

मोबाइल ने कम कर दी श्रोताओं की संख्‍या 

समय के साथ बदलती तकनीक और नई जनरेशन के हाथों में आए मोबाइल ने इस पुराने साथी को कहीं गायब कर दिया। समय के साथ इसके श्रोताओं में जबरदस्‍त गिरावट आई और अब ये एक करोड़ से भी कम रह गई है।  इसको ही देखते देखते हुए बीबीसी ने हिंदी में शॉर्टवेब रेडियो प्रसारण बंद करने का फैसला एक दशक पहले ही कर लिया था।  इसको बंद करने की कवायद 1 अप्रैल 2011 को ही शुरू हो गई थी। एक दशक के दौरान इससे जुड़े कई कार्यक्रमों का प्रसारण बंद किया गया। अब केवल नमस्‍कार भारत के नाम से प्रसारित होने वाला कार्यक्रम बचा है जो 31 जनवरी को आखिरी बार प्रसारित किया जाएगा। हालांकि डिजिटल सेवा में यह सेवा आगे भी जारी रहेगी। इस माध्‍यम के जरिए ये सेवा ‘विवेचना’ और ‘दुनिया जहां’ जैसे कार्यक्रम का प्रसारण जारी रखेगी।

बीबीसी में अनाउंसर थे बलराज साहनी और उनकी वाइफ 

इससे जुड़ी कई सारी बातें ऐसी हैं जिन्‍हें हममें से कई लोग नहीं जानते हैं। आपको हैरत होगी कि ब्‍लैक एंड व्‍हाइट दौर की फिल्‍मों के मशहूर अभिनेता बलराज साहनी फिल्‍मों में आने से पहले इसके ही बीबीसी हिंदी सेवा में ही अनांउसर थे। इतना ही नहीं उनकी पत्‍नी दमयंती साहनी भी इसी सेवा में उनके साथ ही अनांउसर थीं।इनके अलावा देश के पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल भी राजनीति में आने से पहले इसके लिए ही पत्रकारिता करते थे। ये केवल कुछ ही नाम नहीं हैं जो इस सेवा से जुड़े थे और बाद में उन्‍होंने पूरी दुनिया में नाम कमाया, बल्कि इस फहरिस्‍त में कई दूसरे नाम भी जुड़े हुए हैं।  

बापू के आशीर्वाद के बाद साहनी ने ज्‍वाइन की थी बीबीसी

बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ होंगे की आजादी के लड़ाई के दौरान बलराज साहनी भी महात्‍मा गांधी के पदचिंन्‍हों पर उनके साथ चले थे। इसके अलावा उनके ही दिए आशीर्वाद के बाद 1939 में वह लंदन में बीबीसी से जुड़े थे। वहां पर चार वर्ष गुजारने के बाद वह स्‍वदेश वापस आए थे। रावलपिंडी (वर्तमान में पाकिस्‍तान में शामिल)  में जन्‍में बलराज साहनी एक साधन संपन्‍न परिवार से ताल्‍लुक रखते थे। बेहद कम लोग इस बात को जानते होंगे कि सिल्‍वर स्‍क्रीन का हिस्‍सा बनने से पहले तक उनका नाम युधिष्ठिर साहनी हुआ करता था। इंग्लिश लिटरेचर में मास्‍टर डिग्री हासिल करने के बाद उन्‍होंने हिंदी में भी डिग्री हासिल की थी। इसके बाद वह शांतिनिकेतन से भी जुड़े रहे थे। 1946 में अपनी पहली फिल्‍म इंसाफ में आने से पहले तक साहनी बीबीसी के सबसे खास अनांउसर हुआ करते थे। 

पाकिस्‍तान रेडियो के महानिदेशक भी थे शामिल 

बेहद कम लोग इस बात से भी वाकिफ होंगे कि पाकिस्‍तान रेडियो के पहले महानिदेशक भी बीबीसी की हिंदुस्‍तानी सेवा से ताल्‍लुक रखते थे। इनका नाम जुल्फिकार अली बुखारी था। वह इस सेवा के पहले संचालक भी थे। 1945 तक वह इस पद पर रहे और देश का बंटवारा होने के बाद उन्‍होंने पाकिस्‍तान की राह पकड़ ली थी। बुखारी की कोशिशों के चलते ही 1943 तक बीबीसी ने हिंदुस्‍तानी सेवा के अंतर्गत कई कार्यक्रम शुरू हो पाए थे। उन्‍‍‍‍‍‍‍‍होंने लगातार इसका वक्‍त और अधिक बढ़ाने पर काम किया और काफी हद तक सफल भी रहे। 

सेवा को शुरू करने का मकसद

आपको बता दें कि बीबीसी हिंदी सेवा शुरू करने के पीछे ब्रिटेन का मकसद महज दूसरे विश्‍वयुद्ध से जुड़ी खबरों का प्रसारण करना था। इस लड़ाई में हजारों भारतीयों ने योगदान दिया था। 1940 में जब ये सेवा शुरू की गई थी तब केवल दस मिनट का एक समाचार बुलेटिन ही प्रसारित किया जाता था। करीब एक वर्ष बाद इसका समय बढ़ाकर आधे घंटे का किया गया था। ये सेवा भारतीय लोगों दिल और दिमाग पर इस कदर हावी थी कि हर रोज काफी संख्‍या खत आया करते थे। इस सेवा की खास बात ये थी कि इसमें हर खत का जवाब दिया जाता था। यही वजह थी कि लोग इसको खुद से जुड़ा हुआ महसूस करते थे। शहरों से लेकर गांव तक या यूं कहें कि भारत की सरहद के बाहर जो लोग रहते थे उन सभी को ये अपनी मिट्टी से जुड़े होने का अहसास कराती थी। इसके तहत कुछ लोकप्रिय कार्यक्रम भी थे जिनमें विश्व समाचार, दिन भर, ' भारतनामा ' आज के दिन, आपका पत्र मिला ' हमसे पूछिए और खेल खिलाड़ी ' विवेचना शामिल है। 

 

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