डा. विकास सिंह। भारत में आर्थिक विकास अब न तो रोजगार पैदा कर रहा है और न ही बेरोजगारी से निपटने के लिए रामबाण समाधान बन रहा है। पिछले कुछ दशकों में भारत के श्रम बाजार में व्यापक परिवर्तन हुआ है जो जीडीपी बनाम नौकरी की संख्या में परिलक्षित होता है। यह सही है कि नौकरियों तथा विकास के विघटन की वास्तविकता और बेरोजगारी से संबंधित मामलों के प्रति हम जागरूक हो रहे हैं। इन सबके बीच एक तथ्य यह भी है कि नौकरी का लचीलापन पिछले तीन दशकों में 0.4 से घटकर 0.25 हो गया है और यह प्रभावी रूप से नीचे जा रहा है। इसका अर्थ यह है कि सकल घरेलू उत्पाद में प्रत्येक एक प्रतिशत की वृद्धि के लिए, नौकरी में वृद्धि केवल 0.25 है, जो पहले 0.4 था। अधिकांश नीति निर्माता इसका पूर्वानुमान नहीं लगा सके और वे इसके प्रभाव को पहचानने में भी विफल रहे। भारत की जनसांख्यिकी के लिहाज से यह स्थिति अच्छी नहीं है।

केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं नौकरी : रोजगार में रोजमर्रा से संबंधित जीवन के अधिकांश पहलुओं को प्रभावित करने की क्षमता होती है। इस तथ्य को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए कि नौकरी केवल जीविकोपार्जन का साधन नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के जीवन स्तर को काफी हद तक परिभाषित करती है। यह समुदाय के साथ उनके संबंधों का उदाहरण है और सामाजिक स्थिति का प्रतीक भी है। किसी के आत्मसम्मान पर उसके काम का सबसे महत्वपूर्ण असर पड़ता है। इस संबंध में किए गए एक अध्ययन में बताया गया है कि रोजगार में बदलाव भी बढ़ती मजदूरी और आय असमानता का एक कारण है। उच्च और निम्न-मजदूरी वाले व्यवसायों का उदय और मध्यम वेतन वाली नौकरियों की गिरावट कार्यबल के निम्न-कुशल घटकों पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी। यह हमारे लिए गंभीर चिंता का विषय है।

नौकरी की सुरक्षा : इस बात की पूरी संभावना है कि वर्तमान में उपलब्ध नौकरियों में से एक तिहाई अगले एक दशक में ‘स्वचालित’ हो जाएंगी। इतना ही नहीं, नौकरियों का ध्रुवीकरण पांच साल में एक चौथाई मध्यम स्तर वाली नौकरियों को बाधित करेगा। एक चौथाई से अधिक स्नातक छात्र ऐसी नौकरियों में होंगे जिनका आज अस्तित्व ही नहीं हैं। एक चिंताजनक तथ्य यह भी है कि विनिर्माण से जुड़ी नौकरियां प्रति वर्ष 10 प्रतिशत की दर से कम हो रही हैं, जबकि इस व्यवसाय में सालाना 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है। एक हालिया अध्ययन में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि डिजिटलीकरण, आटोमेशन और उभरती उद्योग संरचना नौकरी के क्षेत्र में परिवर्तन ला रही है। कुछ विशेषज्ञों का तो यह भी मानना है कि ये तीसरी औद्योगिक क्रांति के लक्षण भी हो सकते हैं। ऐसे में भविष्य में आने वाली संबंधित चुनौतियों को समझने के लिए नया विजन तैयार करना होगा। यह भी सही है कि नवीन औद्योगिक क्रांति ने कई व्यवसायों को ध्वस्त कर दिया है और कई उद्योगों की प्रकृति को बदल कर रख दिया। आर्थिक क्षेत्र में इतिहास हमें यह भी बताता है कि पश्चिमी दुनिया ने चीन जैसे पूर्वी समाजों की तरह विकास के आधार पर कब्जा कर लिया और वास्तविकता को ‘अनदेखा’ कर दिया। परिणामस्वरूप वे अगले कुछ दशकों तक विफलता के साथ औद्योगीकरण से जूझते रहे।

