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अब व्यक्तिगत आयकर की गणना सीखेंगे कक्षा नौ के बच्चे, NCERT ने पहली बार स्कूली कोर्स में शामिल किया नया पाठ्यक्रम

Published: Fri, 02 Oct 2026 02:47 AM (IST)

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत वित्तीय साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए ...और पढ़ें

अब व्यक्तिगत आयकर की गणना सीखेंगे कक्षा नौ के बच्चे

अब व्यक्तिगत आयकर की गणना सीखेंगे कक्षा नौ के बच्चे

HighLights

  1. एनसीईआरटी ने पहली बार स्कूली कोर्स में व्यक्तिगत आयकर को शामिल किया

  2. न्यू रिजीम के तहत स्लैब के हिसाब से आयकर की गणना समझाई जाएगी

पीटीआई, नई दिल्ली। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत वित्तीय साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए पहली बार कक्षा नौ के पाठ्यक्रम में व्यक्तिगत आयकर को शामिल किया है।

सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक "भारत और उससे बाहर समाज को समझना-भाग 2" में व्यक्तिगत आयकर की गणना को एक नए अध्याय के रूप में जोड़ा गया है।

एनसीईआरटी के प्रमुख दिनेश प्रसाद सकलानी ने बताया कि छात्र नई व्यवस्था (न्यू रिजीम) के तहत स्लैब के हिसाब से आयकर की वास्तविक गणना को समझ सकते हैं। इस आयु के बच्चों को पहली बार टैक्स स्लैब के बारे में पढ़ाया जाएगा।

"अपनी व्यक्तिगत आय का प्रबंधन करना" शीर्षक वाले अध्याय में कहा गया है कि पैसे का प्रबंधन करने की यात्रा बचपन से ही शुरू हो जाती है। इस अध्याय में नई आयकर व्यवस्था के तहत टैक्स स्लैब की एक तालिका दी गई है।

इसमें स्लैब के अनुसार कर की देनदारी का हिसाब लगाने के तरीके भी विस्तार से बताए गए हैं। इसमें पुरानी कर व्यवस्था (ओल्ड रिजीम) का कोई उल्लेख नहीं है।

उल्लेखनीय है कि नई कर व्यवस्था को एक अप्रैल, 2023 से "डिफाल्ट" बना दिया गया है। इसका मतलब है कि करदाताओं को अपने-आप इसमें शामिल कर लिया जाता है, जब तक कि वे खास तौर पर पुरानी व्यवस्था को न चुनें।

मध्यकाल में राजनीतिक सत्ता को भी वैधता देते थे मंदिर

कक्षा नौ के सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में कहा गया है कि 1000-1700 ईस्वी (मध्यकाल) के दौरान मंदिर न केवल महत्वपूर्ण आर्थिक संस्थान थे, बल्कि राजनीतिक सत्ता को वैधता देने का काम भी करते थे।

उस कालखंड में मंदिर सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक जीवन के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में कार्य करते थे। प्रतिरोध का विचार केवल लड़ाइयों और राजनीतिक संघर्षों तक ही सीमित नहीं है।

इसमें संस्थाओं और परंपराओं को बचाए रखना भी शामिल है, जिसमें मंदिरों की अहम भूमिका है। इन मंदिरों के देवताओं को राज्य और वहां के लोगों का रक्षक माना जाता था।

कुछ मामलों में देवता को ही शासक माना जाता था, जबकि शासक देवता के प्रतिनिधि के तौर पर शासन करता था।

उदाहरण के लिए ओडिशा के गजपति शासक खुद को जगन्नाथ का 'राउत' (उप-शासक) कहते थे। जयपुर के कछवाहा शासक गोविंददेवजी की ओर से शासन करते थे, जबकि कोटा के राजपूत शासक खुद को भगवान राम का प्रतिनिधि मानते थे।