नई दिल्ली, सीमा झा। Coronavirus: बकुल शर्मा मिलनसार स्वभाव के रहे हैं। अपनी सोसायटी के सचिव हैं पर इन दिनों अपने घर पर बंद हो चुके हैं। बॉलकनी में भी नहीं दिखाई देते। टीवी पर नजरें गड़ाए कोरोना वायरस से जुड़े हर अपडेट को पाने की बेचैनी उनकी आंखों में साफ देखी जा सकती है। बेतरतीब कपड़े, उलझे बालब और थकी आंखें बता रही हैं कि वे काफी तनाव में हैं।

बच्चे और पत्नी शर्मा जी के नाराज हो जाने के डर से फ्लैट से बाहर निकलने की बात अब नहीं करते। मां गांव जाने की जिद भी छोड़ चुकी हैं। स्वास्थ्य खराब होने के कारण वे गांव से यहां अच्छी देखभाल की शर्त पर आई थीं, पर घर पर अब कोई और बात नहीं होती। टीवी पर खबरिया चैनलों की आवाजों के बीच दबकर रह गई है बच्चों की खिलखिलाहट, मां की डांट और पत्नी की प्यारी डांट या समझाइश।

क्या है फीयर साइकोसिस : इन दिनों अधिकतर लोग दहशत में आकर वही कर रहे हैं, जो नहीं करना है। जैसे, सोशल मीडिया, न्यूज चैनलों पर नजरें गड़ाए रखना और कोरोना वायरस से जुड़ी चर्चा करते रहना। अपनी दिनचर्या को ताक पर रख भविष्य में आने वाले अनजाने खतरे और बुरी आशंकाओं में झूलते रहना। अत्याधिक राशन, दवा आदि की खरीदारी करना। ये सब ‘फीयर साइकोसिस’ के संकेत हैं।

डर बीमार बना सकता है

  • आप छोटी सी बात को बड़ा बनाकर देखने के आदी होते जाएंगे
  • लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहे तो अवसाद की संभावना बढ़ सकती है
  • डर लंबे समय तक बना रहे तो स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टीसोल बढे़गा। यही स्थिति बनी रहेगी तो ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल असामान्य होने का खतरा रहेगा। इससे हाइपरटेंशन और दिल के मरीजों को नुकसान होगा

याद रहे

  • इस समय योग बड़ी राहत दे सकता है
  • आमने-सामने न मिलें। फोन या वाट्सएप पर संपर्क कर सकते हैं
  • आपको लग रहा है कि परेशानी अधिक बढ़ रही है तो किसी काउंसलर, जानकार परिचित से जरूर शेयर करें
  • अल्कोहल और धूमपान का सेवन करते हैं तो यह जान लें कि ये डर को और बढ़ाते हैं न कि कम करते हैं। इन पर नियंत्रण रखें
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, लोग इन दिनों आक्रामक और भयभीत हो रहे हैं तो इसका कारण समाचार माध्यमों को अधिक समय देना है। बेहतर होगा कि अधिक समय परिवार को दें और बस अपडेट होने के लिए मीडिया या सोशल मीडिया की ओर जाएं

फीयर साइकोसिस के शिकार तो नहीं : कुछ लोग आपात स्थिति से पैदा होने वाली मनोस्थिति का बेहतर प्रबंधन कर लेते हैं तो कुछ शर्मा जी की तरह अपनी मानसिक स्थिति के आगे घुटने टेक देते हैं। फोर्टिस हॉस्पिटल, नोएडा के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉक्टर अजय निहलानी इसे मनोचिकित्सकीय भाषा में ‘फीयर साइकोसिस’ की स्थिति कहते हैं। उनके मुताबिक, इससे ग्रस्त लोग अत्यधिक सावधान हो जाते हैं। इतना डर जाते हैं कि अगर उन्हें पांच मिलीग्राम की गोली खाने की सलाह दी जाती है, तो वे आठ मिलीग्राम की गोली खाना जरूरी समझते हैं। यह मन:स्थिति लगातार बनी रहे तो लोगों को बीमार बना सकती है। जब स्थिति सामान्य हो जाती है, तब भी इसका बुरा प्रभाव बना रह सकता है।

