नई दिल्‍ली [जागरण स्‍पेशल]। नागरिकता संशोधन कानून-2019 के तहत भारत सरकार पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की राह प्रशस्त कर चुकी है। उसकी सोच रही है कि अपने मूल देशों में सताए और प्रताड़ित किए जा रहे हिंदू, सिख, ईसाई, पारसी, बौद्ध और जैन जैसे अल्पसंख्यक समुदायों को नागरिकता देकर भारत न सिर्फ राष्ट्र धर्म का निर्वहन करेगा बल्कि आजादी के समय हुई ऐतिहासिक भूल को सुधारने का काम भी करेगा। सरकार के कदम को कोई इसे वोटबैंक की राजनीति से जोड़ रहा है तो कोई समानता के अधिकार की दुहाई दे रहा है। दुष्प्रचार और अज्ञानता के चलते पूर्वोंत्तर के हिस्सों में इसका हिंसक विरोध शुरू है। ऐसे में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर दोनों पक्षों के मंसूबों की पड़ताल आज बड़ा मुद्दा है।

इसलिए पड़ी जरूरत

सन 1947 में जब धर्म के आधार पर भारत का विभाजन हुआ, तब लाखों की संख्या में लोगों ने धर्म के आधार पर देश बदला। बहुत से मुसलमान भारत में ही रह गए और बहुत से हिंदू, सिख, ईसाई, पारसी, जैन, बौद्ध पाकिस्तान में बसे रहे। भारत हिंदू राष्ट्र नहीं बल्कि धर्मनिरपेक्ष देश बना ताकि भारत में रहने वाले अल्पसंख्यक खुद को सुरक्षित समझें और उन्हें समान अधिकार मिलें। भारत ने अपने संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार बना दिया। यही कारण है कि विभाजन के बाद भारत में बचे 8 फीसद मुसलमान आज बढ़कर लगभग 14 प्रतिशत (2011 की जनगणना के अनुसार) हो गए हैं लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं की किस्मत भारतीय मुसलमानों जैसी न तब थी, न आज है। प्रगतिशील और उदारवादी विचारधारा को त्यागकर पाकिस्तान और बांग्लादेश इस्लामिक देश बन गए और अल्पसंख्यकों का जीवन नर्क हो गया।

यहां नहीं होगा लागू

पूरे अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और मिजोरम को नागरिकता कानून से अलग रखा गया है। लगभग पूरे मेघालय, वहीं असम और त्रिपुरा के इलाकों को भी अलग रखा है। हालांकि पूरा मणिपुर इसके दायरे में होगा। नागरिकता संशोधन कानून के अनुसार, यह असम, मेघालय, मिजोरम या त्रिपुरा के आदिवासी इलाके में संविधान की छठी अनुसूची के चलते लागू नहीं होगा और यह क्षेत्र बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन, 1873 के तहत ‘इनर लाइन’ में अधिसूचित है। इनर लाइन परमिट (आइएलपी) प्रणाली अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और मिजोरम में लागू है।

आइएलपी का असर

आइएलपी भारत के अन्य हिस्सों के लोगों के लिए एक विशेष परमिट है जो कि तीन राज्यों में जाने के लिए आवश्यक है। इसे ऑनलाइन या व्यक्तिगत आवेदन के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही आइएलपी धारक द्वारा निश्चित तारीख को, निश्चित इलाकों की यात्रा की जा सकती है। जब इसे बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर रेगुलेशन एक्ट 1873 के अंतर्गत लागू किया तो उसका उद्देश्य राजा के व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए ब्रिटिश शासन (भारतीय) को व्यापार करने से रोकना था। हालांकि 1950 में भारत सरकार ने स्थानीय लोगों के हितों का ध्यान रखते हुए ‘ब्रिटिश शासन’ के स्थान पर ‘भारत के नागरिक’ कर दिया।

