कोंडागांव, पूनमदास मानीकपुरी देश में कानून-व्यवस्था को सुचारू तरीके से चलाने और अपराधों पर नियंत्रण के लिए न्याय प्रणाली का विकास हुआ है। न्यायपालिका के अभिन्न अंग सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और उनके अधीन जिला व अन्य न्यायालय कार्य करते हैं। आधुनिक न्याय की इस व्यवस्था के तैयार होने से सदियों पहले से बस्तर में देवता की अदालत की अवधारणा चली आ रही है। गांव में व्यवस्था के बेहतर संचालन के लिए दैवीय शक्तियों द्वारा प्रदत देवताओं की अदालत की संकल्पना सदियों से चली आ रही है।

माटी कोर्ट, माता कोर्ट, देव कोर्ट, भीमा कोर्ट आदि नामों से यहां के आदिवासी इन दैवीय न्याय के मंदिर को जानते हैं और उनपर अगाध श्रद्धा रखते हैं। इन अदालतों में देवता ही न्यायाधीश होते हैं और उनके प्रतिनिधि के तौर पर गायता मुकदमों की सुनवाई और फैसला सुनाते हैं। ग्रामीणों के बीच गांव में स्थित इन अदालतों की अपनी एक अलग महत्ता व विश्वास है। आम तौर पर गांव से बाहर कुछ पेड़ों के समूहों के बीच लगने वाली देवता की इस अदालत में दोषी के तौर पर खड़े होने के भय से आज भी ग्रामीण अपराध से डरते हैं।

माटी कोर्ट होती है सबसे बड़ी अदालत

सुप्रीम कोर्ट की तरह माटी कोर्ट गांव का प्रमुख न्यायालय होता है, जहां गायता या माटी पुजारी देवता रूपी न्यायाधीश के मुख्य प्रतिनिधि होते हैं। गांव में होने वाले शुभ कार्य, चाहे वह शादी-ब्याह हों या अन्य आयोजन, इनकी शुरुआत गांव की मिट्टी के पूजन से ही होती है। गायता के गांव में न होने पर शादी-विवाह आदि आयोजनों में ग्रामीणों को दिक्कतें होती हैं। इस स्थिति में गांव के 5 आदमी मिलकर गांव की मिट्टी पूजन के पश्चात कार्य की शुरुआत करते हैं।

परंपरा के पीछे ऐसी है कहानी

कोंडागांव जिले के कोपाबेड़ा स्थित देव समिति के प्रमुख नरपति पटेल ने नईदुनिया को बताया कि तकरीबन 400 से 500 वर्ष पूर्व कोंडागांव में राम मंदिर से लगा हुआ एक तालाब था। कहा जाता है कि दूसरी दुनिया से आए कुछ दैवीय शक्ति प्राप्त लोगों ने रात के वक्त उसे खोदा और सुबह की किरण फूटने से पहले ही वे वहां से चले गए। उन दैवीय लोगों में एक गर्भवती महिला थीं, जो रास्ते में लोमड़ी द्वारा बनाए गए गड्ढे में पैर फंसने के कारण गिर पड़ीं। वहीं प्रसव पीड़ा और फिर बच्चे का जन्म हुआ। वह महिला बच्चे को छोड़कर ही रात के अंधेरे में वहां से कहीं चली गईं। उजाला होने पर उधर से गुजरते हुए ग्राम पटेल को गड्ढे में रोता हुआ बच्चा नजर आया। घर में लाकर बच्चे का पालन पोषण कर बड़ा किया। शादी के पश्चात उसे मिट्टी से पैदा होने के चलते कोपाबेड़ा की बड़े माटी में गायता बनाया गया। पीढ़ी दर पीढ़ी उनके ही परिवार के सदस्य गायता बनते आ रहे थे। वर्ष भर पूर्व मेहतू राम की मौत के बाद उनके बेटे आसमान कोराम को आसपास के ग्राम प्रमुखों व देवी-देवताओं की उपस्थिति में गायता बनाया गया है।

ऐसे संपन्न हुई गायता बनाने की रस्म

गायता बनाने से पूर्व आसपास के 22 गांव के ग्राम प्रमुखों, पुजारी, सिरहा व देवी-देवताओं को निमंत्रित किया गया। सभी ग्राम प्रमुखों महिला-पुस्र्ष व देवी-देवताओं की उपस्थिति में सोन कुंवर आंगा देव को साक्षी मानकर आसमान कोराम का पैर धुलाकर विधि-विधान पूर्वक पगड़ी रस्म की परंपरा पूरी की गई। सभी गांवों के प्रमुखों ने मिलकर एक चाकू जिसे स्थानीय हल्बी बोली में कडरी कहते हैं, वह उन्हे भेंट स्वरूप दिया।

देवता की अदालत में ऐसे मिलता है न्याय

गांव में किसी तरह का वाद-विवाद होने पर ग्रामीण अपनी परेशानी लेकर ग्राम प्रमुख गांयता के पास पहुंचते हैं। सभी ग्रामीणों की उपस्थिति में गायता द्वारा माटी कोर्ट या देवता की अदालत में देवी को साक्षी मानकर सही गलत का फैसला कर अपराधी को दंड और वादी को न्याय दिया जाता है। माटी कोर्ट से मिलने वाले फैसले को समस्त ग्रामीणों की उपस्थिति में आरोपी भी स्वीकार करते हैं। आरोपी को दंड स्वरूप कुछ, राशि, बकरा, मुर्गा, दाल-चावल, शराब आदि चीजें गांव की मिट्टी की शांति के लिए देवी को दान करना होता है।

Posted By: Sanjeev Tiwari

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