जगदलपुर, जेएनएन। बस्तर में चार दशक से जारी हिंसा के खिलाफ यहां के युवा अब मुखर होने लगे हैं। शुक्रवार को धुर नक्सल प्रभावित इलाकों से युवक-युवतियों का दल बस्तर आइजी सुंदरराज पी व एसपी दीपक झा से मिलने पहुंचा तो उनका दर्द छलक आया। युवा मानते हैं कि नक्सली बेवजह ग्रामीणों की हत्या कर रहे हैं। पुल-पुलिया, सड़क को नुकसान पहुंचाकर वह विकास रोक रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल आदि मूलभूत सुविधाएं भी ग्रामीणों को नहीं मिल पा रही हैं।

सड़कें काटने से एंबुलेंस गांवों तक नहीं पहुंच पातीं और बीमारों को खाट पर लादकर मीलों पैदल चलना पड़ता है। युवाओं ने कहा कि वे चाहते हैं कि बस्तर में शांति स्थापित हो। विकास का नया अध्याय शुरू हो। आइजी के समक्ष युवाओं ने अपनी बात रखते हुए कहा कि शिक्षा के प्रसार से नई पीढ़ी की सोच बदल रही है। विकास में पिछड़ने का दर्द और नक्सलियों के चक्कर में सुख- सुविधाओं और आत्मनिर्भरता नहीं हासिल कर पाने की सच्चाई युवाओं को समझ आने लगी है। अंदरूनी इलाकों में यह मुद्दा भी तेजी से उभर रहा है कि बाहरी नक्सली स्थानीय युवकों को बरगलाकर उनसे हिंसा और विकास विरोधी काम करा रहे हैं।

दरअसल, बस्तर में पुलिस ने भी ग्रामीणों को नक्सलवाद के प्रति सतर्क करने के लिए बस्तर त माटा (बस्तर की आवाज) अभियान चला रखा है। बस्तर आइजी सुंदरराज पी का कहना है कि सरकार, पुलिस, प्रशासन और समाज, सभी नक्सल समस्या को खत्म करने के लिए अपने-अपने ढंग से प्रयास कर रहे हैं। नक्सली अब तक युवाओं की अज्ञानता का फायदा उठाते रहे हैं पर अब नक्सलियों की आदिवासी और विकास विरोधी चाल को समझकर जागरूक हो रहे हैं।

युवाओं ने कहा कि बाहरी माओवादी नेताओं के इशारे पर निर्दोष ग्रामीणों की प्रताड़ना अब बर्दाश्त नहीं करेंगे। नक्सली हिंसा से मुक्ति के लिए नई शांति प्रक्रिया के बैनर तले सामाजिक संगठन भी प्रयास कर रहे हैं। दो अक्टूबर पर गांधी जयंती के मौके पर आयोजित वेबिनार में बस्तर के सुदूर नक्सल इलाकों के ग्रामीणों ने आवाज मुखर की थी। इस मौके पर एक सर्वे के नतीजे भी जारी किए गए थे, जिसमें करीब चार हजार युवाओं ने बातचीत के जरिए नक्सल समस्या सुलझाने की वकालत की थी।

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