[रिजवान अंसारी]। हाल ही में संपन्न हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद सरकार गठन को लेकर उत्पन्न विवाद अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया। यह पहला मौका नहीं था जब सरकार बनाने को लेकर उपजे विवाद ने राज्यपाल की भूमिका पर कई सवाल खड़े कर दिए। देश कई बार ऐसे विवादों का गवाह बना है, लेकिन हैरानी की बात है कि कई सवाल अभी भी अनसुलझे हैं। चुनावी नतीजे के बाद सरकार के गठन को लेकर जिस प्रकार से रस्साकशी का दौर चला, वह हमारी राजनीतिक व्यवस्था पर कई प्रश्न चिन्ह लगाता है। दरअसल पिछले कुछ वर्षों में विधानसभा चुनावों के बाद सरकार के गठन का मसला काफी विवादपूर्ण रहा है। गोवा, मणिपुर, मिजोरम के बाद अब कर्नाटक में सरकार गठन के मामले इसी कड़ी की बानगी हैं।

राज्यपाल की शक्तियां

गौरतलब है कि संविधान के छठे भाग में अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्य कार्यपालिका की चर्चा है जिसमें राज्यपाल की नियुक्ति और उनकी भूमिका की बात की गई है। इसके अलावा भी संविधान में अलग-अलग जगहों पर मसलन-अनुच्छेद 174, 175, 176, 200, 201, 213, 233 तथा 234 में राज्यपाल की शक्तियों की चर्चा है। दरअसल राज्यपाल कार्यालय के मामले में भारतीय संघीय ढांचे के तहत दोहरी भूमिका तय की गई है। गौर करने लायक बात है कि सरकार गठन के बारे में राज्यपाल की भूमिका की चर्चा संविधान में नहीं है। अनुच्छेद 164 में मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा किए जाने की चर्चा जरूर है। लिहाजा विवादों की बड़ी वजह संविधान में स्पष्ट प्रावधानों का अभाव होना ही है। स्पष्ट प्रावधानों के अभाव में ही अब तक परंपराओं का सहारा लिया जाता रहा है। दूसरी ओर संवैधानिक प्रावधानों तथा परंपराओं की समय समय पर अलग-अलग व्याख्या भी इस विवाद की मुख्य वजह है।

विवाद के कारण

दरअसल सरकार के गठन को लेकर राज्यपाल के पास जो भी अधिकार हैं वह उनके विवेक पर निर्भर करता है। भारतीय संविधान में इस बात की चर्चा नहीं है कि सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का मौका दिया जाए। सच तो यह है कि संविधान में ‘दल’ शब्द भी पहली बार तब जोड़ा गया जब 1985 में राजीव गांधी सरकार ‘दल-बदल विरोधी कानून’ लेकर आई। हालांकि सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने की परंपरा जरूर रही है, लेकिन ऐतिहासिक पहलुओं पर गौर करें तो सभी तरह के उदाहरण देखने को मिलते रहे हैं। हाल ही में कर्नाटक में जहां सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का मौका दिया गया, वहीं पिछले साल गोवा तथा मणिपुर में चुनाव बाद गठबंधन वाले दलों को सरकार बनाने का मौका मिला। ऐसे में सवाल है कि समय-समय पर अलगअलग आधार पर सरकार बनाने का मौका क्यों दिया जाता रहा है? सबसे बड़े दल को मौका देने की परंपरा की शुरुआत होने के बावजूद इसे बरकरार क्यों नहीं रखा जा सका? दरअसल इस प्रकार के विवादों को समझने के लिए हमें इसके राजनीतिक पहलुओं पर गौर करना होगा। हम सभी जानते हैं कि राज्यपाल को केंद्र ‘सरकार के प्रतिनिधि’ के रूप में जाना जाता है। ऐसा इसलिए भी कहा जाता है, क्योंकि जब केंद्र में सरकार बदलती है तो वह राज्यों में वैसे लोगों को राज्यपाल के पद पर नियुक्त करती है जो उसकी पार्टी से जुड़े होते हैं।

गौरतलब है कि मौजूदा वक्त में 20 से ज्यादा राज्यों के राज्यपाल वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए गए हैं। बात चाहे वर्तमान सरकार की हो या पिछली सरकारों की, सभी ने सत्ता संभालने के बाद तात्कालिक राज्यपालों को हटा कर नए राज्यपालों की नियुक्ति की है। गौर किया जाए तो राज्यपालों की नियुक्ति की यह परिपाटी ही राज्यपाल की भूमिका से जुड़े विवादों का मूल कारण है। कहा जाता है कि जब कोई राजनीतिक व्यक्ति इस पद पर आसीन होता है तो वह अपनी पार्टी का हित साधना चाहता है और यही कारण है कि 1983 में गठित सरकारिया आयोग ने गैर-राजनीतिक व्यक्ति को राज्यपाल के पद पर नियुक्त करने की सिफारिश की थी।