नौकरी का पारिस्थितिकी तंत्र : देश में नौकरी के पारिस्थितिकी तंत्र और इसके कार्यक्षेत्र को कई अन्य ताकतों अर्थात् बाजारों का वैश्वीकरण, कार्यबल की जनसांख्यिकी (आयु और लिंग दोनों) और काम तथा रोजगार को नियंत्रित करने वाले कानून व नियम के रूप में डिजिटलीकरण द्वारा परिभाषित किया जाएगा। वर्तमान रोजगार में 80 प्रतिशत से अधिक लोग एमएसएमई यानी लघु एवं मध्यम आकार वाले उद्यमों में कार्यरत हैं। हालांकि एमएसएमई सेक्टर की असफलता दर चिंताजनक है। अधिकांश के पास बहुत कम या कोई प्रतिस्पर्धात्मक फायदा नहीं है। संबंधित पारिस्थितिकी तंत्र उन्हें अनुकूलता अपनाने में कमजोर बनाता है। निरीक्षकों से ‘जूझने’ में ही उन्हें अपना काफी संसाधन खर्च करना होता है। इस प्रकार व्यवसाय को ‘संचालित करने’ के लिए उनके प्रयासों का एक बड़ा हिस्सा ‘बर्बाद’ हो जाता है, जो सरकार और उसके निकायों से अपने अधिकारों के अनुरूप कुछ ‘प्राप्त’ करने का एक निराशाजनक प्रयास है।

सरकार की योजनाएं और समर्थन उन्हें नजरअंदाज करते हैं। जब बड़े संगठन लागत कम करने के लिए आटोमेशन को बढ़ावा देंगे तो उसका असर एमएसएमई पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देगा। ऐसा होने पर वे छोटे खिलाड़ियों के ‘आउटसोर्सिग’ पर कम भरोसा करेंगे। उपरोक्त तमाम परिस्थितियां यह दर्शाती हैं कि भारत को अपने एमएसएमई सेक्टर को सुरक्षा प्रदान करने की आवश्यकता है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो उन्हें असफल होने से बचाना बहुत मुश्किल होगा। इससे हमारी अर्थव्यवस्था की गति प्रभावित हो सकती है।

कृषि क्षेत्र : कृषि और भूमि सुधार क्षेत्र पर ध्यान देने से ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में रोजगार का सृजन संभव हो सकता है। भारतीय श्रम बाजार पहले कृषि और अब विनिर्माण से दूर सेवा उद्योगों की ओर स्थानांतरित हो रहा है। इसे विनिर्माण क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा की कमी और आंशिक रूप से स्वयं किसी क्षेत्र की बदलती प्रकृति द्वारा समझा जा सकता है।

आटोमेशन : अधिकांश अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं को यह महसूस नहीं हुआ है कि कम प्रचलन वाली नौकरी का ध्रुवीकरण भी भारत को कड़ी टक्कर देगा। बेरोजगारी पर तकनीक का प्रभाव कौशल वितरण एवं विभिन्न कार्य भूमिकाओं की विशेषता वाले कार्यो में भिन्न होता है। यह सही है कि भारत में कार्यबल की कुशलता अपेक्षाकृत कम है। लिपिक और उत्पादन गतिविधियों से संबंधित तमाम नियमित कार्य आसानी से स्वचालित हो जाते हैं। लेकिन यह भी सही है कि आटोमेशन उन उच्च कुशल श्रमिकों का मित्र भी है जो आंकड़ों और तथ्यों से संबंधित जटिल कार्य करते हैं। इसी तरह कम कौशल वाली नौकरियों पर बहुत कम या कोई प्रभाव नहीं पड़ता है जिसके लिए पारंपरिक निपुणता समेत हाथ और आंख के समन्वय की आवश्यकता होती है।

तकनीक : तकनीक के विकास के कारण विनिर्माण क्षेत्र में आइसीटी यानी इंफोर्मेशन कम्युनिकेशन एंड टेक्नोलाजी के प्रसार ने लाखों नौकरियों को छीन लिया है। हालांकि आइसीटी के अधिक उपयोग का सेवा क्षेत्र पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। यह सही है कि कोई भी उद्यम आइसीटी के प्रयोग से बचा नहीं है। तकनीक तेजी से हमारे कार्य जगत में प्रवेश कर रहा है और पिछले 10 वर्षो में आइसीटी के प्रवेश ने कई क्षेत्रों में श्रम की मांग को 25 प्रतिशत तक कम कर दिया है। विशेष रूप से विनिर्माण क्षेत्र में, जो आकार में तो दोगुना हो गया है, लेकिन नौकरियां 50 प्रतिशत तक कम हो गई हैं।

