दिल्ली की धूल के खिलाफ युद्ध... शहर के प्रदूषण हॉटस्पॉट क्यों बने हुए हैं एक चुनौती
दिल्ली में धूल प्रदूषण से निपटने के लिए अपनाए जा रहे उपाय, जैसे पानी का छिड़काव और एंटी-स्मॉग गन, इसके ...और पढ़ें

दिल्ली में धूल की समस्या से निजात पाने का स्ट्रगल।
HighLights
दिल्ली में धूल प्रदूषण के स्रोत बने हुए हैं चुनौती।
एंटी-स्मॉग गन और पानी का छिड़काव अपर्याप्त उपाय।
निर्माण नियमों का उल्लंघन और खराब सड़कों की समस्या।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सड़क की धूल, निर्माण कार्यों से जुड़े नियमों का उल्लंघन, मशीनों से सड़क की सफाई और यह सवाल कि क्या दिल्ली की नागरिक एजेंसियां प्रदूषण के स्रोतों पर काम कर रही हैं या फिर प्रदूषण दिखने के बाद बस उसे दबाने की कोशिश कर रही हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, पानी का छिड़काव, एंटी-स्मॉग गन, मशीनों से सड़कों की सफाई और बड़े पैमाने पर सफाई अभियान। दिल्ली में वायु प्रदूषण के खिलाफ हर साल होने वाली लड़ाई के तहत सड़कों पर कुछ जाने-पहचाने उपाय अपनाए जाते हैं।
क्या है चुनौती?
फिर भी इन उपायों के बावजूद सड़कों के किनारे धूल जमा होती रहती है, निर्माण सामग्री एक समस्या बनी हुई है और नियमों को लागू करने को लेकर नागरिक एजेंसियों पर सवाल उठ रहे हैं। चुनौती सिर्फ सड़कों से धूल हटाने की नहीं है, बल्कि इसे हवा में उड़ने से रोकने की है। हाल की रिपोर्टों से पता चलता है कि दिल्ली में धूल को नियंत्रित करने के प्रयासों और जमीनी स्तर पर बनी हुई समस्याओं के बीच एक बड़ा अंतर है।
हालांकि सरकारी एजेंसियां अपने उपकरणों का दायरा बढ़ा रही हैं और प्रदूषण के पहचाने गए हॉटस्पॉट (प्रदूषण के मुख्य केंद्र) पर ध्यान दे रही हैं, लेकिन अध्ययनों और निरीक्षणों से पता चलता है कि खराब सड़कें, मशीनों से अपर्याप्त सफाई, बिना ढका निर्माण सामग्री और अवैध रूप से कचरा फेंकना अभी भी प्रदूषण के लगातार स्रोत बने हुए हैं।
मुख्य सवाल यह है कि क्या राजधानी धूल को केवल ऊपर-ऊपर से दबाने के बजाय धूल पैदा करने वाले स्रोतों को स्थायी रूप से नियंत्रित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
धूल कहां से आती है?
दिल्ली के प्रदूषण हॉटस्पॉट पर किसी एक स्रोत का ही असर हो ऐसा जरूरी नहीं है। सड़क की धूल, निर्माण कार्य, वाहनों की आवाजाही, कचरा फेंकना और खुली मिट्टी ये सब मिलकर स्थानीय हवा की गुणवत्ता को और खराब कर सकते हैं।
पिछले हॉटस्पॉट असेसमेंट में पहचाने गए इलाकों में आनंद विहार, बवाना, मुंडका, वजीरपुर, रोहिणी, आरके पुरम, ओखला, जहांगीरपुरी, पंजाबी बाग, अशोक विहार और द्वारका शामिल हैं। अक्टूबर 2026 में पीडब्ल्यूडी ने 47 प्रदूषण हॉटस्पॉट के 3 किमी. के दायरे में धूल के स्रोतों की पहचान करने और उनसे निपटने के लिए एक रणनीति पेश की।
इस दृष्टिकोण में यह माना गया है कि किसी खास सड़क की सफाई करना या किसी एक जगह पर धूल कम करने वाले उपकरण लगाना काफी नहीं होगा अगर आस-पास की खुली मिट्टी, बिना ढका निर्माण सामग्री या खुदाई के काम से हवा में धूल के कण लगातार मिलते रहें।
कौन-कौन से हैं हॉटस्पॉट
चिह्नित किए गए हॉटस्पॉट में आनंद विहार, आईटीओ, डीटीयू, द्वारका, बवाना, पूसा, आईजीआई एयरपोर्ट, आईआईटी दिल्ली, जेएनयू के आस-पास के इलाके, बुराड़ी क्रॉसिंग, नॉर्थ कैंपस और अलीपुर शामिल हैं।
