नई दिल्ली, प्रेट्र। समलैंगिक संबंधों को अपराध के दायरे से बाहर लाने वाली संविधान पीठ के सदस्य जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इस मामले में पल्ला झाड़ने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि राजनेताओं द्वारा इस तरह से मामले को न्यायाधीशों पर छोड़ देना अब रोज की बात होने लगी है।

राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय द्वारा 'संवैधानिक लोकतंत्र में कानून का शासन' विषय पर आयोजित एक व्याख्यान को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि कुछ मौकों पर राजनेता जजों को क्यों ताकत दे देते हैं? और हम देख रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट में यह रोज हो रहा है।
धारा 377 मामले में भी हमने देखा कि सरकार ने कहा कि यह मामला हम अदालत की बुद्धिमत्ता पर छोड़ते हैं। यह अदालत की बुद्धिमत्ता इतनी लुभावनी होती है कि अपने फैसले में मैंने इसका जवाब भी दिया।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि फैसले का सबसे अहम हिस्सा वह था, जिसमें कहा गया कि हम व्यक्तिगत गरिमा को सम्मान देते हैं। किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और इच्छा का सम्मान करते हैं। इसीलिए फैसले के कुछ हिस्से में यह कहा गया है कि मैं जैसा हूं, मुझे वैसा ही रहने दिया जाए।

दुनियाभर के फैसलों का हवाला 
उच्चतम न्यायालय ने समलैंगिकता पर अपने फैसले में एलजीबीटी समुदाय के लिए समानता का मार्ग प्रशस्त करने वाले दुनियाभर के देशों का हवाला दिया और उन देशों की अदालतों के फैसलों को उद्धृत किया। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा और एएम खानविलकर ने 166 पन्नों का मुख्य फैसला लिखा। उन्होंने अपने फैसले में अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, फिलीपींस और यूरोपीय मानवाधिकार अदालत के इसी तरह के फैसलों का उल्लेख किया।
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का उल्लेख करते हुए शीर्ष अदालत ने लिखा कि एलजीबीटी अपने निजी जीवन के लिए सम्मान के हकदार हैं और राज्य उनके अस्तित्व को नीचा नहीं दिखा सकता। उनकी स्वतंत्रता का अधिकार उन्हें राज्य के हस्तक्षेप के बिना आचार-व्यवहार में शामिल होने का पूरा अधिकार देता है।
पीठ ने दक्षिण अफ्रीका की एक संवैधानिक अदालत का भी हवाला दिया, जिसने समलैंगिकों के साथ भेदभाव की तुलना रंगभेद व्यवस्था से की थी।

 

Posted By: Arun Kumar Singh