चेन्नई। भारत के पहले मंगल अभियान के लिए 56 घंटे 10 मिनट की उलटी गिनती रविवार को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन प्रक्षेपण केंद्र पर शुरू हो गई।

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उलटी गिनती रविवार को प्रात: छह बजकर आठ मिनट पर शुरू हुई। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के एक प्रवक्ता ने फोन पर बताया कि स्वदेशी पीएसएलवी सी 35 रॉकेट का काउंट डाउन पांच नवंबर को दोपहर दो बजकर 38 मिनट पर समाप्त होगा। यह पहला मौका होगा जब भारत मंगल ग्रह के लिए अपना अंतरिक्ष यान प्रक्षेपित करेगा। 35 करोड़ किलोमीटर की मंगल ग्रह यात्रा को तय करने में इसे करीब एक वर्ष का समय लगेगा।

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इससे पहले इसरो का सबसे लंबी दूरी का अभियान चंद्रयान साढ़े तीन हजार किलोमीटर का था। इस अभियान से भारत मंगल यान लॉन्च करने वाला विश्व का पांचवां देश बन जाएगा। इससे पहले अमेरिका, रूस, यूरोप और जापान साठ के दशक में मंगल ग्रह के लिए 51 अभियान लॉन्च कर चुके हैं। उनके अभियान पर 2,393 करोड़ रुपये का खर्च आया था, जबकि हमारे स्वदेशी मंगल यान की लागत सिर्फ 450 करोड़ रुपये आई है और इसका कुल भार 1,350 किलोग्राम है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य मंगल ग्रह के वातावरण और ग्रह के भू-विज्ञान का अध्ययन करना है। साथ ही लाल ग्रह पर मीथेन के रहस्य को जानने का प्रयास भी किया जाएगा, जो लंबे समय से अनसुलझा सवाल रहा है।

मंगल मिशन की सफलता से अन्य ग्रहों तक बढ़ेगा खोज का दायरा

बेंगलूर। देश की महत्वाकांक्षी मंगल मिशन परियोजना को लेकर अंतरिक्ष विज्ञानी बेहद आशान्वित हैं। इसरो के पूर्व प्रमुख के कस्तूरीरंगन का तो यहां तक मानना है कि इस अभियान की सफलता से न केवल मंगल के बारे में हमारी समझदारी और विकसित होगी बल्कि सौर मंडल के अन्य ग्रहों तक हमारी खोज का दायरा भी बढ़ेगा। उनके अनुसार इससे अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में देश की नई वैश्विक पहचान बनेगी। दुनिया हमारा लोहा मानेगी। वहीं इसरो के स्पेस अप्लीकेशन सेंटर के निदेशक एएस किरण कुमार कहते हैं, 'मार्स ऑर्बिटर को हमने जिस तकनीक से तैयार किया है। उसका इस्तेमाल कर भविष्य में हम कम लागत में उन्नत किस्म के उपग्रहों का निर्माण करने में सक्षम होंगे'।

मंगल मिशन के प्रक्षेपण की पूर्व संध्या पर कस्तूरीरंगन बेंगलूर में और किरण कुमार चेन्नई में पत्रकारों से बात कर रहे थे। कस्तूरीरंगन का कहना था, 'अभियान का मकसद भारत की तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन करना है। दुनिया को यह दिखाना है कि हम भी लाल ग्रह पर यान भेज सकते हैं और वहां पर जीवन की संभावना तलाशने की दिशा में उपयोगी परीक्षण कर सकते हैं।' ध्यान रहे कि मार्स रोवर के आंकलन के आधार पर अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की ओर से यह बयान जारी किया जा चुका है कि मंगल ग्रह पर जीवन की कोई भी संभावना नहीं है। उन्होंने यान के साथ भेजे जा रहे पांच उपकरणों में से एक मीथेन सेंसर के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उनका कहना था कि इस सेंसर की मदद से लाल ग्रह के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों की स्कैनिंग करने में तो आसानी होगी ही साथ ही जीवन की संभावना के लिए जरूरी मीथेन गैस की मौजूदगी का पता भी चल सकता है। जबकि किरण कुमार ने बताया कि मार्स ऑर्बिटर बेहद उम्दा तकनीक से निर्मित किया गया है। यह किसी भी गड़बड़ी से खुद निपटने वाली तकनीक से लैस है। यह खराबी का खुद पता लगाएगा और जमीन से किसी भी निर्देश के मिले बगैर उसे दुरुस्त करने में सक्षम होगा। उनके अनुसार मिशन के दौरान बहुत लंबे समय तक सूर्य पृथ्वी और मंगल के बीच में होगा। इस अवधि में वहां पर गहरा अंधेरा छाया रहेगा। ऐसे में यान पूर्व अर्जित ऊर्जा के प्रसंस्करण के जरिए संचालित रहेगा। इसके अलावा प्रक्षेपण के बाद 300 दिन तक पृथ्वी की कक्षा में रहने के बाद जब यान मंगल की ओर रवाना होगा, उस समय इसका इंजन स्वत: चालू हो जाएगा।

जीवन संभावना तलाशने की बात पर भड़के माधवन नायर

बेंगलूर। इसरो के पूर्व प्रमुख जी माधवन नायर इस दावे से सहमत नहीं है कि मंगल मिशन अभियान का मकसद लाल ग्रह पर जीवन की संभावना तलाशने को लेकर प्रयोग किए जाएंगे। उन्होंने इस संबंध में इसरो प्रमुख के राधाकृष्णन और पूर्व प्रमुख कस्तूरीरंगन के बयान पर आश्चर्य व्यक्त किया है। उनका कहना है कि मिशन के दौरान जीवन की संभावना तलाशने की बात करना मूर्ख बनाने जैसा है। एक छोटे से मीथेन सेंसर के जरिये आप जीवन के लक्षण नहीं खोज सकते हैं। क्योंकि अगर आप इस लघु उपकरण से जीवन की संभावना के लिए जरूरी मीथेन गैस खोजने की कोशिश करेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी। यह सेंसर गैस की मौजूदगी को नहीं तलाश कर सकता है। उन्होंने कहा, 'मार्स रोवर के आकलन के आधार पर नासा की ओर से सार्वजनिक तौर पर यह दावा किया जा चुका है कि मंगल पर जीवन की रत्ती भर भी संभावना नहीं है। इस सच्चाई के बाद जब कोई जीवन तलाशने की बात करता है तो वह देश को मूर्ख ही बना रहा है।'

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