विभाग ने धूल को नियंत्रित करने के उपायों के तहत लगभग 200 एंटी-स्मॉग गन लगाने की भी योजना बनाई है। यह व्यापक दृष्टिकोण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदूषण किसी तय हॉटस्पॉट की सीमाओं तक ही सीमित नहीं रहता। आस-पास के इलाकों में निर्माण कार्य, ट्रैफिक या खुली सतहों से उड़ने वाली धूल उन सड़कों और रिहायशी इलाकों तक पहुंच सकती है, जहां धूल को रोकने के उपाय पहले से ही लागू हैं।
इस चुनौती का पैमाना कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (CAQM) की हॉटस्पॉट से जुड़ी कवायद में भी दिखाई देता है। सितंबर 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, पहले किए गए आकलन में 13 हॉटस्पॉट में प्रदूषण के 65 प्रमुख स्रोत पाए गए थे।
16 समस्याओं का किया गया समाधान
इनमें से 16 समस्याओं का समाधान कर लिया गया, जबकि 43 अभी भी निगरानी में हैं और 6 पर काम होना बाकी है। अधिकारियों ने प्रदूषण के 4,555 छोटे स्रोत भी पहचाने थे, जिनमें सड़क की धूल, कचरा और निर्माण-कार्य का मलबा फेंकना, गड्ढे, कच्ची सड़कें, ट्रैफिक जाम और खुले में कचरा जलाना शामिल हैं।
समीक्षा के समय तक, इन छोटी समस्याओं में से लगभग आधी का समाधान किया जा चुका था। ये आंकड़े बताते हैं कि यह काम कितना बड़ा है। प्रदूषण के स्रोतों की पहचान करना तो बस पहला कदम है। यह रणनीति कितनी कारगर होगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि समस्याओं को कितनी जल्दी सुलझाया जाता है और क्या ये समाधान लंबे समय तक टिके रहते हैं।
मशीनों की तैनाती और उनके कवरेज के बीच का अंतर
सड़क पर जमा धूल को हवा में उड़ने से रोकने के लिए मशीनों से सड़क की सफाई करना सबसे प्रभावी तरीकों में से एक है। हालांकि, इन मशीनों का कवरेज अभी भी एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है।
23 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट में CAQM के आकलन का हवाला देते हुए बताया गया कि दिल्ली की बड़ी और मध्यम आकार की सड़कों पर मैकेनिकल रोड स्वीपर (सड़क साफ करने वाली मशीनें) हर दूसरे दिन केवल 35-40% हिस्से की ही सफाई कर पा रही थीं, जबकि पूरे सड़क नेटवर्क को कवर करने का नियम है।
दिल्ली में लगभग 100 मशीनें थीं, जबकि जरूरत 172 मशीनों की थी। आकलन में यह भी पाया गया कि एक मशीन दिन भर में 30 किमी तक की सफाई कर पाती थी, जबकि लक्ष्य 40 किमी का था। अतिक्रमण या अवैध रूप से खड़ी गाड़ियों के कारण सड़कों पर रुकावटें आना एक और बड़ी चुनौती थी।
इस बीच दिल्ली के सड़क नेटवर्क का लगभग 70% हिस्सा ऐसी सड़कों से बना है जिनकी चौड़ाई 10 मीटर से कम है और इनकी सफाई अभी भी हाथों से की जाती है। यह शहर की धूल-नियंत्रण रणनीति की एक बुनियादी कमजोरी को उजागर करता है। सिर्फ मशीनें तैनात कर देने का मतलब यह नहीं है कि हर उस जगह की ठीक से सफाई हो रही है जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।
कब बना रहता है प्रदूषण का स्रोत
अगर सड़कों के किनारों और मीडियन (सड़क के बीच के हिस्से) पर धूल जमा होती रहती है या सफाई के दौरान हटाई गई धूल-मिट्टी को वहां से हटाया नहीं जाता तो प्रदूषण का स्रोत बना रहता है। यह समस्या 2023 में दिल्ली के तत्कालीन उपराज्यपाल वी.के. सक्सेना द्वारा किए गए एक निरीक्षण के दौरान सामने आई थी।
एक रिपोर्ट में बताया गया था कि लाल किला, राजघाट, आईटीओ, प्रगति पावर प्लांट, आईपी एस्टेट और मिलेनियम पार्क के आस-पास की सड़कों के किनारे बने फुटपाथों पर धूल और मिट्टी की मोटी परतें जमा हो गई थीं। वहां से गुजरने वाले वाहनों की वजह से धूल उड़ रही थी, जबकि यांत्रिक सफाई मशीनें धूल को पानी से दबाने के बजाय उसे और ज्यादा हवा में उड़ा रही थीं।
अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे सड़कों और फुटपाथों की सफाई करवाएं और पावर प्लांट यार्ड तथा बस डिपो में धूल को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाएं।
इसका मतलब साफ है कि सड़क की सफाई कितनी प्रभावी होगी, यह न केवल मशीनों की संख्या पर निर्भर करता है, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करता है कि उन्हें कैसे चलाया जाता है। क्या वे तय किए गए सभी इलाकों को कवर करती हैं और उनके द्वारा इकट्ठा की गई धूल का आगे क्या होता है।
नियमों का पालन सुनिश्चित करना ही असली चुनौती
निर्माण और तोड़फोड़ के काम एक और चुनौती पेश करते हैं क्योंकि खुली मिट्टी, बिना ढकी सामग्री और कचरे का गलत तरीके से भंडारण आसपास के इलाकों में धूल फैला सकती है।
मार्च 2026 की एक रिपोर्ट में कहा गया कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने दिल्ली में धूल कम करने के उपायों में गंभीर कमियों की ओर इशारा किया है और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी है। अधिकारियों के बीच हुई चर्चा में सड़कों पर धूल, खराब कचरा प्रबंधन और शिकायतों के समाधान में देरी जैसे मुद्दों पर बात हुई।
दिल्ली नगर निगम ने कहा कि वह सड़कों के किनारे और खाली प्लॉटों से निर्माण और तोड़फोड़ के कचरे को युद्ध स्तर पर हटा रहा है। हालांकि, जिला अधिकारियों ने आवासीय क्षेत्रों में मशीनीकृत सफाई की कमी, तय कॉम्पैक्टर ट्रांसफर स्टेशनों पर कैप्सूल की कमी और तंग गलियों में भारी मशीनरी तैनात करने में आने वाली कठिनाइयों का हवाला दिया।
ये मुश्किलें नई नहीं हैं। नवंबर 2025 की एक बैठक के दौरान, एमसीडी पार्षदों ने ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) के चरण-III के तहत पाबंदियों के बावजूद हो रहे अनधिकृत निर्माण, निर्माण कचरे को अवैध रूप से फेंकने और पत्तियां जलाने के मुद्दों को उठाया।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पानी का छिड़काव और मशीनीकृत सफाई केवल चुनिंदा वार्डों में ही की जा रही है, जबकि अन्य इलाकों को नजरअंदाज किया जा रहा है। समिति के अध्यक्ष ने माना कि पूरे शहर में गड्ढे दिखाई दे रहे हैं और सफाई के बाद भी जमा हुई धूल को ठीक से नहीं हटाया जा रहा है।
नियमों का पालन करने में निरंतरता की कमी
ये चिंताएं नियमों के पालन में निरंतरता को लेकर सवाल खड़े करती हैं। निर्माण सामग्री को ढकने या धूल को नियंत्रित करने के नियम तब तक स्थायी परिणाम नहीं दे सकते, जब तक कि नियमों का उल्लंघन जारी रहे या निरीक्षण के बावजूद नियमों का पालन सुनिश्चित न हो पाए।
अक्टूबर 2026 में एमसीडी ने सभी 125 निर्माण और विध्वंस कचरा स्थलों पर 360-डिग्री कैमरे लगाकर निगरानी बढ़ा दी, जिनका लाइव फीड दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति को भेजा जाने लगा।
इसके अलावा कचरे को ढकने या गीला करने, धूल रोकने के लिए बैरियर लगाने और निर्माण कचरा ले जाने वाले वाहनों को पूरी तरह से ढककर रखने के लिए नए नियम लागू किए गए। धूल प्रदूषण, कचरा अवैध रूप से फेंकने और बायोमास (पत्तियां आदि) जलाने के मामलों पर कार्रवाई करने के लिए संयुक्त प्रवर्तन टीमों को तैनात किया गया।
एंटी-स्मॉग गन और स्प्रिंकलर
दिल्ली में धूल को दबाने के लिए पानी के इस्तेमाल का दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है। 21 अक्टूबर, 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, एमसीडी ने सड़कों, सार्वजनिक सुविधाओं और ऊंची इमारतों के पास 167 वॉटर स्प्रिंकलर और 60 एंटी-स्मॉग गन तैनात की थीं।
