CRR की रिपोर्ट के बाद होगा लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर निर्णय, तकनीकी खामियों चल रहा विशेषज्ञों का मंथन
कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे में उद्घाटन के तुरंत बाद खामियां सामने आने के बाद अब इसकी तकनीकी जांच में आईआईटी खड़गपुर के साथ केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) भी शामिल होगा।
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कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे में उद्घाटन के बाद सामने आईं खामियां।
HighLights
कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे में उद्घाटन के बाद सामने आईं खामियां।
आईआईटी खड़गपुर के साथ सीआरआरआई भी करेगा तकनीकी जांच।
दोनों संस्थानों की रिपोर्ट पर तय होंगे मरम्मत के उपाय।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे की खराब गुणवत्ता के बाद विशेषज्ञों ने प्राथमिक तौर पर भले ही उसके री-सरफेसिंग की जरूरत बता दी हो, लेकिन अब तक उस पर निर्णय नहीं हो सका है।
चूंकि, सड़क परिवहन एंव राजमार्ग मंत्रालय के अधिकारियों ने विशेषज्ञों से मिले इनपुट के आधार पर इसकी डिजाइन में कमी का दावा किया है, इसलिए प्रोजेक्ट को पूरी तरह दुरुस्त और सुरक्षित बनाने के लिए अब आइआइटी खड़गपुर के बाद केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआइ) से भी तकनीकी परामर्श लेने का निर्णय हुआ है।
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का निर्माण पीएनसी इन्फ्राटेक ने किया। उद्घाटन के एक पखवाड़े के भीतर ही सड़क धंसने सहित कई खामियां उजागर हो गईं। एनएचएआइ ने तुरंत ही टोल वसूली स्थगित करते हुए संबंधित अधिकारियों-इंजीनियरों पर कार्रवाई की और पीएनसी इन्फ्राटेक पर तीन साल का प्रतिबंध लगा दिया हालांकि, कंपनी इसके विरुद्ध हाईकोर्ट गई तो प्रतिबंध पर स्थगनादेश हो गया है।
वहीं, प्रोजेक्ट की तकनीकी जांच आइआइटी खड़गपुर की टीम को सौंपी गई। टीम ने मंत्रालय और एनएचएआइ अधिकारियों को खामियों के बारे में पहले ही बता दिया, लेकिन यह तय नहीं हो सका है कि इस एक्सप्रेसवे को वाहनों के चलने योग्य या गुणवत्ता ठीक करने के लिए क्या-क्या उपाय करने होंगे।
एनएचएआइ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अब इस प्रोजेक्ट की जांच और तकनीकी परामर्श की प्रक्रिया में सीआरआरआइ को भी शामिल किया गया है। सीआरआरआइ की टीम भी विभिन्न पहलुओं की जांच करेगी। उसके बाद दोनों जांच रिपोर्ट और संस्तुतियों के आधार पर ही निर्णय किया जा सकेगा कि एक्सप्रेसवे पर री-सरफेसिंग करानी होगी या मरम्मत व सुधार के अन्य उपाय ही पर्याप्त होंगे।
इस परियोजना की तकनीकी खामियों की जांच इसलिए भी गहनता से की जा रही है, क्योंकि सरकार ने आटोमेटेड एंड इंटेलीजेंट मशीन एडेड कंस्ट्रक्शन (एआइ-एमसी) तकनीक का उपयोग पायलट प्रोजेक्ट के रूप में इसी से शुरू किया था। यह दीगर बात है कि जांच के दायरे में यह भी है कि कंपनी ने इस तकनीक का उपयोग कितना किया।