पूरी दुनिया आपके साथ : ‘इटली, फ्रांस और न्यूयॉर्क का बुरा हाल है, तो हमारी क्या बिसात। हमारे यहां फैला तो हम खत्म हो जाएंगे या अब दुनिया बर्बादी की तरफ बढ़ रही है।’ ऐसे जुमले यदि डरा रहे हैं तो अपना नजरिया तुरंत बदलें। इस बारे में मुंबई की वरिष्ठ लाइफ कोच और साइकोथेरेपिस्ट डॉक्टर प्रकृति पोद्दार सलाह देती हैं, ‘जब अनजाने संकट से घिर जाएं तो परिवेश में मचने वाली यह अफरातफरी स्वाभाविक है पर सोचें कि यह केवल आपका दुख नहीं है। यहां तो पूरी दुनिया एक नाव पर सवार है और सब साथ मिलकर इस डर से लड़ रहे हैं। जब कुछ पता नहीं कि आगे क्या होना है तो नकारात्मक होने के बजाय एक सूत्र पकड़ लेना बेहतर है, ‘जरूरी एहतियात बरतें। घर पर रहें, भीड़ में जाने से परहेज करें।’

साफ रखें दिमाग की राह : दिमाग में रोजाना साठ से अस्सी हजार विचार दौड़ते हैं। उनमें ज्यादातर दोहराव वाले और नकारात्मक विचार होते हैं। डॉक्टर प्रकृति के मुताबिक, ‘आप जान लें कि आपके दिमाग को नहीं पता कि आपको क्या चाहिए। यह आपको तय करना है कि डर बढ़ाने वाली खबरोंसूचनाओं से इसे फीड करना है या इससे खुद को अलग रखना है।’ उनके अनुसार, ‘यह समय है खुद को सक्रिय और सतर्क रखने का। दिमाग को बार-बार समझाना है कि यह वक्त गुजर जाएगा और जिंदगी दोबारा पटरी पर लौटेगी।’ यहां सक्रिय रहने का अर्थ है कि जो काम आपको पसंद है, जो सुकून देता है या औरों को सुकून पहुंचा सकता है, उसमें खुद को लगाए रखना। सतर्क रहने का मतलब है-जरूरी सावधानियों का ख्याल रखना, खुद को डर में उलझने से बचाए रखना!

नहीं होगी हाथ धोने की बीमारी : इन दिनों साबुन-पानी या एल्कोहल बेस्ड सेनिटाइजर से नियमित रूप से हाथ धोना सबसे महत्वपूर्ण है। बातचीत के क्रम में लोग यह भी कह रहे हैं कि ऐसा चलता रहा तो लगता है ओसीडी यानी ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिजॉर्डर के शिकार हो जाएंगे। एक ऐसी बीमारी जो बार-बार हाथ धोने के लिए उकसाती है। डॉक्टर अजय निहलानी के अनुसार, ऐसा मानना गलत है।

दहशत को बदल दें राहत में : विशेषज्ञों के मुताबिक, इस वक्त का रचनात्मक उपयोग आपको दहशत में राहत देगा। घर पर कभी समय न होने की शिकायत के बीच अब आपके पास भरपूर समय है। घर पर रहने के दौरान अपनी पसंद के काम, हुनर को निखारने और अपनों के साथ बातचीत करने, बच्चों को कहानियां सुनाने, बड़े- बुजुर्गों के साथ समय बिताएं। व्यस्त दिनों के दौरान आपको कभी ऐसा अवसर नहीं मिलता था। अब जब मिला है, तो इसका सदुपयोग अपने साथ-साथ परिजनों की खुशहाली के लिए करें।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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