राधाकिशन शर्मा/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के मरवाही में दूरस्थ वनांचल में एक स्कूल ऐसा भी है जहां सुबह की प्रार्थना में राष्ट्रगान के बाद संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक वाचन किया जाता है। यह सिलसिला आठ साल से नियमित रूप से चल रहा है। स्कूल की खासियत यह है कि वहां शत-प्रतिशत आदिवासी बच्चे अध्ययनरत हैं।

धारा प्रवाह संविधान की प्रस्तावना का वाचन 

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के दूरस्थ वनांचल स्थित ग्राम नाका में प्राथमिक शाला का संचालन किया जा रहा है। बारिश हो या सर्दी की सुबह, यहां कक्षा लगने से पहले दो चीजें नियमित रूप से होती है। स्कूल परिसर में छठवीं से आठवीं तक के बच्चे इकठ्ठे होते हैं और सामूहिक रूप से राष्ट्रगान के बाद संविधान की प्रस्तावना का वाचन करते हैं। छात्र इसकी अगुवाई करते हैं। चारों बारी-बारी से संविधान की प्रस्तावना का वाचन कराते हैं। इनमें दो छात्राएं कलावती बाकरे और किरण मरावी भी शामिल हैं। दोनों धारा प्रवाह संविधान की प्रस्तावना का वाचन करती हैं। जहां पूर्ण विराम है, वहां रुकती हैं।

शिक्षकों ने भारत के संविधान की प्रस्तावना का वाचन कराने की सोची

स्कूल के प्रधान पाठक एएल धु्रवे बताते हैं कि यहां पदस्थापना के बाद उन्होंने और शिक्षक मोहम्मद जहीर अब्बास ने भारत के संविधान की प्रस्तावना का वाचन बच्चों के बीच कराने की सोची। शुरुआत में थोड़ी कठिनाई हुई। शिक्षक जहीर अब्बास का कहना है कि हालांकि मौजूदा शिक्षण सत्र में स्कूल बंद है। जब भी स्कूल का संचालन होगा यह परंपरा निभाई जाएगी।

स्मार्ट क्लास में पढ़ते हैं छात्र

नाका का यह स्कूल स्मार्ट क्लास में तब्दील हो गया है। कंप्यूटर की बोर्ड पर आदिवासी बच्चों की उंगलियां गजब की थिरकती हैं। कंप्यूटर के जरिये विज्ञान और इतिहास की पढ़ाई कराई जाती है। स्कूल में इंटरनेट की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है।

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