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प्रदर्शनकारियों को पुलिस से भिड़ने का मौका न देना ही सबसे बेहतर उपाय: सच्चिदानंद श्रीवास्तव

By Rumani GhoshEdited By: Deepak Gupta
Published: Sat, 17 Oct 2026 09:04 PM (IST)

पूर्व दिल्ली पुलिस कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव ने दिल्ली में धरना-प्रदर्शनों को नियंत्रित करने की चुनौतियों और रणनीतियों पर अपने विचार साझा किए हैं।

दिल्ली पुलिस के पूर्व कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव।

दिल्ली पुलिस के पूर्व कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव।

HighLights

  1. भीड़ का आकलन, नया मुद्दा न देना, उत्तेजना कम करना।

  2. सख्त नियंत्रण और नरम रवैया प्रदर्शन संभालने का सटीक तरीका।

  3. पुलिस सोशल मीडिया पर अपनी सकारात्मक उपस्थिति दर्ज कराए।

रुमनी घोष। राजधानी में लगातार हो रहे धरना-प्रदर्शन से बन रही अराजक स्थिति और इससे आम लोगों को हो रहीपरेशानियों से निजात दिलाना इन दिनों दिल्ली पुलिस के सामने बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जंतर- मंतर में हुए आंदोलन के दौरान भीड़ के आकलन और उसके रवैये को जानने में हुई चूक से जेन जी आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच विवाद की स्थिति उत्पन्न हुई थी और इससे बचा जाना चाहिए था। लोकतांत्रिक देश होने के नाते भारत में हर नागरिक को अपनी बात रखने के लिए (नियमों के तहत) धरना-प्रदर्शन का अधिकार है, वहीं इन परिस्थितियों में आम नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस की है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर पुलिस की रणनीति क्या हो?

समान नागरिक संहिता (सीएए) को लेकर वर्ष 2020 में दिल्ली में भड़की हिंसा और किसान आंदोलन जैसे देशभर के कई बड़े धरना-प्रदर्शनों को रोकने में भूमिका निभा चुके दिल्ली पुलिस के पूर्व कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव कहते हैं हर प्रदर्शन या धरना किसी न किसी मुद्दे को लेकर होता है। इससे सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन मुद्दा उठाने और उसका हल निकालने में पुलिस की कोई भूमिका नहीं होती है। उसकी जिम्मेदारी इसके बाद शुरू होती है। आंदोलन का चरित्र पहचानकर तीन कदम उठाना चाहिए... भीड़ का आकलन, नया मुद्दा न देना और जल्दीबाजी न दिखाकर भीड़ को थामे रखना ताकि उत्तेजना कम होती जाए । इन तीन सूत्रों से बड़े से बड़े आंदोलन को नियंत्रित किया जा सकता है। वह कहते हैं दिल्ली में अभी जो धरना-प्रदर्शन हो रहे हैं, इनमें नियम तोड़कर प्रतिबंधित इलाकों में ही प्रदर्शन की कोशिश से स्पष्ट है कि आंदोलनकारी पुलिस से भिड़कर मामले को तूल देना चाहते हैं, उन्हें वह मौका ही मत दीजिए।

आंदोलन अपने आप ही धीमा पड़ता चला जाएगा। मूलत: उप्र के रहने वाले आइपीएस श्रीवास्तव लंबे समय तक सीआरपीएफ में पदस्थ रहे। जम्मू-कश्मीर में हिजबुल कमांडर और कुख्यात आतंकी बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद महीनों चले प्रदर्शनों को सेना और स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर नियंत्रित करने में उनकी अहम भूमिका रही। आईआईटी खड़गपुर से बीटेक के बाद उन्होंने 1985 में आइपीएस ज्वाइन किया। दिल्ली, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम जैसे पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू-कश्मीर में लंबे समय तक रहे। जब सीआरपीएफ में स्पेशल डायरेक्टर जनरल पद पर थे, उस दौरान दिल्ली हिंसा भड़की और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत दौरे पर थे। उस समय हिंसा को शांत करने की जिम्मेदारी सौंपते हुए उन्हें सीआरपीएफ से वापस बुलाकर दिल्ली पुलिस की कमान सौंपी गई थी। दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष ने उनसे विपक्ष और काकरोच जनता पार्टी द्वारा चुनाव आयोग के खिलाफ किए जा रहे प्रदर्शनों के चरित्र, इन्हें नियंत्रित करने के तरीकों पर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

राजनीतिक दलों और सीजेपी द्वारा किए जा रहे प्रदर्शनों का चरित्र कैसा है?

