राज्य ब्यूरो, मुंबई। चैत्र नवरात्र के पहले दिन शनि शिंगणापुर मंदिर में लगभग चार सौ साल पुरानी परंपरा टूट गई। शुक्रवार को पुरुषों से साथ-साथ महिलाओं ने भी शनि मंदिर के चबूतरे पर जाकर शनिदेव को तेल चढ़ाया। महिलाओं का एक समूह पिछले कुछ माह से यह अधिकार पाने के लिए संघर्ष कर रहा था।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन महाराष्ट्र में गुड़ी पाड़वा का उत्सव मनाया जाता है। भारतीय नव वर्ष के पहले दिन शनि शिंगणापुर मंदिर में पुरुषों द्वारा शनि प्रतिमा का जलाभिषेक करने की परंपरा रही है। लेकिन विवादों के चलते पिछले कुछ माह से चबूतरे पर पुरुषों के भी जाने की मनाही कर दी गई थी। शुक्रवार सुबह करीब 250 पुरुष श्रद्धालुओं का समूह शनि चबूतरे पर चढ़कर शनिदेव की मूर्ति का जलाभिषेक करने में सफल हो गया।

इसके बाद आनन-फानन में बुलाई गई शनि मंदिर ट्रस्ट की बैठक में करीब 400 साल पुरानी परंपरा को तोड़ते का फैसला किया गया। ट्रस्ट ने पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी शनि प्रतिमा (जिसे मंदिर का गर्भगृह कहा जा सकता है) तक जाने की अनुमति दे दी।

ट्रस्ट ने यह फैसला स्थानीय ग्रामवासियों से चर्चा के बाद किया। इसकी घोषणा ट्रस्ट की महिला सदस्य शालिनी लांडे द्वारा की गई। ट्रस्ट के इस फैसले के बाद चबूतरे पर जाने के लिए संघर्ष करती आ रही भूमाता ब्रिगेड की अध्यक्ष तृप्ति देसाई ने भी शनिदेव की पूजा-अर्चना की। पिछले सप्ताह हाई कोर्ट का फैसला आने के बावजूद स्थानीय लोगों ने देसाई को मंदिर में प्रवेश करने से रोक दिया था।

जानिए, किसने-क्या कहा

21वीं सदी में यदि हमें प्रगति के रास्ते पर बढऩा है, तो लोगों के मन से लिंग और जातिगत भेदभाव को पूरी तरह खत्म करना होगा।

-देवेंद्र फड़नवीस, मुख्यमंत्री-महाराष्ट्र
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लिंगभेद के खिलाफ यह हमारे संघर्ष की जीत है। हमें उम्मीद है कि त्र्यंबकेश्वर मंदिर में भी महिलाओं को प्रवेश का अधिकार मिलेगा।
-तृप्ति देसाई, अध्यक्ष-भूमाता ब्रिगेड


ऐसे बढ़ा विवाद
-इस विवाद की शुरुआत 29 नवंबर, 2015 को एक महिला के शनि चबूतरे पर जबरन चढ़ जाने से हुई थी।
-उसके बाद मंदिर के पुजारियों ने शनि प्रतिमा का अभिषेक कर उसकी शुद्धि की थी।
-इससे नाराज भूमाता ब्रिगेड ने शनि चबूतरे तक महिलाओं को प्रवेश की इजाजत के लिए आंदोलन शुरू कर दिया।
-भूमाता ब्रिगेड की अध्यक्ष तृप्ति देसाई ने 26 जनवरी, 2016 को शनि मंदिर में जबरन प्रवेश करना चाहा, लेकिन उन्हें रोक दिया गया।
-28 जनवरी, 2016 को बांबे हाई कोर्ट की औरंगाबाद पीठ में एक याचिका दायर कर महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति मांगी गई थी।
-एक अप्रैल, 2016 को हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि जाति और लिंग के आधार पर मंदिर में प्रवेश रोकने वाले पर वह कानूनी कार्रवाई करे।

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Posted By: Lalit Rai

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