आइएलपी का फायदा

आइएलपी वाले राज्यों में भारत के दूसरे राज्यों की अपेक्षा कहीं ज्यादा प्रवासी निवास करते हैं। यह लोग यहां रहते हैं और काम करते हैं। इसके लिए लंबी अवधि की आइएलपी का नवीनीकरण कराते रहते हैं। अब यह सवाल पूछा जा रहा है कि नागरिकता संशोधन कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक बनता है तो क्या वह किसी अन्य भारतीय की तरह आइएलपी के लिए आवेदन कर सकता है और उस राज्य में काम कर सकता है। बाहरी लोगों (भारतीय नागरिक जो उस राज्य/क्षेत्र के बाहर के हैं) के इन राज्यों में आने और रहने को लेकर इनर लाइन प्रणाली या छठी अनुसूची के तहत कई तरह के नियम और प्रतिबंध हैं। अनुमान लगाया जा रहा है कि यह मौजूदा नियम नई नागरिकता प्राप्त करने वाले पर भी समान रूप से लागू होंगे।

छठी अनुसूची और नागरिकता संशोधन कानून से मुक्त क्षेत्र

संविधान की छठी अनुसूची के अनुच्छेद 244 (2) और अनुच्छेद 275(1) में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के प्रबंधन के लिए विशिष्ट प्रावधान हैं। साथ ही यह स्वायत्त जिला परिषद को विशेष शक्तियां उपलब्ध कराता है। इन परिषदों को विभिन्न विषयों पर कानून बनाने की शक्तियां भी दी गई हैं, जिसका उद्देश्य आदिवासी इलाकों के विकास और आदिवासी समुदाय द्वारा स्वशासन को बढ़ावा देना है। मिजोरम आइएलपी शासन से सुरक्षित होता है। तीन अन्य प्रदेश के क्षेत्र छठी अनुसूची के तहत सुरक्षित होते हैं। आदिवासी बहुल मेघालय में शिलांग शहर के एक छोटे से हिस्से को छोड़कर तीन परिषदें हैं जो पूरे राज्य को व्यावहारिक रूप से संभालती हैं। छठी अनुसूची के साथ असम में तीन और त्रिपुरा में एक परिषद है। मणिपुर और त्रिपुरा रियासतों का 1949 में भारत में विलय हुआ। 1972 में ये पूर्ण राज्य बने। त्रिपुरा के आदिवासी इलाकों में छठी अनुसूची लागू है। जब त्रिपुरा को छठी अनुसूची के जरिए सुरक्षित किया गया तो केंद्र ने कहा कि जल्द ही इसे मणिपुर में भी लागू किया जाएगा, लेकिन यह अभी तक वास्तविकता नहीं बन सकी है। हालांकि राज्य सरकार तीन बार छठी अनुसूची की मांग कर चुकी है।

पूर्वोत्तर के अन्य हिस्सों में प्रावधान

इसी साल नवंबर में मेघालय कैबिनेट ने मेघालय रेजिडेंट्स सेफ्टी एंड सिक्योरिटी एक्ट 2016 में संशोधन को मंजूरी दी है। यह कदम आइएलपी जैसे शासन को लागू करने की मांग की पृष्ठभूमि में सामने आया है। वहीं असम में भी आइएलपी शासन जैसे नियमों को लागू करने की मांग सामने आई है।

क्या है अनुच्छेद 371(सी)

संविधान के अनुच्छेद 371(सी) के तहत मणिपुर के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। राष्ट्रपति के आदेश से राज्य विधानसभा के सदस्यों की समिति का गठन किया जाता है जिसमें पहाड़ी इलाके से चुने गए सदस्य भी शामिल होते हैं। यह लोग मिलकर मणिपुर के पहाड़ी इलाकों के बेहतर प्रबंध के लिए काम करते हैं। राष्ट्रपति के मांगने अथवा वार्षिक रूप से राज्यपाल मणिपुर के पहाड़ी इलाके के प्रबंध से जुड़ी रिपोर्ट भेजते हैं। इसके जरिए मणिपुर के आदिवासियों का हक विधानसभा में सुरक्षित करना है। मणिपुर (पहाड़ी इलाका ) जिला परिषद कानून, 1971 संसद द्वारा पारित किया गया था। जिसने 1972 में मणिपुर में छह स्वायत्त जिला परिषदों की स्थापना को सुनिश्चित कर दिया। वहीं पिछले साल मणिपुर पीपुल बिल, 2018 विधानसभा ने पारित किया। जिसे राष्ट्रपति की अनुमति का इंतजार है। इसमें बाहरी और गैर मणिपुरी लोगों को लेकर कई नियम हैं।

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