न्यायालय की व्यवस्थाएं

राज्यपाल की भूमिका और केंद्र-राज्य संबंध पर समय-समय पर सर्वोच्च न्यायालय ने कई व्यवस्थाएं दी है। दरअसल वर्ष 1989 में कर्नाटक की जनता दल सरकार को राज्यपाल ने बिना शक्ति परीक्षण का मौका दिए ही बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी थी। इसी मामले में चर्चित एस आर बोम्मई केस में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य की सरकारों को बर्खास्त करने संबंधी अनुच्छेद 356 की व्याख्या की और कहा कि इसके तहत अगर केंद्र सरकार राज्य में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को बर्खास्त करती है तो न्यायालय सरकार बर्खास्त करने के कारणों की समीक्षा कर सकता है। न्यायालय केंद्र से उस सामग्री को कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए कह सकता जिसके आधार पर राज्य की सरकार को बर्खास्त किया गया है। साथ ही न्यायालय ने यह भी व्यवस्था दी कि अगर राज्यपाल किसी दल के नेता को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाता है तो ऐसी स्थिति में बहुमत परीक्षण केवल विधानसभा के पटल पर ही होना चाहिए।

गौरतलब है कि सरकारिया आयोग ने भी यही बात कही थी। इसी प्रकार वर्ष 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव में त्रिशंकु परिणाम की स्थिति में राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी थी। लेकिन रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ केस में न्यायालय ने राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति शासन की सिफारिश को असंवैधानिक करार दिया। न्यायालय ने व्यवस्था दी कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में अगर कोई दल सरकार बनाने का दावा पेश नहीं करता है तो ऐसी स्थिति में ही राज्यपाल राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर सकता है। साथ ही न्यायालय ने यह भी कहा कि जब कोई दल बहुमत हासिल नहीं कर पाता है तो राज्यपाल को चाहिए कि वह सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करे।

आगे का रास्ता

भारत एक लोकतांत्रिक देश है और एक लोकतांत्रिक व्यवस्था का निष्पक्ष, पारदर्शी और कानून के अनुरूप होना बेहद जरूरी है। इतना ही नहीं, राज्य में बनने वाली भावी सरकार राज्य के भविष्य को तय करती है। ऐसे में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि राज्यपाल की भूमिका निष्पक्ष हो। दरअसल संविधान में संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों द्वारा विवेक के इस्तेमाल की व्यवस्था परिस्थितियों के अनुसार बेहतर फैसला लेने के लिए है। 2007 में गठित पुंछी आयोग ने भी कहा है कि राज्यपाल का कार्य एकपक्षीय अथवा अवास्तविक नहीं होना चाहिए। उनका कार्य नेकनियती द्वारा प्रेरित तथा सतर्कता द्वारा संतुलित होना चाहिए। ऐसे में सवाल है कि यह संभव कैसे होगा? इसके लिए तीन तरह के प्रावधान की आवश्यकता है। पहला प्रावधान यह हो कि गैर-राजनीतिक व्यक्ति को ही राज्यपाल के पद पर नियुक्त किया जाए, जैसा कि सरकारिया आयोग ने भी सिफारिश की थी। जाहिर है कि जब कोई व्यक्ति राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं होगा तो वह स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से राजनीतिक फैसले ले सकेगा। अन्यथा उसके द्वारा राजनीतिक दलों के हित साधने की आशंका हमेशा बनी रहती है।

दूसरा प्रावधान यह हो कि राज्यपाल के पांच वर्ष के कार्यकाल को बिना ठोस कारणों के बाधित नहीं किया जाए। उनको भी कार्यकाल की वही सुरक्षा मिले जो कैग और निर्वाचन आयोग जैसे संवैधानिक संस्था के सदस्यों को प्राप्त है। अगर इस प्रावधान को संवैधानिक बाध्यता में बदला जाए तो राज्यपाल अपनी संवैधानिक शक्तियों का उपयोग स्वतंत्रतापूर्वक कर सकेंगे। तीसरे प्रावधान के रूप में देखें तो इस बात की व्यवस्था होनी चाहिए कि ऐसे व्यक्ति को राज्यपाल बनाया जाए जो किसी भी तरह के आपराधिक मामलों में आरोपी न हो। हमें समझना होगा कि राज्यपाल का पद एक संवैधानिक पद है जिसकी अपनी मर्यादा होती है। लिहाजा राज्यपाल का आपराधिक प्रवृत्ति का होना बेहद चिंता का विषय है। साथ ही इस बात का भी प्रावधान हो कि अगर राज्यपाल के पद पर रहते हुए उस व्यक्ति पर कोई आरोप लगता है तो उसे पद से हटाया जा सके।

इसके अलावा संविधान में इस बात की भी साफ चर्चा हो कि खंडित जनादेश की स्थिति में सरकार बनाने का मौका किस दल को दिया जाए। समझना होगा कि इस प्रावधान के अभाव में विधायकों की खरीद-फरोख्त जैसे राजनीतिक अनाचार को बढ़ावा मिलता है। जाहिर है इससे लोकतांत्रिक मूल्यों को कायम रख पाना मुश्किल हो जाएगा। बहरहाल मौजूदा वक्त में इस बात की जरूरत है कि राज्यपाल से जुड़े हर तरह के विवादों पर विराम लगाने के लिए ठोस प्रावधान बनाए जाएं ताकि आने वाले समय में विभिन्न प्रकार के विवादों सहित राजनीतिक भ्रष्टाचार पर भी लगाम लग सके। अगर ऐसा हो पाता है तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों को तराशने जैसा होगा।

अध्येता, जामिया मिलिया

इस्लामिया 

By Sanjay Pokhriyal