- प्रदर्शनकारी अपने मुद्दे का हल निकालने के बजाय विवाद की स्थिति पैदा करना चाहते हैं। पुलिस से भिड़ना चाहते हैं।

प्रदर्शनकारी पुलिस से विवाद करना चाहते हैं, इसका आधार क्या है?

- देखिए, हर आंदोलन के पीछे एक मुद्दा होता है। किसी भी प्रदर्शन को नियंत्रित करने की प्लानिंग करते वक्त हमें सबसे पहले इसका चरित्र पता होना चाहिए। वर्तमान में दिल्ली में राजनीतिक दलों और सीजेपी द्वारा
चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन किया जा रहा है। यदि चुनाव आयोग के खिलाफ कार्रवाई करवाना ही
उद्देश्य है तो बहुत से कानूनी विकल्प मौजूद हैं, लेकिन प्रदर्शनकारी लगातार प्रतिबंधित क्षेत्रों में घुसकर
प्रदर्शन करना चाह रहे हैं। यानी वे पुलिस के साथ भिड़ना चाह रहे हैं। ...ऐसी स्थिति पैदा करना चाह रहे हैं,
जिससे विवाद बढ़े और प्रदर्शन को ईंधन मिलता रहे। जंतर-मंतर के प्रदर्शन के दौरान भी यही हुआ था।
पुलिस से आमने-सामने की झड़प के बाद बात बिगड़ी और दबाव बनता चला गया।

अपने अनुभव के आधार पर भीड़ को नियंत्रित करने के सुझाव?

भीड़ का आकलन, नया मुद्दा न देना और जल्दीबाजी न दिखाकर भीड़ को थामे रखना ताकि उत्तेजना कम
होती जाए...ये प्रदर्शन रोकने के तीन मूल मंत्र हैं। सख्त नियंत्रण और नरम रवैया प्रदर्शन को संभालने का सबसे सटीक तरीका है।

दिल्ली हिंसा और किसान आंदोलन के दौरान आपने क्या रणनीति अपनाई थी?

- दिल्ली हिंसा के दौरान जब मुझे चार्ज दिया गया, तो विवाद शाहीनबाग से होते हुए सीलमपुर तक फैल चुका था। 53 लोगों की मौत हो चुकी थी। उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के दौरे पर थे। भीड़ पर काबू पाने के लिए मैंने अपने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि कोई भी गलियों से बाहर नहीं निकलना चाहिए। उन्हें इकट्ठा नहीं होने दिया और पुलिस कर्मियों का मनोबल बढ़ाने के लिए खुद उनके साथ मुख्य मार्ग पर मौजूद रहा। इसका नतीजा यह निकला कि भीड़ छोटे छोटे टुकड़ों में रही और पुलिस को उन्हें संभालने में ज़्यादा दिक्कत नहीं हुई। किसी भी स्थान पर या मुख्य सड़क पर पहले की तरह ड़ इकट्ठा नहीं हो पाने से प्रदर्शनकारियों के हौसले कमजोर होते गए।

आप सख्त नियंत्रण और नरम रवैये की बात करते हैं। क्या अपने अनुभव के आधार पर कुछ घटनाओं का उल्लेख करेंगे?