इसके अलावा, सभी 12 जोनों में धूल से सबसे ज्यादा प्रभावित सड़कों की गहन सफाई (डीप क्लीनिंग) का काम भी शुरू किया गया था। हालांकि, सिर्फ इन उपकरणों के होने भर से प्रदूषण में लगातार कमी आ जाएगी, ऐसा जरूरी नहीं है।
एंटी-स्मॉग गन पर एक रिपोर्ट में पर्यावरण कार्यकर्ता भवरीन मल्होत्रा ने कहा कि ये उपकरण निर्माण स्थलों के आसपास दिखने वाली धूल को तो दबा सकते हैं, लेकिन दिल्ली की हवा की गुणवत्ता पर इनका असर बहुत सीमित है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये सर्दियों में बढ़ने वाले सूक्ष्म कणों (पार्टिकुलेट मैटर) या गैसीय प्रदूषकों को नियंत्रित नहीं कर सकते। उन्होंने यह भी कहा कि इन एंटी-स्मॉग गन को पूरे साल चलाया जाना चाहिए।
यह फर्क समझना जरूरी है
स्प्रिंकलर और एंटी-स्मॉग गन हवा में उड़ने वाली धूल को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं, लेकिन ये खराब सड़कों की मरम्मत, जमा हुई गाद (मिट्टी-कीचड़) को हटाने, निर्माण सामग्री को ढकने या अवैध रूप से कचरा फेंकने को रोकने का विकल्प नहीं हो सकते।
धूल को उसके स्रोत पर ही रोकने का क्या मतलब होगा?
सबूत एक अधिक व्यापक दृष्टिकोण की ओर इशारा करते हैं। पहला, सड़कों की देखरेख करने वाली एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि मैकेनिकल स्वीपर (सफाई मशीनें) जरूरी जगहों, खासकर प्रदूषण की दृष्टि से संवेदनशील इलाकों की सफाई करें और साथ ही संकरी सड़कों तक भी उनकी पहुंच हो।
दूसरा, गड्ढों, कच्ची सतहों और सड़कों के खराब किनारों पर ध्यान देने की जरूरत है, ताकि वहां बार-बार धूल जमा न हो।
तीसरा, निर्माण और तोड़फोड़ से जुड़े नियमों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। कचरे को सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह हटाने के बजाय उसे पूरी तरह से वहां से हटाना जरूरी है।
दिल्ली की प्रस्तावित रणनीति, जिसमें प्रदूषण के हॉटस्पॉट के 3 किलोमीटर के दायरे में धूल के स्रोतों की जांच करने की बात कही गई है, इस समस्या को केवल एक सड़क तक सीमित न रखकर व्यापक स्तर पर सुलझाने में मदद कर सकती है।
इसके अलावा, कचरा डालने वाली जगहों पर कैमरे लगाने से जवाबदेही तय हो सकती है, बशर्ते नियमों के उल्लंघन का पता चलने पर तुरंत कार्रवाई की जाए। शहर को केवल इस बात पर निर्भर नहीं रहना चाहिए कि कितने स्प्रिंकलर, एंटी-स्मॉग गन या सफाई मशीनें लगाई गई हैं, बल्कि यह देखना चाहिए कि इनके क्या नतीजे निकले हैं।
सिर्फ धूल दबाने के उपाय हवा को साफ क्यों नहीं कर सकते?
दिल्ली धूल को नियंत्रित करने के अपने प्रयासों का दायरा बढ़ा रही है, लेकिन रिपोर्टों से पता चलता है कि सड़कों की ठीक से सफाई न होना, सड़कों की खराब हालत, निर्माण कार्यों में नियमों का उल्लंघन और कचरा प्रबंधन में कमियां इन प्रयासों को नाकाम कर रही हैं।
समस्या यह नहीं है कि पानी का छिड़काव या एंटी-स्मॉग गन का कोई महत्व नहीं है। बल्कि बात यह है कि ये उपाय अकेले लंबे समय तक चलने वाले नतीजे नहीं दे सकते। असली परीक्षा यह है कि क्या दिल्ली धूल को जमा होने और हवा में उड़ने से रोक सकती है, बजाय इसके कि धूल दिखने के बाद उसे बार-बार दबाने की कोशिश की जाए।
जब तक सड़कों के रखरखाव, कचरा हटाने और नियमों के पालन को लेकर निरंतरता नहीं आती, तब तक शहर के सामने यही खतरा बना रहेगा कि वह उस धूल के पीछे भागता रहे, जिसे उसने अभी तक उसके स्रोत पर ही खत्म नहीं किया है।
