'बच्चों पर न लगाएं जिंदगी भर का ठप्पा', बाल न्याय प्रणाली पर मुख्य न्यायाधीश का बड़ा बयान
सीजेआई ने किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के दस साल पूरे होने पर आयोजित राष्ट्रीय वार्षिक सम्मेलन में अत्यंत संवेदनशील और भावपूर्ण विचार व्यक्त किए।

'कानून के संघर्ष में फंसे बच्चे' जैसी शब्दावली किसी बच्चे की स्थायी पहचान नहीं : सीजेआई
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'कानून के संघर्ष में फंसे बच्चे' जैसी शब्दावली किसी बच्चे की स्थायी पहचान नहीं : सीजेआई
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) सूर्यकांत बोले - यह शब्दावली उसकी कठिन परिस्थितियों को दर्शाती है
'पुनर्वास केवल संस्था के दरवाजों तक सीमित न हो, समाज एवं परिवार में हो सम्मानजनक पुनर्स्थापन'
'दूसरा मौका मिले तो वह अपराधी के रूप में कलंकित होने के बजाय जिम्मेदार नागरिक बन सकता है'
पीटीआई, नई दिल्ली। प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) ने किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के दस साल पूरे होने पर आयोजित राष्ट्रीय वार्षिक सम्मेलन में अत्यंत संवेदनशील और भावपूर्ण विचार व्यक्त किए।
उन्होंने जोर देकर कहा कि ''कानून के संघर्ष में फंसे बच्चे'' जैसी शब्दावली किसी बच्चे की स्थायी पहचान नहीं, बल्कि उसकी कठिन परिस्थितियों को दर्शाती है।
सुप्रीम कोर्ट की किशोर न्याय समिति और यूनिसेफ द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में सीजेआई ने कहा कि दस साल का समय किसी कानून के लिए छोटा हो सकता है, लेकिन यह किसी के बचपन का आधे से अधिक हिस्सा होता है।
उन्होंने कहा कि यह अधिनियम इस बात की गारंटी देता है कि यदि किसी बच्चे को दूसरा मौका मिले, तो वह अपराधी के रूप में कलंकित होने के बजाय समाज का एक जिम्मेदार नागरिक बन सकता है।
अतीत का साया भविष्य पर न पड़े सीजेआई ने स्पष्ट किया कि वास्तविक सुधार तभी पूरा होता है जब बच्चे के अतीत का साया उसके भविष्य पर कभी न पड़े। इसके लिए समय पर पुराने रिकॉर्ड नष्ट किए जाने चाहिए तथा बच्चों के नाम मीडिया और इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखे जाने चाहिए ताकि वे सालों तक वहां न टिके रहें।
उन्होंने कहा कि आज जिस बच्चे को कानून के कठघरे में देखा जा रहा है, वह कल तक ऐसा बच्चा था जिसे समय पर देखभाल और सुरक्षा की जरूरत थी। इसलिए हमारी प्रतिक्रिया प्रतिशोध की भावना से नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्स्थापन की होनी चाहिए।
कानूनी सहायता और पुलिस-न्यायिक प्रशिक्षण पर जोर सीजेआई ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कई किशोर न्याय बोर्डों में अभी भी कानूनी सेवा क्लीनिक नहीं हैं।
उन्होंने नालसा की 2024 की बाल-मित्र कानूनी सेवा योजना का जिक्र करते हुए पुलिस थानों और हर बोर्ड में समर्पित वकीलों की अनिवार्यता पर बल दिया।
इसके साथ ही, उन्होंने पुलिस अधिकारियों, मनोवैज्ञानिकों और न्यायिक अधिकारियों के लिए संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों की आवश्यकता पर भी जोर दिया ताकि हर कोई अपराध के पीछे छिपे बच्चे और उसके संघर्षों को समझ सके।
समारोह के दौरान सीजेआइ ने किशोर न्याय अधिनियम से जुड़े सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टों के महत्वपूर्ण फैसलों के ई-कंपेंडियम का विमोचन भी किया।
इस अवसर पर सुप्रीम कोर्ट की जज न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि जब कोई बच्चा कानून तोड़ता है, तो कानून को उस बच्चे को नहीं तोड़ना चाहिए। यूनिसेफ इंडिया की प्रतिनिधि सिंथिया मैककैफ्री ने भी बाल-मित्र प्रक्रियाओं और सुरक्षित माहौल के निर्माण की प्रतिबद्धता दोहराई।