- वर्ष 1992 में विवादित ढांचा विध्वंस के बाद यह अनुमानित था कि दिल्ली के जामा मस्जिद क्षेत्र में तनाव की स्थिति पैदा होगी। उस समय मैं एडिशनल डीसीपी सेंट्रल था और जामा मस्जिद का इलाका, मेरे ही क्षेत्र में आता था। हमने बेहतर प्लानिंग कर रखी थी। आमतौर पर विरोध प्रदर्शन के दौरान इन इलाकों में छतों से पत्थरबाजी की घटनाएं होने का रिकार्ड था। इसको देखते हुए हमने छतों पर पुलिस बल तैनात कर दिया, ताकि वहां से पथराव न हो सके। लोगों को घरों में रहने की समझाइश दी और सड़कों पर पुलिस बल तैनात कर दिया। छत और सड़क पर पुलिस का कब्जा होने से पूरा क्षेत्र हमारे नियंत्रण में आ गया। इससे कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सारे कदम उठाए गए और उसमें काफी सफलता मिली। कोई जानमाल का नुकसान नहीं हुआ। ऐसी घटनाओं के दौरान 'नैरेटिव' (धारणा) का भी ध्यान रखना चाहिए ...। यदि 6 दिसंबर को इस इलाके में कर्फ्यू लगा दिया जाता तो यह हेडलाइन बनती और तनाव बढ़ता। इस वजह से निर्णय लिया गया कि 6 दिसंबर को कर्फ्यू नहीं लगाएंगे। पहले दिन स्थिति पर नियंत्रण के बाद दूसरे दिन 7 दिसंबर को कर्फ्यू लगाया। जब स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में आ गई, तो हमने पुलिस का नरम चेहरा प्रस्तुत किया, ताकि आम लोगों के बीच भरोसा बन सके। अलग-अलग विभागों से समन्वय कर कर्फ्यू के दौरान पूरे इलाके में दूध, फल सब्जियां उपलब्ध करवाई। एक-एक घर तक सामान पहुंचाने की व्यवस्था की गई। चार-पांच दिन के भीतर ही मामला शांत हो गया था।

इंटरनेट मीडिया के दौर में पुलिस का सामना जेन जी या युवा पीढ़ी से हो रहा है। क्या पुलिस को अपने
एसओपी में बदलाव नहीं करना चाहिए?

- बिलकुल करना चाहिए। यदि पुलिस के सामने जेन जी है, तो हमारी टीम में भी जेन जी और युवा पीढ़ी है।
हो सकता है कि हमारी पीढ़ी के अफसर इंटरनेट मीडिया से उतने ज्यादा जुड़े हुए न हों, लेकिन 20-22 साल के जवान तो उन्हीं के दौर के हैं। उनकी एक टीम बनानी चाहिए और इंटरनेट मीडिया पर अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज करवानी चाहिए। यदि जेन जी इंटरनेट मीडिया से भीड़ जुटा सकती है, तो पुलिस उसी मीडिया का उपयोग कर लोगों को सचेत कर सकती है, भीड़ जुटने से रोक सकती है। यदि वे पुलिस के खिलाफ नकारात्मक छवि बनाने की कोशिश कर रहे हैं तो उसी मीडिया पर छोटे-छोटे रील बनाकर
दिल्ली पुलिस अपना सकारात्मक पक्ष रख सकती है। बस एक ही बात याद रखना है कि प्रदर्शनकारियों के
साथ आमने-सामने की भिड़ंत कम से कम हो।

विपक्षी दलों व सीजेपी द्वारा सुप्रीम कोर्ट तक जिस तरह से मार्च हुआ, सुरक्षा के लिहाज से यह कितना
अलार्मिंग है?

- इससे पहले इस तरह की घटना मेरे संज्ञान में नहीं है। यह मार्च इस बात का सुबूत है कि प्रदर्शनकारियों के लिए मुद्दा और पुलिस-प्रशासन से विवाद अहम है। वे इसका इस्तेमाल हथियार की तरह करना चाहते हैं। दिल्ली हिंसा, किसान आंदोलन, विवादित ढांचा विध्वंस या फिर जम्मू-कश्मीर में आतंकी बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद लंबे समय तक चली पत्थरबाजी....सभी प्रदर्शन के पीछे कहीं न कहीं यही उद्देश्य था।

अनुच्छेद 19 (1) (बी) हर नागरिक और राजनीतिक दलों को शांतिपूर्ण ढंग से धरना-प्रदर्शन करने व इकट्ठा
होने की अनुमति देता है। उन्हें रोकने के लिए पुलिस द्वारा दर्जनों मेट्रो स्टेशन बंद करना और इंटरनेट सर्विस
रोकना कहां तक सही है?


