नई दिल्ली, माला दीक्षित। कोरोना के कारण सब कुछ बंद है ऐसे में अदालती कामकाज भी 21 दिन के लिए लगभग बंद है। सिर्फ अत्यंत जरूरी मामलों की सुनवाई की जा रही है। देश भर की अदालतों में तीन करोड़ से ज्यादा मुकदमें लंबित हैं। कोरोना के कारण ठप हुए कामकाज से न सिर्फ अदालतों में मुकदमों का ढेर बढ़ जाएगा बल्कि न्याय मिलने में लगने वाला समय भी बढ़ जाएगा। यानी न्याय में देरी और बढ़ेगी।

कोरोना के बढ़ते खतरे को रोकने के लिए प्रधानमंत्री ने 25 मार्च से 21 दिन का देशव्यापी संपूर्ण बंद घोषित किया है। हालांकि इस घोषणा से पहले ही सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों व जिला अदालतों में ऐतिहाती कदम उठाते हुए कामकाज सीमित कर दिया था और सभी मामलों की नियमित सुनवाई के बजाए अदालतों ने स्वयं को जरूरी मुकदमों की सुनवाई तक सीमित कर लिया था। इस बीच मुकदमों का निपटारा और सुनवाई तो सीमित हो गई थी लेकिन मुकदमों के दाखिल होने पर कोई रोक नहीं थी ऐसे में नये मुकदमें दाखिल होने की दर पूर्ववत रही और निस्तारण की दर थम गई। जिसका सीधा नतीजा अदालत में लंबित मुकदमों की संख्या बढऩा और मुकदमों का ढेर और बड़ा होते जाना है।

भारत सरकार के 2018 -2019 के आर्थिक सर्वेक्षण में लंबित मुकदमों का ढेर खत्म करने के लिए विस्तृत अध्ययन और आंकड़े प्रस्तुत किये गये थे जिसके मुताबिक अदालतों में लगे मुकदमों के ढेर को खत्म करने के लिए ढांचागत संसाधन के साथ न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की जरूरत बताई गई थी। देश भर की अदालतों में आज की तारीख में तीन करोड़ से ज्यादा मुकदमें लंबित हैं। जिला अदालत का एक जज औसतन एक साल में 746 मुकदमें निपटाता है। अगर कुछ पीछे जाकर आंकड़ो पर निगाह डालें तो मुकदमों के ढेर और उसे निपटाने की गणित समझ आयेगी।

दिसंबर 2017 में देश की अधीनस्थ अदालतों में कुल 2.87 करोड़ मुकदमें लंबित थे। इसके बाद जनवरी 2018 से लेकर दिसंबर 2018 तक जिला अदालतों में 1.5 करोड़ नये मुकदमें दाखिल हुए। अगर दोनों को मिला दिया जाए तो दिसंबर 2018 में जिला अदालतों में कुल मुकदमों की संख्या 4.37 करोड़ हो जाती है। जनवरी 2018 से लेकर दिसंबर 2018 तक यानी एक साल में कुल 1.33 करोड़ मुकदमे निपटाए गए परिणाम स्वरूप दिसंबर 2018 में कुल बचे लंबित मुकदमों की संख्या 3.04 करोड़ थी। जिला अदालतों में कुल 22750 जजों के मंजूर पद हैं लेकिन इस दौरान काम सिर्फ 17891 जजों ने किया बाकी पद खाली थे। 

आंकड़े बताते हैं कि एक जज ने वर्ष भर में औसतन 746 मुकदमें निपटाए। मुकदमें निपटाने की ये दर 89 फीसद थी और इस दर को सौ फीसद करने के लिए 2279 जजों की और आवश्यकता थी। यानी अगर अधीनस्थ अदालतों में जजों के सभी पद भर दिये जाएं तो मुकदमों की निस्तारण की सौ फीसद दर प्राप्त की जा सकती है। लेकिन बाकी लंबित 3.04 करोड़ मुकदमें अगले पांच साल मे निपटाने के लिए जिला अदालतों में 8152 और जजों की जरूरत है।

मोटे तौर की गई इस गणना से साफ है कि अगर मंजूर पदों पर पूरी क्षमता से काम किया जाए तो हर साल दाखिल होने वाले मुकदमों को निपटाने की सौ फीसद दर तो हासिल हो सकती है लेकिन लंबित मुकदमों का ढेर इससे नहीं खत्म होगा उसके लिए आठ हजार से ज्यादा अतिरिक्त जज चाहिए होंगे तब भी सारे मुकदमें खत्म होने में पांच साल लगेंगे। इस स्थिति की अगर आज की स्थिति से तुलना की जाए तो पूरे देश में मुकदमों की सुनवाई पूर्ण बंदी से पहले से ही लगभग रुकी हुई थी। 

अदालतें सिर्फ अर्जेन्ट मामले सुन रही थीं। लेकिन उस समय भी मुकदमें दाखिल होने बंद नहीं हुए थे फिजिकल तौर पर मुकदमें दाखिल होना लाकडाउन के बाद प्रभावित हुआ है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट सहित बहुत सी अदालतों में ईफाइलिंग की सुविधा है यानी बंदी के दौरान भी लगातार मुकदमें दाखिल हो रहे हैं जबकि निपटाए नहीं जा रहे जिसका नतीजा होगा कि अदालतों में मुकदमों का ढेर और बढ़ जाएगा जिसे निपटाना बड़ी चुनौती होगा। कोराना का असर जहां आर्थिक और अन्य पहुलुओं पर पड़ेगा वहीं न्याय की रफ्तार पर भी पड़ेगा।

कहां कितने मुकदमें

सुप्रीम कोर्ट में 

60,469

उच्च न्यायालयों में 

4643373

जिला अदालतों में 

32182309

जिला अदालतों में कुल लंबित मुकदमों में 10166396 मामले एक साल से लंबित और 81343 मुकदमें 30 साल से लंबित हैं।

Posted By: Shashank Pandey

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