बिलासपुर, नईदुनिया। भाजपा शासनकाल में कागजी संस्था के नाम पर समाज कल्याण विभाग में हुए एक हजार करोड़ रुपये के घोटाले में हाई कोर्ट ने सीबीआइ जांच के निर्देश दे रखे हैं। सीबीआइ ने जांच भी शुरू कर दी है। अब शासन की ओर से हाई कोर्ट में दो अलग-अलग समय पर शपथपत्र देने की बात सामने आई है। इनमें दोनों में ही अलग-अलग दावे किए गए हैं। भाजपा शासनकाल के तत्कालीन मुख्य सचिव अजय सिंह ने जांच के बाद 150-200 करोड़ रुपये के घोटाले की बात स्वीकारी थी। वहीं, वर्तमान शासन ने रिव्यू पिटीशन में जो शपथपत्र लगाया है उसमें घोटाले की बात को ही सिरे से खारिज कर दिया गया है।

इसमें सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि भाजपा शासनकाल में हुए घपले के सामने आने के बाद माना जा रहा था कि कांग्रेस सरकार हमलावर होगी, लेकिन हुआ एकदम उल्टा। सरकार अधिकारियों के बचाव में उतर आई है। वजह यह कि पुरानी सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे अधिकारी ही इस सरकार में भी प्रभावी भूमिका में हैं। जो दो पूर्व मुख्य सचिव रिटायर हो चुके हैं उन्हें सरकार ने संविदा पर नियुक्ति दे रखी है।

यह है मामला

समाज कल्याण विभाग में संविदा कर्मचारी के रूप में कार्य कर रहे कुंदन सिंह ने स्थाई नियुक्ति के लिए जब विभाग में आवेदन लगाया तब उन्हें पता चला कि वर्ष 2015 में ही उसकी स्थाई नियुक्ति हो गई है और माना कैंप स्थित नि:शक्तजन स्रोत संस्थान से नियमित कर्मचारी के रूप में प्रति महीने उसका वेतन भी निकल रहा है।

कुंदन को माना कैंप के फर्जी एनजीओ दफ्तर में वर्ग दो कर्मचारी के रूप में पदस्थ बताया है। इसके बाद कुंदन ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी जुटाई। इसमें पता चला कि विभागों में तैनात चतुर्थ श्रेणी के दर्जनों कर्मचारियों की तैनाती कागजी संस्था में भी दर्शायी गई है।

आरटीआइ को आधार बनाकर कुंदन ने हाई कोर्ट में अपील की। मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने तत्कालीन प्रमुख सचिव को नोटिस जारी कर शपथ पत्र के साथ जवाब पेश करने कहा था। इस पर तत्कालीन चीफ सेके्रटरी अजय सिंह ने 150-200 करोड़ घोटाले की बात स्वीकार की थी।

सुनवाई के दौरान घोटाले के एक हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने के साक्ष्य मिलने लगे। इसके बाद हाई कोर्ट ने सीबीआइ को जांच के निर्देश दिए। इसी आदेश के खिलाफ राज्य शासन की ओर से समाज कल्याण विभाग में पदस्थ जिला पुनर्वास अधिकारी चमेली चंद्राकर ने रिव्यू पिटीशन दायर की है। इसमें उन्होंने पूरी याचिका को ही फर्जी बता दिया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने उठाए सवाल

याचिकाकर्ता के वकील देवर्षि ठाकुर ने सवाल उठाया है कि जब याचिका ही झूठी है तो रिव्यू पिटीशन में शासन की ओर से कोर्ट के समक्ष सीबीआइ के बजाए पुलिस के मामले की जांच करने और हाई कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग क्यों और किस आधार पर की गई है।

सीबीआइ को रोक नहीं पाई सरकार, याचिका खारिज

एक हजार करोड़ के घोटाले की जांच में सीबीआइ को रोकने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार की मशक्कत काम नहीं आई। हाई कोर्ट ने शासन के रिव्यू पिटीशन को लेकर तल्ख टिप्पणी के साथ याचिका खारिज कर दिया है। जस्टिस प्रशांत मिश्रा व जस्टिस पीपी साहू की डिवीजन बेंच ने समाज कल्याण विभाग में कागजी एनजीओ के जरिये एक हजार करोड़ रुपये के घोटाले में शामिल एक दर्जन अधिकारियों के खिलाफ जांच का जिम्मा सीबीआइ को सौंप दिया है।

इसी बीच राज्य सरकार ने डिवीजन बेंच के फैसले को चुनौती देते हुए रिव्यू पिटीशन दायर की थी। महाधिवक्ता ने कोर्ट के समक्ष सीबीआइ के बजाए राज्य पुलिस को जांच का जिम्मा सौंपने की मांग की थी। महाधिवक्ता ने डिवीजन बेंच से मांग की थी कि राज्य पुलिस द्वारा इस मामले की किए जाने वाली जांच को हाई कोर्ट अपनी निगरानी में रखे।

महाधिवक्ता के तर्क के बाद डिवीजन बेंच ने रिव्यू पिटीशन दायर करने के संबंध में सवाल किया था कि ऐसा कौन सा कारण है जिसके चलते इस गंभीर मामले में राज्य शासन को रिव्यू पिटीशन दायर करना पड़ा। कोर्ट ने यह भी कहा कि घोटाले से बढ़कर यह सुनियोजित षड़यंत्र है।

ढांढ की एसएलपी पर सुप्रीम कोर्ट में कल होगी सुनवाई 

पूर्व मुख्य सचिव विवेक ढांढ ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर डिवीजन बेंच के फैसले को चुनौती दी है। उनकी एसएलपी पर 13 फरवरी को सुनवाई होगी। याचिकाकर्ता कुंदन सिंह ने अपने वकील देवर्षि ठाकुर के जरिये पहले ही सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर कर दी है।

 

Posted By: Nitin Arora

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