- बिलकुल सही है...लोकतंत्र में देश के हर नागरिक को अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्रित होने का हक है, लेकिन नियमों के तहत। अगर पुलिस प्रदर्शनकारियों को खुली छूट दे और ज़रूरत के अनुसार, जैसे नजदीक के मेट्रो स्टेशन बंद करना, भड़काऊ प्रदर्शनकारियों पर अंकुश लगाना, प्रदर्शन स्थल पर अत्यधिक भीड़ के आने पर रोकथाम, जैसे अन्य कदम न उठाए तो उमड़ती हुई भीड़ पर क़ाबू करने में अत्यधिक बल प्रयोग की स्थिति बन सकती है जो कि पुलिस की रणनीति के विरुद्ध होगा। यदि दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाकर तीन नए स्थल चिह्नित कर दिए हैं तो प्रदर्शनकारियों को उन स्थानों पर प्रदर्शन करना चाहिए। ऐसा करने से पुलिस उन्हें नहीं रोक सकती है, लेकिन प्रदर्शनकारी लगातार उन स्थलों की ओर कूच कर रहे हैं, जहां आम लोगों की आवाजाही बाधित हो सकती है। उनकी सुरक्षा बाधित हो सकती है। आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी पुलिस का दायित्व है।

यदि भारत का कोई आम नागरिक व परिवार विरोध दर्ज करवाना चाहता है तो क्या जंतर-मंतर या इंडिया
गेट पर बैठ सकता है? क्या इसे नियमों का उल्लंघन माना जाएगा?

- नियम तो सबके लिए अलग-अलग नहीं किए जा सकते हैं। नियम के मुताबिक उन्हें भी चिह्नित स्थल पर ही
प्रदर्शन करना चाहिए।

विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार ने जानबूझकर प्रदर्शनकारियों को शहर से धकेलने के लिए बुराड़ी ग्राउंड को प्रदर्शन स्थल बनाया। आपका क्या कहना है?

- अपनी बात रखने और आंदोलन को गति देने के लिए जेन जी हो या युवा पीढ़ी इंटरनेट मीडिया का बखूबी
उपयोग कर रही है। यही उनकी ताकत है। ऐसे में इससे क्यों फर्क पड़ना चाहिए कि प्रदर्शन स्थल शहर के
भीतर है या बाहर। वे इंटरनेट मीडिया के सहयोग से दुनियाभर में अपनी बात पहुंचा सकते हैं। अगर उनकी
बातों में इतनी ताकत है, तो आम नागरिक उनकी बातों को जरूर सुनेंगे। मीडिया भी उनकी बात दुनिया के
सामने रख सकती है। इससे शहर के बीचों बीच आम लोगों की आवाजाही बाधित नहीं होगी और
प्रदर्शनकारियों की मांग भी सरकार व जनता तक पहुंचा पाएंगे।

किसान आंदोलन के दौरान भी किसानों को शहर की बाहरी सीमा पर ही रोक दिया गया था। क्या यह
प्लानिंग का हिस्सा था?

