नई दिल्‍ली (जेएनएन)। कोरोना वायरस से फैली महामारी को दुनिया के पर्यावरण विशेषज्ञ प्रकृति के उस संदेश की तरह देख रहे हैं जो इंसानों को उनके कृत्यों के प्रति आगाह कर रहा हो। संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण प्रमुख इंगर एंडरसन का मानना है कि प्राकृतिक संसार पर मानवता कई तरह के दबाव डाल रही है। जिसका नतीजा विध्वंस के रूप में सामने आ रहा है। अगर हम सब इस ग्रह का ध्यान रखने में विफल साबित होते हैं तो समझ लीजिएगा कि हम खुद को भी सुरक्षित नहीं रख सकेंगे।

आग से खेलने जैसा

दुनिया के प्रमुख वैज्ञानिकों ने धरती और उसके संसाधनों की तबाही को आग से खेलने जैसा करार दिया है। कोविड-19 महामारी के रूप में इसे धरती की स्पष्ट चेतावनी बताया है। वनों और वन्यजीवों के बीच तेजी से बढ़ती दखलंदाजी अगर सीमित नहीं हुई तो भविष्य में कोरोना से भी घातक महामारी के लिए मानवता को तैयार रहना होगा।

जीवों के बाजार हों प्रतिबंधित

जिंदा जानवरों की दुनिया भर में सजने वाली मंडियों पर प्रतिबंध लगाए जाने की जरूरत है। इन मंडियों को विशेषज्ञ रोगों के मिश्रण वाला आदर्श कटोरा मानते हैं।

नहीं खुल रही आंखें

प्रकृति विदों का मानना है कि प्रकृति बार-बार हमें आगाह कर रही है, लेकिन हम नहीं चेत रहे हैं। बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं का दंश झेलने के बाद भी हमारी आंखें नहीं खुल रही हैं। तमाम देशों में लगने वाली जंगलों में आग, दिनों दिन गर्मी के टूटते रिकार्ड, टिड्डी दलों के बढ़ते हमले जैसी तमाम घटनाओं से प्रकृति हमें चेता रही है।

एक ही उपाय

विशेषज्ञों के अनुसार कोविड-19 जैसी महामारी को रोकने के लिए सिर्फ और सिर्फ एक ही उपाय है। एक तो गर्म होती धरती को हमें रोकना होगा। दूसरा खेती, खनन और आवास जैसी तमाम इंसानी जरूरतों को पूरा करने के लिए वनों के अतिक्रमण पर पूरी तरह से रोक लगाए जाने की जरूरत है। ये दोनों ही गतिविधियां वन्यजीवों को इंसानों के संपर्क में आने को विवश करती हैं।

आगाह करता संदेश तंत्र के चार मंत्र

  • स्वस्थ पारिस्थितिक तंत्र इन रोगों से लड़ने में हमारी मदद करता है। जैव विविधता रोगों के पैथोजेंस का तेज प्रसार मुश्किल बनाती है।
  • एक अनुमान के मुताबिक दस लाख जीव और पौधों की प्रजातियां अस्तित्व का खतरा झेल रही हैं।
  • हर चार महीने में एक नया संक्रामक रोग इंसानों को लपेटे में लेता है। इन नए रोगों में से तीन चौथाई जानवरों से आते हैं।
  • यदि हम टिकाऊ माडलों के इस्तेमाल से जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के नुकसान को रोकने की कोशिश करें तो यह सिर्फ प्रकृति के लिए ही फायदेमंद नहीं होगा, इससे इंसानी सेहत की भी रक्षा होगी।

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Posted By: Kamal Verma

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