एक ओर जहां विश्व में नौकरियों में आटोमेशन का दखल बढ़ रहा है, वहीं एक सच्चाई यह भी है कि भारत तेजी से तकनीकी परिवर्तन को अपनाने के लिए तैयार नहीं है। लगभग 90 प्रतिशत भारतीयों के पास आइसीटी कौशल बिल्कुल नहीं है। स्नातक करने वाले छात्रों में से केवल 20 प्रतिशत छात्र ही सबसे सरल आइसीटी कार्य कर सकते हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो ‘योग्य व्यक्तियों’ के बीच भी स्थिति बेहतर नहीं है। कंप्यूटर साइंस के एक तिहाई छात्र ही डिजिटल तकनीकों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने का कौशल हासिल कर पाते हैं। सभी प्रकार के पेशेवरों में से केवल एक तिहाई के पास ही समस्याओं का मूल्यांकन करने और उनका ‘समाधान’ तलाशने के लिए अधिक उन्नत ज्ञानात्मक कौशल है।

रोजगार क्षेत्र को प्रोत्साहित करने में श्रम सुधार की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। श्रम और कौशल नीतियों को श्रमिकों और उद्यमों को कौशल के लिए बेहतर प्रोत्साहन प्रदान करना चाहिए। सरकार को भी सीखते रहने और लोगों को निरंतर प्रशिक्षित करने के लिए एक रूपरेखा विकसित करने की आवश्यकता है। श्रम कानूनों को अर्थव्यवस्था और अनुबंध आधारित नौकरियों की वर्तमान वास्तविकता के अनुकूल होना चाहिए। इस प्रकार से, कारपोरेट क्षेत्र को भी अनुकूलता के विस्तार के विचार को अपनाना चाहिए।

यह सही है कि भविष्य में श्रम बाजार की मांग किस तरह की होगी इसे समझना आसान नहीं है, फिर भी हमारे नीति निर्माताओं को आर्थिक परिवर्तन और उसके प्रभाव को चलाने वाली ताकतों की बेहतर समझ विकसित करने की आवश्यकता है। इसी तरह उन्हें विकास और नौकरियों के सहसंबंध को ध्यान में रखने की आवश्यकता है। यदि हम एक सक्षम ‘नौकरी’ ढांचा तैयार कर सकते हैं जो शिक्षा और कौशल को जोड़ता हो, तो एमएसएमई समर्थित पारिस्थितिकी तंत्र के साथ श्रम कानूनों को जोड़ा जा सकता है। हमें अर्थव्यवस्था आधारित नीतियों में व्यापक सुधार करने के साथ-साथ लागत घटाने वाली योजनाओं और प्रयासों को हतोत्साहित करना पड़ सकता है।

भारत की विशाल जनसंख्या जहां कई मायने में उसके लिए अभिशाप है तो कुछ मामले में यह विश्व के कई देशों को अपनी ओर आकर्षित करने वाला भी है। यहां की विशाल जनसंख्या ही इसकी अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाती है। हालांकि बेरोजगारी की चुनौतियों को संरचनात्मक, समग्र नीतिगत ढांचे और समन्वित प्रयासों द्वारा समाधान करने की आवश्यकता है। इसका मतलब होगा कि स्थायी रूप से इसका समाधान करने के लिए कई मंत्रलयों के प्रयासों को आपस में जोड़ा जाना चाहिए। श्रम मंत्रलय को शिक्षा और कौशल मंत्रलय के साथ मिलकर काम करना चाहिए, वित्त मंत्रलय को एमएसएमई मंत्रलय में अपना योगदान देना चाहिए। यह सही है कि सभी मंत्रलय अपने अपने स्तर पर बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं, परंतु उसका परिणाम उतना अच्छा नहीं आ पा रहा है जितना प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में सभी संबंधित मंत्रलय यदि तालमेल कायम करते हुए समन्वित कार्यक्रम बनाएं और उसे क्रियान्वित करें तो निश्चित रूप से इस दिशा में कामयाबी हासिल की जा सकती है।

[मैनेजमेंट गुरु तथा वित्तीय एवं समग्र विकास के विशेषज्ञ]

Edited By: Sanjay Pokhriyal