- मैंने पहले कहा न, कि किसी भी प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए उसके चरित्र को पहचानना जरूरी है। दिल्ली हिंसा, आतंकी बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद समर्थकों के प्रदर्शन का चरित्र लगभग एक जैसा था। यहां प्रदर्शनकारियों द्वारा लगातार यह कोशिश की जा रही थी कि विवाद की स्थिति उत्पन्न हो और इसका फायदा उठाकर वे आंदोलन को उग्र रूप दे सकें। किसान आंदोलन इससे थोड़ा अलग था। इसमें किसानों की तीन मांगें थीं, जिनको लेकर उनके नेताओं की लगातार सरकार से बात चल रही थी। आखिरकार बातचीत के बाद ही तीनों मांगें वापस हुईं। यानी प्रदर्शन स्थल कहीं भी हो, सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं। अब आते हैं प्रक्रिया पर....तो किसी भी प्रदर्शन को नियंत्रित करने के तीन मूल मंत्र होते हैं। पहला, भीड़ का आकलन। दूसरा, प्रदर्शनकारियों को पुलिस से भिड़ने का मौका न देना और उन्हें छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर वहीं थाम देना। किसान आंदोलन में हमने भीड़ का आकलन किया और हमें यह लगा कि तीनों सीमाओं से यदि किसान शहर में प्रवेश करेंगे तो आम लोगों को परेशानी हो सकती है।

प्रदर्शनकारियों को लंबे समय तक होल्ड पर रखना भी रणनीति का हिस्सा होता है?

- हां बिलकुल। इसके पीछे मकसद होता है कि प्रदर्शनकारियों को थका देना। प्रदर्शनकारी जहां बैठे हैं, उन्हें
वहीं थाम दीजिए और इधर, पुलिस बल की ड्यूटी बदलते रहिए। एक समय बाद प्रदर्शनकारी थक जाएंगे और प्रदर्शन धीमा पड़ जाएगा और पुलिस बल का जोश बना रहेगा।

आतंकी बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए क्या रणनीति अपनाई थी?

- आठ जुलाई 2016 को जिस दिन बुरहान वानी का एनकाउंटर किया गया था, उस दिन मैं जम्मू स्थित
सीआरपीएफ के जोनल हेड क्वार्टर में था। सूचना मिलते ही मैं श्रीनगर पहुंच गया, क्योंकि हम सभी (जम्मू-
कश्मीर पुलिस, सेना और सीआरपीएफ) को अनुमान था कि समर्थकों का विद्रोह बढ़ेगा और देखते ही देखते
इसकी आंच पूरे कश्मीर में फैल गई थी। मैंने अपनी टीम (सीआरपीएफ) को निर्देश दिया था कि वे संगठित रहें और किसी भी स्थिति में कैंप या जहां उनकी ड्यूटी है, वहां भीड़ प्रवेश नहीं कर सके। हर स्थिति
में भीड़ और अपने बीच में दूरी बनाए रखें । यदि कहीं फोर्स को स्थायी रूप में भेजने की जरूरत पड़े, तो रात को मूवमेंट करें। इसके पीछे यही मकसद था कि समर्थकों और हमारे जवानों का आमना-सामना न हो, ताकि गोलीबारी की नौबत न आए । गोलीबारी की घटना में बड़े पैमाने पर प्रदर्शनकारियों की जान को खतरा रहता है। इस रणनीति का फायदा हुआ और चार-पांच महीने तक चले प्रदर्शनों के दौरान सीआरपीएफ के एक भी जवान शहीद नहीं हुए। ...और कानून व्यवस्था बनाए रखने में कम से कम प्रदर्शनकारियों की जानें गईं। यहां भी यह उद्देश्य था कि प्रदर्शन कर रहे लोगों को कोई नया मुद्दा न मिले।

पुलिस बार-बार भीड़ की आड़ में असामाजिक तत्वों के पहुंचने की बात कहती है। इतनी पाबंदियों के बावजूद अपराधी वहां तक कैसे पहुंचते हैं? वास्तव में कितना खतरा होता है?

