जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। अपनी सिकुड़ती राजनीतिक जमीन के साथ सहयोगी दलों की ओर से मिल रहे झटके भी कांग्रेस की सियासी चुनौती बढ़ा रहे हैं। नीतीश कुमार के अचानक भाजपा से हाथ मिलाने के झटके से पार्टी अभी उबरी भी नहीं है कि एनसीपी के भी राजनीतिक दशा-दिशा बदलने की अटकलें शुरू हो गई है। सोनिया गांधी की विपक्षी दलों की शुक्रवार को बुलाई गई बैठक में एनसीपी के नहीं शामिल होने की वजह से इन अटकलों को हवा भी मिल रही है। कांग्रेस की ओर से भले ही शरद पवार की बीमारी का हवाला देकर एनसीपी के बैठक में नहीं आने से बढ़ी हलचल को थामने की कोशिश की गई है।

पार्टी सूत्रों का कहना है कि एनसीपी प्रमुख शरद पवार का सियासी मिजाज भले ही भाजपा की वैचारिक राजनीतिक से मेल नहीं खाता। मगर उन पर पार्टी के दूसरे बड़े नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल का गहरा असर है। पटेल एनसीपी के राष्ट्रीय स्तर पर सबसे कारगर राजनीतिक मैनेजर तो माने ही जाते हैं। साथ ही पवार से उनका वर्षो से गहरा जुड़ाव और सियासी गलियारों में चर्चा गर्म है कि पटेल भाजपा के साथ राजनीतिक संभावनाएं तलाशे जाने की हिमायत कर रहे हैं।

महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना के रिश्तों में पिछले कुछ समय से जारी उतार-चढ़ाव को देखते हुए भी एनसीपी और भाजपा के बीच खिचड़ी पकने की अटकलें लगती रही है। महाराष्ट्र जैसे बड़े प्रदेश में जहां से उत्तरप्रदेश के बाद सबसे ज्यादा 48 लोकसभा सांसद आते हैं वहां एनसीपी का अलग होने की भरपायी करना कांग्रेस के लिए संभव नहीं होगा। राजनीतिक विचाराधारा के स्तर पर कांग्रेस के लिए शिवसेना से सीधे किसी तरह के तालमेल की गुंजाइश नहीं रहेगी।

सूत्रों के अनुसार इसीलिए कांग्रेस के शीर्ष रणनीतिकारों ने शरद पवार से संवाद का सिलसिला बढ़ा दिया है। गुलाम नबी आजाद बीच-बीच में सेहत की जानकारी लेने के बहाने पवार से सीधे संपर्क में हैं। तो पवार से अच्छे रिश्ते रखने वाले महाराष्ट्र के कांग्रेस नेताओं को भी एनसीपी प्रमुख को साधे रखने की कोशिशों में लगाया जा रहा है। ताकि एनसीपी को विपक्षी खेमे से बाहर जाने की किसी भी संभावना को रोका जा सका।

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Posted By: Gunateet Ojha

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