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छत्तीसगढ़: स्कूल और आंगनबाड़ी जाने के लिए नाला पार करते हैं बच्चे, ग्रामीण बोले- पीढ़ियों से चली आ रही है परेशानी

Published: Thu, 01 Oct 2026 12:31 AM (IST)

ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसलिए वे मजबूरी में यह जोखिम उठाते हैं। ग्रामीणों ...और पढ़ें

छत्तीसगढ़: स्कूल और आंगनबाड़ी जाने के लिए नाला पार करते हैं बच्चे

छत्तीसगढ़: स्कूल और आंगनबाड़ी जाने के लिए नाला पार करते हैं बच्चे

HighLights

  1. भौगोलिक स्थिति के कारण गांव दो हिस्सों में बंटा है

  2. आंगनबाड़ी के मासूमों को सबसे ज्यादा परेशानी

जेएनएन, डौंडीलोहारा। विकासखंड के अंतिम छोर पर बसे ग्राम पंचायत खड़बत्तर के आश्रित ग्राम टूटामारदी के बच्चों को स्कूल और आंगनबाड़ी पहुंचने के लिए हर दिन जोखिम उठाना पड़ रहा है।

गांव से होकर गुजरने वाले खोल नाले पर पुल नहीं होने के कारण बारिश के दिनों में बच्चों को तेज बहाव के बीच से होकर गुजरना पड़ता है।

गांव के बिंझवार सिंह दुग्गा, विश्राम सिंह दुग्गा और श्यामलाल कोरेटी ने बताया कि टूटामारदी में करीब 120 परिवार रहते हैं।

भौगोलिक स्थिति के कारण गांव दो हिस्सों में बंटा है। करीब 80 परिवार नाले के इस पार, जबकि 40 परिवार बड़े पारा और आमली पारा में नाले के उस पार रहते हैं।

गांव की प्राथमिक शाला और आंगनबाड़ी केंद्र भी बड़े पारा में संचालित हैं। ऐसे में नाले के इस पार रहने वाले परिवारों के करीब 40 बच्चों को रोजाना नाला पार कर स्कूल और आंगनबाड़ी जाना पड़ता है।

सामान्य दिनों में नाला पार करने में अधिक परेशानी नहीं होती, लेकिन बारिश के दौरान जलस्तर बढ़ने और तेज बहाव के कारण बच्चों की मुश्किल बढ़ जाती है। छोटे बच्चे स्वयं नाला पार नहीं कर पाते। ऐसे में परिजन उन्हें गोद या पीठ पर बैठाकर दूसरी ओर पहुंचाते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसलिए वे मजबूरी में यह जोखिम उठाते हैं। ग्रामीणों के अनुसार तेज बहाव के बीच जरा सी चूक गंभीर हादसे का कारण बन सकती है। इसके बावजूद बच्चों की शिक्षा जारी रखने के लिए परिवार रोजाना इस चुनौती का सामना कर रहे हैं। ग्रामीणों ने नाले पर पुल निर्माण की मांग की है।

आंगनबाड़ी के मासूमों को सबसे ज्यादा परेशानी

ग्रामीण सावित्री बाई और नानिया बाई ने बताया कि सबसे ज्यादा परेशानी आंगनबाड़ी जाने वाले मासूम बच्चों को होती है। जिन्हें ठीक से चलना भी नहीं आता, उन्हें माता-पिता गोद में उठाकर उफनते नाले को पार कराते हैं।

तेज बहाव के बीच हर कदम पर सावधानी बरतनी पड़ती है। ग्रामीणों का कहना है कि जरा सी चूक मासूम की जान पर भारी पड़ सकती है।

पीढ़ियों से चली आ रही है परेशानी

सरपंच बिरनबाई और उपसरपंच अर्जुन सिंह नेताम ने बताया कि गांव के बच्चे पीढ़ियों से उफनते नाले को पार कर स्कूल जाने की परेशानी झेल रहे हैं।

पुलिया निर्माण की मांग को लेकर कलेक्ट्रेट और जनदर्शन में कई बार आवेदन दिया गया। ग्रामीणों ने बच्चों और किसानों के रोजाना जोखिम की जानकारी भी प्रशासन को दी, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ।

ग्रामीणों का कहना है कि जिम्मेदारों की अनदेखी के कारण आज भी बच्चों को जान जोखिम में डालनी पड़ रही है।

जब क्लासरूम की जगह खुला मंच बन जाती है पाठशाला

गांव के उपसरपंच एवं प्राथमिक शाला के प्रभारी प्राचार्य डोमेंद्र ठाकुर ने बताया कि बरसात में नाला खतरे के निशान से ऊपर बहने पर बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पाते और कई दिनों तक कक्षाएं प्रभावित रहती हैं। नाले का पानी उतरने तक बच्चे इंतजार करते हैं।

पढ़ाई प्रभावित न हो, इसलिए टूटामारदी में नाले के इस पार बने खुले मंच पर बच्चों को पढ़ाने का प्रयास किया जाता है। लेकिन ब्लैक बोर्ड, टाट-पट्टी और अन्य बुनियादी सुविधाओं के अभाव में यह व्यवस्था गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है।

ग्रामीणों की रोजी-रोटी पर भी पड़ रहा असर

तेज बहाव वाले नाले के कारण ग्रामीणों को भी परेशानी उठानी पड़ती है। नाला उफान पर होने से वे दूसरी ओर स्थित खेतों में कृषि कार्य और मजदूरी के लिए नहीं जा पाते। जोखिम उठाकर जाने पर कपड़े भीग जाते हैं और हादसे की आशंका बनी रहती है।

ग्रामीणों के अनुसार दो दिन पहले हुई भारी बारिश के बाद वे लगातार तीन दिनों तक खेतों तक नहीं पहुंच सके, जिससे खेती और मजदूरी का काम प्रभावित हुआ।

प्रस्ताव तैयार कर शासन स्तर पर भेजा जा चुका है। इस कार्य को बजट में भी शामिल किया गया था, लेकिन शासन स्तर से अब तक इसकी अंतिम स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई है। -दिव्या उमेश मिश्रा कलेक्टर बालोद