- ऐसी भीड़ में असामाजिक तत्वों या आतंकी संगठनों से जुड़े अपरिचित चेहरों को भेजा था, ताकि आसानी से
पहचान में न आ पाए या फिर पकड़ में नहीं आए। यदि वारदात को अंजाम देना चाहते हैं, तो वे ऐसे ही
अपरिचित चेहरों का ही सहारा लेंगे। इसमें पुलिस को बेहद सतर्कता के साथ नजर रखनी पड़ती है। यही वजह है कि पुलिस बार-बार अलर्ट करती रहती है...और अलर्ट करते रहना चाहिए।

जिस तरह से देश की सुरक्षा के लिए तीनों सेनाओं की एक कमान बनाकर सीडीएस (चीफ आफ डिफेंस स्टाफ) की व्यवस्था की गई है, क्या अब आने वाले समय में इन परिस्थितियों से निपटने के लिए पुलिस और
सुरक्षाबलों के लिए भी ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि तालमेल रहे?

- दिल्ली में तो यह व्यवस्था लागू है। सभी विभाग गृहमंत्रालय के अधीन हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी संख्या में मेट्रो स्टेशन बंद करने पर नाराजगी जताई थी। क्या कोई फार्मूला है कि कितने
बड़े धरने या रैली और प्रदर्शन के लिए कितना फोर्स लगाया जाना चाहिए?

- नहीं। दिल्ली पुलिस बड़े से बड़े प्रदर्शन को संभालने के लिए सक्षम है। इसके लिए जो भी कदम उचित समझते हैं उनको जरूर लेना चाहिए क्योंकि उचित कदम नहीं लेने पर जान माल का नुकसान भी हो सकता है और इसकी जवाबदारी आखिरकार पुलिस की होगी। जो जिसका काम है वही करे तो अच्छा रहेगा। जहां पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच आमने-सामने का विवाद हो सकता है, वहां ज्यादा फोर्स लगाना चाहिए, ताकि पुलिस बगैर हथियार के उन्हें नियंत्रित कर सके। जैसे जंतर-मंतर पर यदि ज्यादा फोर्स होता तो संभवत: पैलेट गन चलाने की जरूरत नहीं पड़ती। पुलिसवाले भीड़ को काबू कर सकते थे।

पुलिस के बलप्रयोग को विपक्षी व प्रदर्शनकारी लोकतंत्र की हत्या ठहरा रहे हैं?

- वर्ष 1989 में चीन के थियानमेन स्क्वायर में विरोध प्रदर्शन के दौरान जो नरसंहार हुआ, वैसा आजाद भारत
में कभी नहीं हुआ। बड़े राजनीतिक आंदोलन और प्रदर्शन का होना ही अपने आप में लोकतंत्र का सुबूत है। यदि आप पुलिस के नजरिये की बात करेंगे, तो मेरा मानना है कि शहरी-ग्रामीण अंचल में बहुत से कमजोर वर्ग के लोग हैं, जिन्हें कानूनी मदद की जरूरत है। थाने पर उनकी सुनवाई होना ही असली लोकतंत्र है।

किन अधिकारियों और प्रदर्शनों के जरिये आपने धरना-प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के गुण सीखे?

- मेरी पदस्थापना के शुरुआती दिनों में उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन होते थे। उस दौरान
दो अधिकारियों ने मुझे बहुत प्रभावित किया। पहले थे टीम का नेतृत्व करने वाले वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी।
स्थिति कितनी भी तनावपूर्ण हो, वह बेहद शांत रहते थे और फील्ड में मौजूद टीम को उस दबाव से मुक्त रखते थे। दूसरे थे, उनके ही अधीनस्थ सेकेंड इन कमांड। वह फील्ड में टीम के साथ मौजूद रहते थे। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए वह अपनी टीम के आगे पहली कतार पर खड़े मिलते थे। उनके इस कदम से टीम का मनोबल बढ़ जाता था। अपने कार्यकाल में धरना-प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए मैंने इन दोनों ही रणनीतियों को फॉलो करने की कोशिश की है। जब दिल्ली हिंसा के दौरान मुझे कमान सौंपी गई, तो मैं अपने कार्यालय जाने के बजाय चार दिन तक सीलमपुर डीसीपी कार्यालय में ही बैठा था। वहीं से सुबह-सुबह टीम के साथ पैदल मार्च करता था। इससे स्थिति को नियंत्रित करने में बहुत मदद मिली।